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ये हैं आलू और मक्के की सबसे ज्यादा उपज देने वाले किसान

इन्होंने आलू और मक्के पर उस वक्त बड़ा दांव लगाया जब समूचा पंजाब ज्यादा मुनाफे वाले गेहूं और धान की फसल उगा रहा था. आज वे देश में आलू और मक्के की सबसे ज्यादा उपज देने वाले किसान हैं.

अपडेटेड 21 जनवरी , 2014
जिन पांच बड़े किसानों ने खेती के मायने बदले हैं, उनमें एक नाम है कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से पढ़कर आए जंग बहादुर सिंह सांघा का. उन्होंने आलू और मक्के पर उस वक्त बड़ा दांव लगाया जब समूचा पंजाब ज्यादा मुनाफे वाले गेहूं और धान की फसल उगा रहा था. आज वे देश में आलू और मक्के की सबसे ज्यादा उपज देने वाले किसान हैं.

कमरे में सांघा के पांव रखने के पहले ही उनके आने का ऐलान हो जाता है. पहली नजर में वे अरमानी शूट, उससे मेल खाती पगड़ी और क्रोकेट ऐंड जॉन्स के महंगे जूतों में किसी कंपनी घराने के मालिक से कम नहीं दिखते. उनकी वेश-भूषा देखकर आप सहज ही अंदाजा लगाएंगे कि उनके दिन मुंबई में हुसैन जैसे कलाकारों की पेंटिंग से सजे शानदार बोर्डरूम में गुजरते होंगे.

आप यह सोचकर ज्यादा गलत भी नहीं होंगे. सांघा पंजाब के समृद्ध किसान हैं और समूचे राज्य में फैले सैकड़ों एकड़ खेतों में आलू और मक्का उगाते हैं. यह जानकर आप चौंक जाएंगे. आलू और मक्का! भला कौन सोच पाएगा कि इन दो मामूली कृषि जिंसों से कोई समृद्धि का पहाड़ खड़ा कर पाएगा? सांघा ने ऐसा ही किया है. उनका परिवार आलू और मक्का पैदा करने में देश में अव्वल है

पंजाब भर में करीब 5,000 एकड़ में फैले खेतों में सांघा परिवार हर साल 45,000 टन आलू और 7,500 टन मक्का पैदा करता है. लेकिन सवाल पैदा होता है कि जिस दौर में पंजाब के किसान ज्यादा फायदेमंद गेहूं और धान की ओर रुख कर रहे थे, सांघा परिवार आलू से कैसे बुलंदी हासिल करने की ओर बढ़ा? जानकारों का मानना है कि उनकी कामयाबी का राज ऊंची टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल में है.
 कृषि अर्थशास्त्री सच्चा सिंह गिल कहते हैं, ‘‘सब्जी की फसलें हमेशा ही फायदेमंद रही हैं, लेकिन उनमें जोखिम ज्यादा है. सांघा जैसे किसानों ने टेक्नोलॉजी पर भरोसा किया और खूब कमाई की. जो किसान जोखिम उठा पाते हैं, कोल्ड स्टोरेज स्थापित करने की क्षमता रखते हैं और फसल प्रबंधन करते हैं, उन्हें कामयाबी मिलती है और मिलती रहेगी.’’

लेकिन सांघा ने दूसरी समस्याओं से कैसे पार पाया? ज्यादातर किसान छोटे आकार के खेतों से परेशान रहते हैं. भूमि हदबंदी कानून किसी एक व्यक्ति को ज्यादा जमीन रखने की इजाजत नहीं देता. सांघा बताते हैं, ‘‘दूसरे किसानों से हमारा तीन तरह का करार है. एक, हम उनके खेत किराए पर ले लेते हैं. दूसरे, हम उन्हें अपने अनुभव, ज्ञान की मदद से ये फसलें उगाने में मदद करते हैं. और, तीसरे, हम उनसे ठेके का करार करते हैं.’’

सांघा के पिता ने सबसे पहले 1960 के दशक में आलू की खेती शुरू की, लेकिन जंग बहादुर उसे दूसरी ऊंचाई पर ले गए. आज वे देश के सबसे आधुनिक और बड़े आकार की खेती में पारिवारिक व्यवसाय खड़ा करने में कामयाब रहे हैं. करीब 20 साल पहले वे कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से प्लांट फिजियोलॉजी और पैथोलॉजी में डिग्री हासिल करने के बाद घर लौटे और अपने खेतों में आधुनिक टिश्यू कल्चर लेबोरेटरी स्थापित की.

फिर, उन्होंने आलू की रोगमुक्त किस्म का क्लोन तैयार किया, बेहन तेजी से उगाने के लिए खेत तैयार किया. बेहन लगाने के पुराने तरीकों को छोड़कर नए तरीकों के इस्तेमाल से उनकी सालाना पैदावार 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ गई.

 दो दशक से सांघा परिवार बड़ी और बेहतरीन टेक्नोलॉजी पर निवेश में यकीन करता आ रहा है. जालंधर के बाहरी इलाके में कादियांवाली गांव में उनके फार्म पर पहुंचिए तो आपको उनके कृषि कारोबार की विशालता का अंदाजा हो जाएगा.  उनके खेतों में किसान पुराने ट्रैक्टरों की सवारी नहीं करते, बल्कि स्टाइलिस जॉन डीरे मशीन से जुताई करते दिखेंगे.

सांघा परिवार के पास ऐसे 175 ट्रैक्टरों का बेड़ा है. जंग बहादुर बताते हैं कि आलू की खेती में सबसे बड़ी समस्या दाम में भारी उतार-चढ़ाव है. वे कहते हैं, ‘‘मैं देश में सबसे बड़े किसानों में से एक हूं, फिर भी कर्ज में हूं. पिछले तीन साल में डीजल की कीमतें बढ़ी हैं, ब्याज दरें ऊंची हो गई हैं और मजदूरी बढ़ी है.’’

हालांकि, दुनिया में आलू पांचवीं सबसे बड़ी खाद्य फसल है और भारत 4 करोड़ टन पैदावार के साथ चीन के बाद दूसरे नंबर पर है. फिर भी, आलू में प्रचुर संभावनाएं हैं. मैककिंसी-सीआइआइ रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में आलू की कुल उपज का सिर्फ 7 प्रतिशत ही प्रसंस्कृत किया जाता है और पैदावार में दुनिया में ऊपर रहने के बावजूद हमारा देश इसका सबसे बड़ा निर्यातक नहीं है. मक्के में भी अपार संभावनाएं हैं.

अंतरराष्ट्रीय विपणन परामर्श फर्म केपीएमजी के अनुमान के मुताबिक, इसकी मांग 2011 में 1.86 करोड़ टन से बढ़कर 2022 तक 4.44 करोड़ टन तक पहुंचने की संभावना है. जानकार इसके विविध इस्तेमाल के कारण इसकी मांग बढऩे की संभावना देख रहे हैं. इसका इस्तेमाल भोजन के अलावा मवेशियों के चारे और औद्योगिक कच्चा माल की तरह भी होता है.

केपीएमजी इंडिया के निदेशक (समूह रणनीति) अंशुमान भट्टाचार्य कहते हैं, ‘‘मक्के की मांग तो 8.2 प्रतिशत की दर से बढ़ी है लेकिन आपूर्ति सिर्फ 5.8 प्रतिशत की दर से ही बढ़ी है इसलिए आपूर्ति में गंभीर कमी आने की संभावना है.’’

सो, आश्चर्य नहीं कि इस क्षेत्र में निवेशकों की रुचि बढ़ रही है. दुनिया की बड़ी स्टार्च उत्पादक फ्रांसीसी बहुराष्ट्रीय कंपनी रोक्वा ने भारतीय कंपनी रिद्धि-सिद्धि ग्लूको ब्वायल्स को खरीद लिया है. जरूरी जिंसों के कारोबार में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी कार्गिल 400 करोड़ रु. के प्रारंभिक निवेश से कर्नाटक में कॉर्न मिलिंग प्लांट लगा रही है.

स्टार्च के करोबार में देश में सबसे पुरानी सुखजीत स्टार्च ऐंड केमिकल्स के प्रबंध निदेशक आइ.के. सरदाना कहते हैं, ‘‘मक्का बेहद उपयोगी औद्योगिक कच्चा माल भी है. इसका इस्तेमाल टेक्सटाइल, भोजन, दवा और कागज उद्योग में बड़े पैमाने पर होता है.’’

इस क्षेत्र में विदेशी रुचि बढऩे के बावजूद सांघा खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के घोर विरोधी हैं. उनका मानना है कि इससे किसानों की मदद नहीं होगी, बल्कि वे बड़ी खुदरा चौन पर आश्रित हो जाएंगे. हालांकि वे कृषि क्षेत्र में निवेश के हिमायती हैं और भारत में निवेश की इच्छुक कृषि क्षेत्र की कई बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के संपर्क में हैं. वे कहते हैं, ‘‘हमने कोई करार अभी बंद नहीं किया है, बल्कि अभी समीक्षा कर रहे हैं.’’

सांघा परिवार का साम्राज्य पंजाब में जालंधर से लेकर लुधियाना तक फैला हुआ है. लेकिन फिलहाल सांघा कॉर्पोरेट सौदों की संभावनाएं तलाश रहे हैं. हालांकि कृषि में भी कॉर्पोरेट रुचि बढ़ रही है. आइटीसी जैसी घरेलू और पेप्सीको जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां देशभर में किसानों के पास सप्लाई के लिए पहुंच रही हैं.

पेप्सीको आलू से वेफर बनाती है. पेप्सीको इंडिया के कृषि तथा विदेशी मामलों के कार्यकारी निदेशक विवेक भारती कहते हैं, ‘‘हम किसानों को एक तय कीमत की पेशकश करते हैं और अच्छी फसल पर प्रीमियम भी देते हैं.’’ यानी सांघा जैसे किसानों के लिए प्रचुर संभावनाओं का बाजार खुल रहा है. 

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