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गांव की इन महिलाओं ने चट्टानों का सीना चीरकर धरती की कोख से निकाल ली पानी की धार

पुरूष उड़ा रहे थे मजाक लेकिन गांव की इन आदिवासी महिलाओं ने चट्टानों का सीना चीरकर धरती की कोख से निकाल ली पानी की धार और दूर की पानी की कमी.

अपडेटेड 18 मार्च , 2014
मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्र खालवा का लंगोटी गांव दूसरे गांवों से ज्यादा अलग नहीं है. लेकिन यहां बने एक कुएं की कहानी ने इस गांव को देश क्या दुनिया के किसी भी गांव से अलहदा बना दिया है. पानी की समस्या से त्रस्त गांव की 20 महिलाओं ने चट्टानों को 25 फुट तक गहरा खोद डाला और धरती का सीना चीर पानी निकाल दिखाया है. कठोर चट्टानों पर सब्बल से लगातार वार कर उसे फटने को मजबूर करती 25 वर्षीया मिश्रीबाई कहती हैं, “गांव के पुरुष हमारी हंसी उड़ाते थे. कहते थे, कुआं खोदना औरतों के बस की बात नहीं है. हमने अपने काम से उन्हें जवाब दिया है. हमें खुद पर भी भरोसा हो गया कि अब हमें किसी भी काम के लिए किसी के आगे गिड़गिड़ाने की जरूरत नहीं है.”
खंडवा में महिलाओं के चट्टानों को चीरकर निकाला पानी
लंगोटी गांव की आबादी 2,000 से ज्यादा है जबकि पानी के स्रोत बेहद सीमित हैं. पानी की साल-दर-साल गहराती जा रही समस्या को हल करने के लिए गांव की महिलाओं ने पंचायत से लेकर प्रशासन तक, सब तरफ गुहार लगाई लेकिन मिले तो केवल आश्वासन. हर रोज दो-ढाई किलोमीटर दूर से पानी भरकर लाना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा था. सरपंचपति के सीताराम पटेल कहते हैं, “कुछ हैंडपंप बंद हैं तो कुछ कुओं का पानी प्रदूषित है. गर्मी में रहे-सहे जलस्रोत भी जवाब दे जाते हैं.” इस पर महिलाओं ने अपने ही परिवार के पुरुषों से कुआं खोदने को कहा. लेकिन वे भी मुफ्त में काम करने को तैयार न थे. फिर क्या था! महिलाओं ने खुद ही कुआं खोदने की ठान ली.

अब समस्या यह थी कि कुआं आखिर खोदा कहां जाए और जमीन कहां से मिले. इसके लिए भी एक महिला 60 वर्षीया रामकलीबाई ही आगे आईं. इस नेक काम के लिए उन्होंने अपनी जमीन दान कर दी. इस जमीन पर पानी किस जगह हो सकता है,  इसका अंदाजा गांव के एक बुजुर्ग ने अपने अनुभव के आधार पर लगाया. बस उसी जगह पर दो साल पहले, अप्रैल 2012 में महिलाओं ने खुदाई शुरू कर दी. दिन-रात इस काम में जुटी इन महिलाओं ने एक माह के भीतर ही करीब 12 फुट तक खोद डाला.
महिलाओं ने चट्टानों का सीना चीरकर निकाला पानी
लेकिन इन दिलेर महिलाओं के लिए चुनौती अभी खत्म नहीं हुई थी. खोदते-खोदते एक दिन उनकी कुदालियां कठोर चट्टानों से टकरा गईं. यह देख एकबारगी उनके हौसले पस्त हो गए. एक आशा थी कि उन्हें इस तरह मेहनत करता देख पंचायत पसीजेगी और आगे का काम पूरा करने की जिम्मेदारी खुद उठा लेगी. लेकिन महिला सरपंच खनायबाई की ओर से उन्हें कोई मदद नहीं मिली. गांव के सीताराम बताते हैं, “हाल में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान इस क्षेत्र के विधायक और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री विजय शाह यहां नलजल योजना की घोषणा कर गए थे. लेकिन हर तरफ से धोखा खा चुकी औरतों ने किसी पर भरोसा करने के बजाए इस काम को खुद ही पूरा करना बेहतर समझ है.”
महिलाओं ने चट्टानों को चीरकर निकाला पानी
31 जनवरी, 2014 को फिर से गांव की 20 महिलाओं ने कुदाल, सब्बल, छेनी, हथौड़ा और तगारियां लेकर कुएं पर मोर्चा संभाल लिया. 26 वर्षीया फूलवती घर के सारे काम निबटाने के बाद औजार और साथ में खाना लेकर रोज सुबह ठीक 9 बजे कुएं पर जा पहुंचतीं. यहां 20 वर्ष की युवतियों से लेकर 70 वर्ष की महिलाएं भी बिना थके सुबह 9 से शाम 5 बजे तक ड्यूटी पूरी करती हैं. इन महिलाओं ने महीने भर से भी कम समय में कुएं को 25 फुट गहरा कर दिया. महिलाओं की दिलेरी देख चट्टानें भी शायद पसीज गईं. 7 फरवरी को इस कुएं में से पानी की धारा निकल पड़ी. मिश्रीबाई कहती हैं, “अब हमें किसी के सहयोग की जरूरत नहीं है. इतना काम हमने खुद किया है, बाकी का भी कर लेंगे. अब कोई पुरुष आगे आकर मदद की पेशकश भी करता है तो हम साफ मना कर देते हैं.”
महिलाओं ने चट्टानों को चीरकर निकाला पानी
गांव की महिलाओं के चर्चे दूर-दूर तक पहुंच रहे हैं. लेकिन इनका हौसला बढ़ाने कोई जनप्रतिनिधि या अधिकारी खालवा नहीं पहुंचा है. जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अमित तोमर तो इस गांव की पेयजल समस्या से ही नावाकिफ हैं. पूछने पर कहते हैं, “पता लगाकर ही कुछ बता पाऊंगा.” हालांकि कलेक्टर नीरज दुबे महिलाओं के हौसले को सलाम करते हुए कहते हैं, “उन्होंने मिसाल कायम की है.” महिलाएं जो काम कर चुकी हैं उसे किसी सरकारी योजना में शामिल कर क्या मजदूरी का भुगतान संभव हो सकता है? इस पर कलेक्टर भी असमंजस में आ जाते हैं. हालांकि वे आश्वस्त करते हैं कि कुएं को और गहरा कर इसे पक्का बनाने में वे जरूर मदद करेंगे.

स्पंदन समाज सेवा समिति नाम का एक गैर-सरकारी संगठन इन महिलाओं की मदद के लिए जरूर आगे आया है. इसकी प्रमुख सीमा प्रकाश बताती हैं, “कुएं की खुदाई में जुटी महिलाओं को हमने प्रतिदिन 2 किलो चावल और पाव भर दाल दी है ताकि यह काम भी चलता रहे और उनका चूल्हा भी जलता रहे. अब अपने बूते वे हर चुनौती का सामना करने को तैयार हैं.” कौन कह सकेगा इन्हें अब अबला?
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