‘‘भले ही अंचल की पहचान चंबल घाटी और उसके डकैतों के रूप में होती रही हो, लेकिन ऐतिहासिक विरासत को सहेजे हुए ग्वालियर देश का ऐसा शहर है, जहां पर जीवंत धरोहर और परंपराएं बहुतायत में हैं और इन्हीं धरोहरों को सहेजकर रखने और आधुनिक युग की जरूरतों के हिसाब से ग्वालियर का विकास अब गति पकडऩे लगा है.
ग्वालियर को शिक्षा के साथ पर्यटन और औद्योगिक विकास का हब बनाने वाली योजनाएं तेजी से जमीन पर उतारी जा रही हैं. इसीलिए अकेले ग्वालियर शहर को सुंदर बनाने और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आधारभूत संरचनाओं पर 500 करोड़ रु. खर्च किए गए हैं.
ग्वालियर मध्य प्रदेश का प्रवेश द्वार है. दिल्ली से 350 किमी दूरी पर स्थित ग्वालियर में हर वह संभावना है, जो इसे बड़ा महानगर बनाने के लिए काफी हैं. राष्ट्रीय राजमार्ग-3, जिसे आगरा-मुंबई हाइवे कहा जाता है, उसके आसपास विकास की अपार संभावनाएं हैं.
यहां पर आधा दर्जन विश्वविद्यालय हैं, जो इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के साथ आर्ट और म्यूजिक, खेल और कृषि की शिक्षा देकर युवाओं को तैयार कर रहे हैं. प्रदेश और पड़ोसी राज्यों के छात्र ग्वालियर आकर इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. ग्वालियर में दो आइटी पार्क बनकर तैयार हैं और अब उनमें कंपनियों के आने का इंतजार है.
नए साधनों और इन्वेस्टमेंट के नए मौके मिलने से लोग ग्वालियर को पसंद करने लगे हैं.
ग्वालियर की मेयर समीक्षा गुप्ता कहती हैं, ‘‘इतिहास और संस्कृति से भरपूर यह शहर नई सदी में कदम रख चुका है. यही वजह है कि हर क्षेत्र में विकास जरूरी हो गया है. नगर निगम ने इन जरूरतों को बखूबी समझते हुए पूरे शहर में करीब 500 करोड़ रु. के विकास कार्य कराए हैं. शहर की सड़कों, बाजारों से अतिक्रमण हट चुका है और ये 50 फुट से ज्यादा चौड़ी हो गई हैं.’’ जाहिर है, इन सभी योजनाओं और नए प्रबंधन से शहर की आबादी में और ज्यादा इजाफा होने वाला है.
यही वजह है कि अब नगर नियोजक 2031 के हिसाब से योजनाएं बनाने में लगे हुए हैं. नया मास्टर प्लान हालांकि 2021 के हिसाब से बनाया गया है, लेकिन इसे और आगे बढ़ाया जाएगा. बीस साल में शहर की आबादी भी 10 लाख से बढ़कर 16 लाख होने की उम्मीद है और संसाधन भी इसी हिसाब से बनाए जा रहे हैं.
रोजगार के नए साधन और इन्वेस्टमेंट के मौके मिलने की वजह से लोग ग्वालियर को पसंद कर रहे हैं. ब्रांडेड कंपनियों के आउटलेट, शहर के सिटी मॉल में बढ़ती भीड़ इसकी गवाह है. हफ्ते के अंत में शहर के रेस्तरांओं में बैठने के लिए कतार में खड़ा होना पड़ता है. इस बात को सत्ता में बैठे नेता भी समझ्ने लगे हैं और पिछले साल के अंत में बीजेपी कार्यसमिति की बैठक में ग्वालियर को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर ) में शामिल करने का प्रस्ताव पास किया गया.
अगर केंद्र सरकार ग्वालियर को एनसीआर में शामिल करती है, तो वाकई में यहां की तरक्की कई गुना तेज हो जाएगी. टाउन और कंट्री प्लानिंग विभाग के संयुक्त संचालक वी.के. शर्मा कहते हैं कि ग्वालियर को शुरू से ही ऐसा बनाया गया है. अब ग्वालियर के आसपास विकास की संभावनाएं खोजी जा रही हैं.
प्रशासन का ध्यान पुराने शहर की ओर भी है. फ्लाइओवर बनाने की योजना पर तेजी से अमल हो रहा है. इससे ट्रैफिक की समस्या नहीं रहेगी. यह काम छह महीने में शुरू हो जाएगा. ग्वालियर के कलेक्टर पी. नरहरि बताते हैं कि उद्योगों को और ज्यादा गति देने के लिए मुरैना, शिवपुरी, गुना के साथ जोड़ते हुए औद्योगिक गलियारा बनाने की योजना बन चुकी है और यहां पर राजमार्ग के किनारे 5,000 एकड़ से ज्यादा जमीन उपलब्ध होगी.
ग्वालियर के आसपास छोटे-छोटे औद्योगिक क्षेत्र भी बनाए जा रहे हैं, जिसमें लघु और मझोले आकार के उद्योग लगाए जा सकेंगे.
करीब बीस साल पहले जब देश की राजधानी दिल्ली से आबादी का दबाव कम करने की योजना बनी, तो उसमें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की अवधारणा ने जन्म लिया और उसमें काउंटर मैग्नेट सिटी शहर के रूप में ग्वालियर का चयन हुआ. ग्वालियर से पांच किलोमीटर की दूरी पर सांक नदी के मध्य 30 हजार हेक्टेयर जमीन में यह नया शहर बसाने की कवायद शुरू हो चुकी है.
स्पेशल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (साडा) के पूर्व अध्यक्ष जय सिंह कुशवाह बताते हैं कि काउंटर मैग्नेट सिटी में दो लाख की आबादी के हिसाब से हर तरह की सुविधा उपलब्ध होगी. यहां पर राज्य स्तरीय सरकारी दफ्तरों के अलावा शैक्षणिक संस्थान भी अपने कैंपस विकसित कर रहे हैं. रियल एस्टेट कंपनियां यहां 2,000 करोड़ रु. की लागत से टाउनशिप विकसित कर रही हैं. तय है कि आने वाले समय में ग्वालियर की रौनक देखते ही बनेगी.
शहर एक नजर
ताकतः रेल और सड़क मार्ग से बेहतरीन कनेक्टिविटी. शहर की गतिशील प्रकृति. दिल्ली से करीब (350 किलोमीटर) की दूरी होने पर फायदा.
कमजोरीः कई प्रोजेक्ट्स में देरी और सरकारी विभागों में तालमेल की कमी.
संभावनाएं: मानव संसाधन की कमी नहीं होना और जमीन संबंधी विवाद कम होने से विकास की अपार संभावनाएं मौजूद हैं.
ग्वालियर को शिक्षा के साथ पर्यटन और औद्योगिक विकास का हब बनाने वाली योजनाएं तेजी से जमीन पर उतारी जा रही हैं. इसीलिए अकेले ग्वालियर शहर को सुंदर बनाने और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आधारभूत संरचनाओं पर 500 करोड़ रु. खर्च किए गए हैं.
ग्वालियर मध्य प्रदेश का प्रवेश द्वार है. दिल्ली से 350 किमी दूरी पर स्थित ग्वालियर में हर वह संभावना है, जो इसे बड़ा महानगर बनाने के लिए काफी हैं. राष्ट्रीय राजमार्ग-3, जिसे आगरा-मुंबई हाइवे कहा जाता है, उसके आसपास विकास की अपार संभावनाएं हैं.
यहां पर आधा दर्जन विश्वविद्यालय हैं, जो इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के साथ आर्ट और म्यूजिक, खेल और कृषि की शिक्षा देकर युवाओं को तैयार कर रहे हैं. प्रदेश और पड़ोसी राज्यों के छात्र ग्वालियर आकर इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. ग्वालियर में दो आइटी पार्क बनकर तैयार हैं और अब उनमें कंपनियों के आने का इंतजार है.
नए साधनों और इन्वेस्टमेंट के नए मौके मिलने से लोग ग्वालियर को पसंद करने लगे हैं.
ग्वालियर की मेयर समीक्षा गुप्ता कहती हैं, ‘‘इतिहास और संस्कृति से भरपूर यह शहर नई सदी में कदम रख चुका है. यही वजह है कि हर क्षेत्र में विकास जरूरी हो गया है. नगर निगम ने इन जरूरतों को बखूबी समझते हुए पूरे शहर में करीब 500 करोड़ रु. के विकास कार्य कराए हैं. शहर की सड़कों, बाजारों से अतिक्रमण हट चुका है और ये 50 फुट से ज्यादा चौड़ी हो गई हैं.’’ जाहिर है, इन सभी योजनाओं और नए प्रबंधन से शहर की आबादी में और ज्यादा इजाफा होने वाला है.
यही वजह है कि अब नगर नियोजक 2031 के हिसाब से योजनाएं बनाने में लगे हुए हैं. नया मास्टर प्लान हालांकि 2021 के हिसाब से बनाया गया है, लेकिन इसे और आगे बढ़ाया जाएगा. बीस साल में शहर की आबादी भी 10 लाख से बढ़कर 16 लाख होने की उम्मीद है और संसाधन भी इसी हिसाब से बनाए जा रहे हैं.
रोजगार के नए साधन और इन्वेस्टमेंट के मौके मिलने की वजह से लोग ग्वालियर को पसंद कर रहे हैं. ब्रांडेड कंपनियों के आउटलेट, शहर के सिटी मॉल में बढ़ती भीड़ इसकी गवाह है. हफ्ते के अंत में शहर के रेस्तरांओं में बैठने के लिए कतार में खड़ा होना पड़ता है. इस बात को सत्ता में बैठे नेता भी समझ्ने लगे हैं और पिछले साल के अंत में बीजेपी कार्यसमिति की बैठक में ग्वालियर को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर ) में शामिल करने का प्रस्ताव पास किया गया.
अगर केंद्र सरकार ग्वालियर को एनसीआर में शामिल करती है, तो वाकई में यहां की तरक्की कई गुना तेज हो जाएगी. टाउन और कंट्री प्लानिंग विभाग के संयुक्त संचालक वी.के. शर्मा कहते हैं कि ग्वालियर को शुरू से ही ऐसा बनाया गया है. अब ग्वालियर के आसपास विकास की संभावनाएं खोजी जा रही हैं.
प्रशासन का ध्यान पुराने शहर की ओर भी है. फ्लाइओवर बनाने की योजना पर तेजी से अमल हो रहा है. इससे ट्रैफिक की समस्या नहीं रहेगी. यह काम छह महीने में शुरू हो जाएगा. ग्वालियर के कलेक्टर पी. नरहरि बताते हैं कि उद्योगों को और ज्यादा गति देने के लिए मुरैना, शिवपुरी, गुना के साथ जोड़ते हुए औद्योगिक गलियारा बनाने की योजना बन चुकी है और यहां पर राजमार्ग के किनारे 5,000 एकड़ से ज्यादा जमीन उपलब्ध होगी.
ग्वालियर के आसपास छोटे-छोटे औद्योगिक क्षेत्र भी बनाए जा रहे हैं, जिसमें लघु और मझोले आकार के उद्योग लगाए जा सकेंगे.
करीब बीस साल पहले जब देश की राजधानी दिल्ली से आबादी का दबाव कम करने की योजना बनी, तो उसमें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की अवधारणा ने जन्म लिया और उसमें काउंटर मैग्नेट सिटी शहर के रूप में ग्वालियर का चयन हुआ. ग्वालियर से पांच किलोमीटर की दूरी पर सांक नदी के मध्य 30 हजार हेक्टेयर जमीन में यह नया शहर बसाने की कवायद शुरू हो चुकी है.
स्पेशल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (साडा) के पूर्व अध्यक्ष जय सिंह कुशवाह बताते हैं कि काउंटर मैग्नेट सिटी में दो लाख की आबादी के हिसाब से हर तरह की सुविधा उपलब्ध होगी. यहां पर राज्य स्तरीय सरकारी दफ्तरों के अलावा शैक्षणिक संस्थान भी अपने कैंपस विकसित कर रहे हैं. रियल एस्टेट कंपनियां यहां 2,000 करोड़ रु. की लागत से टाउनशिप विकसित कर रही हैं. तय है कि आने वाले समय में ग्वालियर की रौनक देखते ही बनेगी.
शहर एक नजर
ताकतः रेल और सड़क मार्ग से बेहतरीन कनेक्टिविटी. शहर की गतिशील प्रकृति. दिल्ली से करीब (350 किलोमीटर) की दूरी होने पर फायदा.
कमजोरीः कई प्रोजेक्ट्स में देरी और सरकारी विभागों में तालमेल की कमी.
संभावनाएं: मानव संसाधन की कमी नहीं होना और जमीन संबंधी विवाद कम होने से विकास की अपार संभावनाएं मौजूद हैं.

