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केरल का एक ऐसा गांव जहां कारखाने का पानी ढा रहा है मौत का कहर

जल को जीवन का आधार माना गया है. लेकिन एक गांव में ऐसा नहीं है. पानी यहां मौत का कहर है. इनसानों से लेकर पेड़-पौधों को खा रहा है यहां का जहरीला पानी.

अपडेटेड 27 जनवरी , 2014

एक बंजर खेत में ऊंचा ठूंठ हवा में इधर से उधर झूल रहा है. असल में यह नारियल का एक सूखा पेड़ है. इसके ऊपरी सिरे का हरा-भरा रोंएदार न होना असल में जीवन के खतरनाक अंत की ओर इशारा है. एक छोटे बच्चे की बीमार टांग की सूजी हुई खाल सूखे पेड़ की छाल जैसी लगती है. जमीन पर जगह-जगह लाल रंग के बुलबुले खदबदाते  रहते हैं. जहां तक नजर जाती है, इनसानों और पौधों के साझा दुश्मन की छाप दिखाई देती है.

केरल के कोल्लम जिले में चावरा खंड पंचायत के पानमाना गांव को जहरीले रसायन ने निगल लिया है. यह रसायन पोनमाना, मक्कड़ और चित्तूर तक फैल गया है. चावरा में सरकारी केरल मिनरल्स और मेटल्स लिमिटेड  (केएमएमएल) के कारखाने से निकलने वाला दूषित पानी 1984 में कारखाना लगने के समय से ही बह रहा है. कारखाने के जहरीले कचरे को इसके अहाते की जमीन में फेंका जाने लगा. आज यह कचरा पूरे गांव में फैल गया है. तेजाब और भारी धातुओं से भरी आयरन ऑक्साइड की गाद पुराने पड़ चुके तालाबों से रिसने लगी है. इसके कारण कैंसर और त्वचा की बीमारियां हो रही हैं. इस कारखाने में इल्मेनाइट से टाइटेनियम डाइ ऑक्साइड बनता है. इल्मेनाइट चावरा पट्टी की काली रेत में भरा पड़ा है.

जिन नहरों में कभी निर्मल जल बहा करता था, उनमें अब झागदार गंदगी बह रही है. यह जहरीला पानी घरेलू कुओं और तालाबों में भर गया है, पेड़-पौधे खत्म हो गए हैं. समुद्र के किनारे हराभरा रहने वाला पानमाना अब औद्योगिक प्रदूषण के कहर की मिसाल बन गया है.
चित्तूर की कैंसर रोगी
(चित्तूर की कैंसर रोगी 34 वर्षीया अनिता उन्नी, उनके ससुर पी. तमकप्पन और सास वी. ओमाना)
58 वर्षीया शास्त्रीय गायिका विजया जब कोई पुराना कीर्तन गुनगुनाने की कोशिश करती हैं, तो उनकी आवाज कांच की किर्चों की तरह चुभती है. वे ऐसे खंखारती हैं, मानो किसी ने उनका गला दबोच लिया हो. कारखाने से निकलता धुआं दोपहर के आसपास ज्यादा घना हो जाता है, तो विजया को घर के भीतरी कमरे में ले जाना पड़ता है. सारी खिड़कियां बंद कर दी जाती हैं, तब भी विजया को इन्हेलर के साथ सांस लेने में दिक्कत होती है. मशहूर स्थानीय गायिका सनत-विजया बहनों में से एक विजया फेफड़े के कैंसर से जूझ रही हैं. सच तो यह है कि पूरा पानमाना गांव कैंसर पीड़ितों का ठिकाना बन गया है और केएमएमएल का कारखाना नासूर की तरह खड़ा है. एक स्थानीय संगठन प्रदूषित क्षेत्र कल्याण सोसाइटी के सचिव डॉक्टर सुरेश कुमार ने बताया कि पिछले बीस साल में करीब बीस गांव वाले कैंसर की भेंट चढ़ चुके हैं. कइयों का इलाज चल रहा है. उनमें से कई लोग सामने नहीं आना चाहते. उन्हें डर है कि अगर परिवार में किसी को कैंसर होने की खबर फैल गई तो बेटियों की शादी नहीं हो पाएगी.

48 साल की लीला ने सितंबर में ही स्तन कैंसर का ऑपरेशन कराया है. उनका कहना है कि हम केएमएमएल के नजदीक रहते हैं और हम जानते हैं कि हम जिस हवा में सांस लेते हैं और जो पानी पीते हैं, उसमें जहर मिला है. लेकिन कोई रास्ता नहीं है. मेरे पति इसी कारखाने में काम करते हैं. 53 साल की सती देवकी को 2005 में स्तन कैंसर बताया गया और एक स्तन ऑपरेशन कर हटा दिया गया. अब उन्हें सिर में तेज दर्द होता है और त्वचा में एलर्जी का भी इलाज चल रहा है. बहुत से लोग रोजी-रोटी का साधन खत्म हो जाने की शिकायत करते हैं. साठ साल की पी. सुभाषिनी कहती हैं कि वटक्कयाल झील से मछली पकड़कर गुजारा होता था, लकिन अब वह तेजाब की झील बन गई है. 59 वर्ष के के. राधाकृष्ण पिल्लै के डेढ़ एकड़ खेत में धान की फसल चौपट हो गई. उन्होंने बताया कि खेत में आयरन ऑक्साइड की गाद भर गई है और अब खेती नहीं हो सकती.
नौ माह की अनखा तो त्वचा रोग है
(नौ माह की अनखा को त्वचा रोग है)
करीब 2,500 लोग गांव छोड़कर चले गए हैं. उनके पीछे 5,000 लोग केएमएमएल से दिन में दो घंटे मिलने वाले पानी पर गुजारा करते हैं. पेयजल का और कोई साधन नहीं है. सभी इलाकों में नियमित पानी भी नहीं आता. नौ माह के बच्चे आनाखा को त्वचा में एलर्जी हो गई है, क्योंकि उसकी मां सुमा के सामने नहाने और पकाने के लिए कुएं का दूषित पानी इस्तेमाल करने के सिवा कोई चारा नहीं है. चित्तूर के उत्तरी छोर पर रहने वाली सुमा ने बताया कि ''केएमएमएल हमारे इलाके में पानी नहीं देता.”

गांव वालों को अब सिर्फ राष्ट्रीय ग्रीन ट्राइब्यूनल का सहारा है. केरल हाइकोर्ट ने हाल ही में उसे एक याचिका सौंपी है. यह याचिका पिछले वर्ष मानवाधिकार कार्यकर्ता जॉय काइथरत ने दायर की थी. याचिका में आरोप है कि केएमएमएल विकिरण फैला रहा है, गांव वालों को पानी से वंचित रख रहा है, और जमीन तथा सतह के नीचे के पानी को दूषित कर रहा है. इसमें दावा किया गया है कि केएमएमएल पर्यावरण संरक्षण के किसी नियम का शायद ही पालन कर रहा है. ट्राइब्यूनल ने इस मामले में परमाणु ऊर्जा नियमन प्राधिकरण और केंद्रीय पर्यावरण तथा वन मंत्रालय को भी शामिल कर लिया है.

केएमएमएल नकदी की समस्या से जूझ रही राज्य सरकार के लिए कमाई का मुख्य स्रोत है. राज्य के खजाने में यह हर साल करीब 119 करोड़ रु. देता है. शायद इसीलिए जहर उगलने वाले इस  उद्योग पर अंकुश लगाने की कोई खास कोशिश नहीं हुई है. राज्य के उद्योग मंत्री पी.के. कुंजलीकुट्टी का कहना है, ''सरकार की नीति उन उद्योगों के विकास और प्रोत्साहन की है जो पर्यावरण को दूषित नहीं करते, लेकिन हम राज्य के खजाने में बड़ा योगदान करने वाले मुनाफे में चल रहे सरकारी कारखाने को बंद नहीं कर सकते. इसमें लोगों को रोजगार भी मिला है. हम इसे जनहितकारी ढंग से चलाने के उपाय अपनाएंगे.”
चित्तूर के मनमाना की शांता के खेत में कभी हरे-भरे पेड़ थे
(चित्तूर के मनमाना गांव की शांता श्रीसेलम के खेतों में केमिकल से बर्बाद होने से पहले नारियल के 28 हरे-भरे पेड़ थे)
केएमएमएल ने केरल राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (केएसपीसीबी) को सौंपे गए वार्षिक पर्यावरण वक्तव्य में स्वीकार किया है कि टाइटेनियम डाइऑक्साइड के उत्पादन में मुख्य रूप से आयरन ऑक्साइड की गाद और कचरा परिशोधन संयंत्र (ईटीपी) की गाद अपशिष्ट के रूप में निकलती है. कचरे के उपचार और निपटान के लिए केएमएमएल में कभी अपनी कोई व्यवस्था नहीं थी, इसलिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पुराने रिसते टैंकों को बंद करने का निर्देश दिया था. काइथरत का कहना है, ''पुराने तालाबों को मिट्टी से ढकना शुरू करके निर्देशों के पालन का इरादा दिखाया था लेकिन बाद में यह दावा कर दिया कि कचरे को कोच्चि के एक संयंत्र में भेजा जा रहा है और आयरन ऑक्साइड निजी कंपनियों को बेचा जा रहा है.”

1989 के हजार्डस वेस्ट रूल्स के नियम 20(4) के मुताबिक, कचरा पैदा करने वालों को यह तय करना चाहिए कि कचरे का निबटारा 90 दिनों के भीतर कर दिया जाए. केएमएमएल संयंत्र में यह कचरा असुरक्षित तालाबों में दो दशक से भी ज्यादा अरसे से पड़ा है. नए तालाब भी अगले चार महीने में भर जाएंगे.  

केएमएमएल का कहना है कि वह आयरन-ऑक्साइड और ईटीपी कचरे को सुरक्षित तालाबों में रखता है. इंडिया टुडे के एक सवाल पर कंपनी का कहना है, ''ये तालाब उस समय के नियमों को ध्यान में रखकर बनाए गए थे. इन्हें 2008 में छोड़ दिया गया और उसके बाद उनमें कोई कचरा नहीं डाला गया है.” उसका कहना है कि केंद्र के दिशा-निर्देशों के मुताबिक नए तालाब बनाए गए हैं. कंपनी का कहना है कि उसने परीक्षण के आधार पर सालेम में जिंदल स्टील वर्क्स को 9,000 मीट्रिक टन आयरन-ऑक्साइड बेचने के लिए समझौता किया था, जिसमें से 2,000 टन आयरन-ऑक्साइड पहले ही जा चुका है. लेकिन केएमएमएल के तालाबों में 3,12,800 टन आयरन-ऑक्साइड का कचरा और 2,72,000 टन ईटीपी का कचरा पड़ा है.
चित्तूर की 15 वर्षीया गायत्री जी. त्वचा रोग की शिकार है
(चित्तूर की 15 वर्षीया गायत्री जी. त्वचा रोग की शिकार है)
केएमएमएल का कहना है कि अपनी आजीविका के लिए 2,000 परिवार सीधे और 10,000 परिवार परोक्ष रूप से इस संयंत्र पर निर्भर हैं. इसके स्थायी कर्मचारियों में से 70 फीसदी से भी ज्यादा लोग स्थानीय हैं. लेकिन पंचायत प्रमुख ई. यूसुफ कुंजु का कहना है कि संयंत्र के प्रबंधकों ने गांववालों को अंशकालिक नौकरी देने का वादा करके हमेशा विरोध प्रदर्शन को दबाया है.
मलयाली ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि ओ.एन.वी. कुरुप की कविता भूमिक्कोरू चरमागीतम (मरती पृथ्वी का शोक गीत) गुनगुनाते हैं. विडंबना ही है कि इनसानी जिंदगी और प्रकृति को तबाह करने वाला संयंत्र इस महाकवि के जन्मस्थल चावरा में स्थित है.

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