दस अप्रैल को दिल्ली में लोकसभा चुनाव के लिए वोट पड़ेंगे. यहां लोकसभा की 7 और विधानसभा की 70 सीटें हैं. दिसंबर, 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 31, कांग्रेस को 8 और आम आदमी पार्टी (आप) को 28 सीटें मिली थीं. अगर पिछले तीन माह में तीनों पार्टियों की लोकप्रियता अपनी जगह बरकरार रहती तो उस हिसाब से बीजेपी और आप को तीन-तीन और कांग्रेस को एक सीट मिलनी चाहिए थी.
लेकिन 27 से 28 मार्च को 1,200 वोटरों के बीच किए गए इंडिया टुडे ग्रुप और सिसेरो के ओपिनियन पोल में बीजेपी को 7 में से 6 सीटें मिलने का अनुमान है. कांग्रेस को अगर एक सीट मिल जाती है तो उसे खुद को खुशकिस्मत मानना चाहिए. इसी तरह आप को भी एक सीट पर संतोष करना पड़ सकता है. हर सैंपल में अनिश्चितता का तत्व मौजूद रहता है, इसलिए इस अनुमान में एक सीट का हेर-फेर हो सकता है.
दिल्लीवालों में किसी पार्टी के प्रति वफादारी करीब एक दशक तक कायम रहती है. इसके बाद वह दूसरी पार्टी की ओर तब्दील हो जाती है. 1980 का दशक कांग्रेस का रहा था और 1990 का दशक बीजेपी का. इसके बाद दिसंबर, 2013 तक कांग्रेस फिर से दिल्लीवालों की पसंदीदा पार्टी बन गई थी. 2004 में दिल्ली ने बीजेपी के सिर्फ एक उम्मीदवार को लोकसभा में भेजा था और 2009 में दिल्ली से उसका एक भी उम्मीदवार लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाया था.
उस साल दिल्ली ने अपनी सभी 7 सीटें कांग्रेस की झोली में डाल दी थीं. 2004 और 2009 के चुनावों में कांग्रेस को जहां आधे से ज्यादा वोट मिले थे, वहीं बीजेपी 14-22 प्रतिशत पीछे थी. 2004 से 2009 के बीच बीजेपी के वोटों का प्रतिशत 41 से गिरकर 35 हो गया था. 2009 में पांच लोकसभा सीटों पर कांग्रेस की जीत का अंतर 20 प्रतिशत से ज्यादा था और बाकी दो सीटों पर यह 10 प्रतिशत था. इससे पता चलता है कि कांग्रेस को कितनी बड़ी जीत मिली थी.
2013 के अंत तक कांग्रेस दिल्लीवालों से दूर हो चुकी थी. यह दूरी शायद 2012 की शुरुआत में ही आ गई थी, जब नगर निगम चुनाव हुए थे. दिसंबर, 2013 के विधानसभा चुनाव में दिल्ली के वोटरों ने कांग्रेस से लगभग पूरी तरह नाता तोड़ लिया. कांग्रेस का वोट प्रतिशत अपने सबसे निचले स्तर यानी 25 प्रतिशत पर पहुंच गया था.
आजादी के बाद से उसका प्रदर्शन इतना खराब कभी नहीं रहा. बीजेपी का वोट प्रतिशत 33 प्रतिशत पर अटक गया और अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आप को 29 प्रतिशत वोट मिले. दिल्ली विधानसभा चुनावों में 70 में से 28 सीटें जीतकर आप ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों को चिंता में डाल दिया था.
दिसंबर, 2013 के विधानसभा चुनावों से पहले तक दिल्ली में दो ही प्रमुख पार्टियां थीं-बीजेपी और कांग्रेस. हालांकि बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी (सपा) और जनता दल (सेकुलर) जैसी कुछ दूसरी पार्टियां और निर्दलीय उम्मीदवार भी होते थे, पर चुनावी गणित में उनका कोई खास दखल नहीं था. सात लोकसभा सीटों के लिए कुल 160 उम्मीदवारों में से 14 (कांग्रेस और बीजेपी के 7-7) को छोड़ सभी की जमानत जब्त हो गई थी.

ओपिनियन पोल के मुताबिक, इस बार दो पार्टियों में लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि यह लड़ाई अब मुख्य रूप से आप, बीजेपी और कांग्रेस के बीच त्रिकोणीय हो गई है. ममता बनर्जी की टीएमसी के चार प्रत्याशियों, समेत बाकी सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो सकती है.
ओपिनियन पोल दिखाता है कि दिल्ली में कांग्रेस की परेशानियां कम नहीं हुई हैं. बीजेपी फिर से दिल्लीवालों की पसंद बन गई है. पिछले विधानसभा चुनावों के बाद से बीजेपी के पक्ष में आठ प्रतिशत वोटों का झुकाव हुआ है, जबकि कांग्रेस के वोट प्रतिशत में दो प्रतिशत की और कमी आ गई है. आप के वोट प्रतिशत में भी डेढ़ प्रतिशत की कमी आती दिखती है.
मध्य दिल्ली और यमुना पार के इलाकों में बीजेपी चार लोकसभा सीटों पर और भी मजबूत दिख रही है. बाहरी दिल्ली की तीन लोकसभा सीटों पर आप की लोकप्रियता अपेक्षाकृत बरकरार है. यहां शहरी और अर्ध-शहरी वोटरों की संख्या ज्यादा है.
बीजेपी ने सिर्फ एक को छोड़कर 2009 के अपने सभी प्रत्याशियों को बदल दिया है. 2009 में दक्षिण दिल्ली से कांग्रेस उम्मीदवार रमेश कुमार से एक लाख से कम वोटों से हारने वाले रमेश बिधूड़ी को ही दोबारा टिकट दिया गया है. बाकी के सभी प्रत्याशी अपेक्षाकृत नए चेहरे हैं, जिनसे बीजेपी को फायदा हो सकता है.
दूसरी ओर, कांग्रेस ने 2009 में जीतने वाले सभी सात उम्मीदवारों को दोबारा मैदान में उतारा है. बीजेपी को मोदी लहर का भी फायदा हो रहा है. ओपिनियन पोल में 44 प्रतिशत वोटरों ने मोदी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में पसंद किया, जबकि 24 प्रतिशत ने अरविंद केजरीवाल और 19 प्रतिशत ने राहुल गांधी का नाम लिया.
दिल्ली देश के बाकी हिस्सों के मुकाबले कई मामलों में काफी आगे है. उदाहरण के लिए यहां साक्षरता दर 86.3 प्रतिशत (2011 की जनगणना) है, जो राष्ट्रीय औसत 74 प्रतिशत के मुकाबले ज्यादा है. ओपिनियन पोल के मुताबिक, यहां राजनैतिक जागरूकता भी ज्यादा है-99 प्रतिशत उत्तरदाताओं को आगामी चुनावों की जानकारी थी और 82 प्रतिशत ने तय कर लिया था कि वे किसे वोट देंगे. विभिन्न जनमत संग्रहों में देखी जा रही मोदी लहर को देखते हुए इस बात की संभावना कम ही है कि आखिरी मौके पर वोटरों का झुकाव बीजेपी के खिलाफ हो जाएगा.
उत्तरदाताओं से जब दूसरी पसंद के बारे में पूछा गया तो सिर्फ 3 प्रतिशत ने कांग्रेस की ओर इशारा किया जबकि 15 प्रतिशत ने बीजेपी और आप को दूसरी पसंद बताया. यूपीए-2 के प्रति नाराजगी है. सिर्फ 41 प्रतिशत उत्तरदाता पूरी तरह या आंशिक रूप से इसके कामकाम से संतुष्ट थे. 2009 में कांग्रेस को वोट देने वालों में से करीब 30 प्रतिशत ने बताया कि वे अब बीजेपी का समर्थन कर रहे हैं जबकि लगभग इतने ही प्रतिशत ने आप के प्रति समर्थन जताया.
दिल्ली में बीजेपी के नेता हर्षवर्धन मुख्यमंत्री के तौर पर पहली पसंद हैं. वोटरों की पसंद लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अलग-अलग है, लेकिन इस पोल से पता चलता है कि आप की लोकप्रियता घटी है. खासकर इस पार्टी के 49 दिनों के शासन के अनुभव के बाद. आप किसी भी तरह कांग्रेस की बी टीम नहीं है क्योंकि आप के संभावित चार वोटरों में से करीब तीन ने बताया कि वे कांग्रेस का साथ छोड़ रहे हैं.
इस तरह बीजेपी के मुकाबले आप ही कांग्रेस को ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है. बीजेपी की लोकप्रियता सभी जातियों, शैक्षिक वर्ग, विभिन्न आय वर्ग और लिंग वर्ग में है, लेकिन धर्म के आधार पर यह अलग है. मुसलमानों में बीजेपी की लोकप्रियता अपनी प्रतिद्वंद्वियों कांग्रेस और आप से बहुत पीछे है-छह मुस्लिम मतदाताओं में से एक ही बीजेपी का समर्थन कर सकता है.
देश की कुल 543 लोकसभा सीटों में से दिल्ली में सात सीटें हैं. जनसंख्या की विविधता के हिसाब से मिनी भारत दिल्ली के नतीजे अकसर अखिल भारतीय स्तर पर बीजेपी और कांग्रेस के प्रदर्शन का पूर्व संकेत देते हैं. 1991 को छोड़ दें तो 1977 के बाद से सभी चुनावों में कांग्रेस ने दिल्ली में अच्छा प्रदर्शन किए बिना अखिल भारतीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है. अपवाद तो कभी भी हो सकते हैं, लेकिन ओपिनियन पोल पर यकीन करें तो इस बार भी कहानी अलग नहीं होगी. तो क्या जो पार्टी दिल्ली जीतेगी, वही देश पर राज करेगी?
(लेखक अर्थशास्त्री और चुनाव विश्लेषक हैं)
लेकिन 27 से 28 मार्च को 1,200 वोटरों के बीच किए गए इंडिया टुडे ग्रुप और सिसेरो के ओपिनियन पोल में बीजेपी को 7 में से 6 सीटें मिलने का अनुमान है. कांग्रेस को अगर एक सीट मिल जाती है तो उसे खुद को खुशकिस्मत मानना चाहिए. इसी तरह आप को भी एक सीट पर संतोष करना पड़ सकता है. हर सैंपल में अनिश्चितता का तत्व मौजूद रहता है, इसलिए इस अनुमान में एक सीट का हेर-फेर हो सकता है.
दिल्लीवालों में किसी पार्टी के प्रति वफादारी करीब एक दशक तक कायम रहती है. इसके बाद वह दूसरी पार्टी की ओर तब्दील हो जाती है. 1980 का दशक कांग्रेस का रहा था और 1990 का दशक बीजेपी का. इसके बाद दिसंबर, 2013 तक कांग्रेस फिर से दिल्लीवालों की पसंदीदा पार्टी बन गई थी. 2004 में दिल्ली ने बीजेपी के सिर्फ एक उम्मीदवार को लोकसभा में भेजा था और 2009 में दिल्ली से उसका एक भी उम्मीदवार लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाया था.
उस साल दिल्ली ने अपनी सभी 7 सीटें कांग्रेस की झोली में डाल दी थीं. 2004 और 2009 के चुनावों में कांग्रेस को जहां आधे से ज्यादा वोट मिले थे, वहीं बीजेपी 14-22 प्रतिशत पीछे थी. 2004 से 2009 के बीच बीजेपी के वोटों का प्रतिशत 41 से गिरकर 35 हो गया था. 2009 में पांच लोकसभा सीटों पर कांग्रेस की जीत का अंतर 20 प्रतिशत से ज्यादा था और बाकी दो सीटों पर यह 10 प्रतिशत था. इससे पता चलता है कि कांग्रेस को कितनी बड़ी जीत मिली थी.
2013 के अंत तक कांग्रेस दिल्लीवालों से दूर हो चुकी थी. यह दूरी शायद 2012 की शुरुआत में ही आ गई थी, जब नगर निगम चुनाव हुए थे. दिसंबर, 2013 के विधानसभा चुनाव में दिल्ली के वोटरों ने कांग्रेस से लगभग पूरी तरह नाता तोड़ लिया. कांग्रेस का वोट प्रतिशत अपने सबसे निचले स्तर यानी 25 प्रतिशत पर पहुंच गया था.
आजादी के बाद से उसका प्रदर्शन इतना खराब कभी नहीं रहा. बीजेपी का वोट प्रतिशत 33 प्रतिशत पर अटक गया और अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आप को 29 प्रतिशत वोट मिले. दिल्ली विधानसभा चुनावों में 70 में से 28 सीटें जीतकर आप ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों को चिंता में डाल दिया था.
दिसंबर, 2013 के विधानसभा चुनावों से पहले तक दिल्ली में दो ही प्रमुख पार्टियां थीं-बीजेपी और कांग्रेस. हालांकि बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी (सपा) और जनता दल (सेकुलर) जैसी कुछ दूसरी पार्टियां और निर्दलीय उम्मीदवार भी होते थे, पर चुनावी गणित में उनका कोई खास दखल नहीं था. सात लोकसभा सीटों के लिए कुल 160 उम्मीदवारों में से 14 (कांग्रेस और बीजेपी के 7-7) को छोड़ सभी की जमानत जब्त हो गई थी.

ओपिनियन पोल के मुताबिक, इस बार दो पार्टियों में लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि यह लड़ाई अब मुख्य रूप से आप, बीजेपी और कांग्रेस के बीच त्रिकोणीय हो गई है. ममता बनर्जी की टीएमसी के चार प्रत्याशियों, समेत बाकी सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो सकती है.
ओपिनियन पोल दिखाता है कि दिल्ली में कांग्रेस की परेशानियां कम नहीं हुई हैं. बीजेपी फिर से दिल्लीवालों की पसंद बन गई है. पिछले विधानसभा चुनावों के बाद से बीजेपी के पक्ष में आठ प्रतिशत वोटों का झुकाव हुआ है, जबकि कांग्रेस के वोट प्रतिशत में दो प्रतिशत की और कमी आ गई है. आप के वोट प्रतिशत में भी डेढ़ प्रतिशत की कमी आती दिखती है.
मध्य दिल्ली और यमुना पार के इलाकों में बीजेपी चार लोकसभा सीटों पर और भी मजबूत दिख रही है. बाहरी दिल्ली की तीन लोकसभा सीटों पर आप की लोकप्रियता अपेक्षाकृत बरकरार है. यहां शहरी और अर्ध-शहरी वोटरों की संख्या ज्यादा है.
बीजेपी ने सिर्फ एक को छोड़कर 2009 के अपने सभी प्रत्याशियों को बदल दिया है. 2009 में दक्षिण दिल्ली से कांग्रेस उम्मीदवार रमेश कुमार से एक लाख से कम वोटों से हारने वाले रमेश बिधूड़ी को ही दोबारा टिकट दिया गया है. बाकी के सभी प्रत्याशी अपेक्षाकृत नए चेहरे हैं, जिनसे बीजेपी को फायदा हो सकता है.
दूसरी ओर, कांग्रेस ने 2009 में जीतने वाले सभी सात उम्मीदवारों को दोबारा मैदान में उतारा है. बीजेपी को मोदी लहर का भी फायदा हो रहा है. ओपिनियन पोल में 44 प्रतिशत वोटरों ने मोदी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में पसंद किया, जबकि 24 प्रतिशत ने अरविंद केजरीवाल और 19 प्रतिशत ने राहुल गांधी का नाम लिया.
दिल्ली देश के बाकी हिस्सों के मुकाबले कई मामलों में काफी आगे है. उदाहरण के लिए यहां साक्षरता दर 86.3 प्रतिशत (2011 की जनगणना) है, जो राष्ट्रीय औसत 74 प्रतिशत के मुकाबले ज्यादा है. ओपिनियन पोल के मुताबिक, यहां राजनैतिक जागरूकता भी ज्यादा है-99 प्रतिशत उत्तरदाताओं को आगामी चुनावों की जानकारी थी और 82 प्रतिशत ने तय कर लिया था कि वे किसे वोट देंगे. विभिन्न जनमत संग्रहों में देखी जा रही मोदी लहर को देखते हुए इस बात की संभावना कम ही है कि आखिरी मौके पर वोटरों का झुकाव बीजेपी के खिलाफ हो जाएगा.
उत्तरदाताओं से जब दूसरी पसंद के बारे में पूछा गया तो सिर्फ 3 प्रतिशत ने कांग्रेस की ओर इशारा किया जबकि 15 प्रतिशत ने बीजेपी और आप को दूसरी पसंद बताया. यूपीए-2 के प्रति नाराजगी है. सिर्फ 41 प्रतिशत उत्तरदाता पूरी तरह या आंशिक रूप से इसके कामकाम से संतुष्ट थे. 2009 में कांग्रेस को वोट देने वालों में से करीब 30 प्रतिशत ने बताया कि वे अब बीजेपी का समर्थन कर रहे हैं जबकि लगभग इतने ही प्रतिशत ने आप के प्रति समर्थन जताया.
दिल्ली में बीजेपी के नेता हर्षवर्धन मुख्यमंत्री के तौर पर पहली पसंद हैं. वोटरों की पसंद लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अलग-अलग है, लेकिन इस पोल से पता चलता है कि आप की लोकप्रियता घटी है. खासकर इस पार्टी के 49 दिनों के शासन के अनुभव के बाद. आप किसी भी तरह कांग्रेस की बी टीम नहीं है क्योंकि आप के संभावित चार वोटरों में से करीब तीन ने बताया कि वे कांग्रेस का साथ छोड़ रहे हैं.
इस तरह बीजेपी के मुकाबले आप ही कांग्रेस को ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है. बीजेपी की लोकप्रियता सभी जातियों, शैक्षिक वर्ग, विभिन्न आय वर्ग और लिंग वर्ग में है, लेकिन धर्म के आधार पर यह अलग है. मुसलमानों में बीजेपी की लोकप्रियता अपनी प्रतिद्वंद्वियों कांग्रेस और आप से बहुत पीछे है-छह मुस्लिम मतदाताओं में से एक ही बीजेपी का समर्थन कर सकता है.
देश की कुल 543 लोकसभा सीटों में से दिल्ली में सात सीटें हैं. जनसंख्या की विविधता के हिसाब से मिनी भारत दिल्ली के नतीजे अकसर अखिल भारतीय स्तर पर बीजेपी और कांग्रेस के प्रदर्शन का पूर्व संकेत देते हैं. 1991 को छोड़ दें तो 1977 के बाद से सभी चुनावों में कांग्रेस ने दिल्ली में अच्छा प्रदर्शन किए बिना अखिल भारतीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है. अपवाद तो कभी भी हो सकते हैं, लेकिन ओपिनियन पोल पर यकीन करें तो इस बार भी कहानी अलग नहीं होगी. तो क्या जो पार्टी दिल्ली जीतेगी, वही देश पर राज करेगी?
(लेखक अर्थशास्त्री और चुनाव विश्लेषक हैं)

