खास लम्हा: जब दागी सांसदों से संबंधित अध्यादेश को बकवास बताया
अगर 2013 का साल विपक्षी खेमे के लिए घटना प्रधान रहा, बीजेपी ने कांग्रेस की तरह व्यक्ति को ज्यादा अहमियत देते हुए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया और वे पार्टी से बड़े हो गए, तो दूसरी ओर कांग्रेस ने भी राहुल को शीर्ष पर लाने की कवायद शुरू कर दी.
128 साल पुरानी पार्टी ने जनवरी, 2013 में हुए जयपुर चिंतन शिविर में 43 वर्षीय राहुल को पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया. राहुल ने अपने भाषण में पार्टी के लिए भविष्य की रूपरेखा तय करने की जगह परिवार की विरासत पर ही जोर दिया. चुनावी साल की पूर्व संध्या पर एक ऐसी पार्टी के लिए जो लगभग 10 साल से सत्ता में है और जिसे देश की मौजूदा ज्यादातर समस्याओं के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है, इससे ज्यादा चिंता की बात और कुछ नहीं हो सकती थी.
राहुल ने जयपुर में कहा, ''अब शासन, प्रशासन और राजनीति में फैसले लेने की केंद्रीकृत और गैर-जिम्मेदाराना व्यवस्था पर सवाल उठाने का समय आ गया है. इसका जवाब यह नहीं है कि लोग कहें, व्यवस्था को बेहतर ढंग से चलाने की जरूरत है. इसका जवाब व्यवस्था को बेहतर तरीके से चलाने में नहीं है. इसका जवाब यह है कि व्यवस्था को पूरी तरह बदलने की जरूरत है.”
वे दरअसल क्या कहना चाहते थे, इसका अर्थ वहां मौजूद कांग्रेस के लोगों की समझ में भी नहीं आया. राहुल ने जब बताया कि यह पद सौंपने से पहले उनकी मां उनके कमरे में आईं और रोने लगीं तो वहां मौजूद चाटुकारों की आंखों से गंगा-यमुना बहने लगी और वे रुमाल से अपने आंसू पोंछते नजर आए.
आउट-ऑफ-फॉर्म चल रहे किसी बल्लेबाज की तरह राहुल ने अपनी विरासत और पार्टी से बाहर लोगों की उम्मीदों के साथ अपने नजरिए को जोडऩे की नाकाम कोशिश की. राहुल ने पिछले साल अपने भाषणों से जो कुछ कहने की कोशिश की, उससे उनका संदेश और भी धुंधलाता गया, क्योंकि उनकी बातों में स्पष्टता की जगह अमूर्तवाद ही नजर आया.
उन्होंने अप्रैल में कन्फडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआइआइ) के सम्मेलन में उद्योगपतियों से कहा था कि ''भारत मधुमक्खी का छत्ता है और यहां की जटिलताओं को देखते हुए व्यापारियों को पश्चिम की तुलना में प्रतिस्पर्धा का ज्यादा लाभ मिलेगा.”
सोशल मीडिया में उनके भाषण का मजाक उड़ाते हुए उन्हें #पप्पू करार दिया गया. मोदी ने राजस्थान की एक जनसभा में कहा, ''राहुल गांधी कहते हैं कि भारत मधुमक्खी का छत्ता है, लेकिन हमारे लिए भारत हमारी मां है.” और जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो जनता ने सरलता की जगह राहुल की इन जटिल और अस्पष्ट बातों को नकार दिया.

इसी तरह राहुल ने अक्तूबर में दिल्ली में अनुसूचित जातियों के लिए आयोजित राष्ट्रीय जागरूकता शिविर में कहा था कि दलित समुदाय को सफलता पाने और भारत में दमन के सामाजिक ढांचे से बाहर निकलने के लिए जुपिटर की ''एस्केप वेलोसिटी” की दरकार है. शायद उन्हें पता नहीं कि एस्केप वेलोसिटी शब्दावली का प्रयोग आम तौर पर सामाजिक उत्थान के संदर्भ में किया जाता है. लेकिन जिस संदर्भ में उन्होंने इसका इस्तेमाल किया, वह लोगों की समझ में आ ही नहीं सका.
राहुल ने इसी तरह का एक और उदाहरण उस वक्त पेश किया जब उन्होंने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में पार्टी के कार्यक्रम में कम्युनिकेशन विभाग के प्रमुख अजय माकन को एक तरफ हटाते हुए घोषणा की कि दागी सांसदों को चुनाव में अयोग्य ठहराने से बचाने के लिए यूपीए सरकार का प्रस्तावित अध्यादेश ''पूरी तरह बकवास है और उसे फाड़कर फेंक दिया जाना चाहिए. यह मेरी निजी राय है.” लेकिन उनकी इस बेबाकी का मतदाताओं पर कोई असर नहीं हुआ.
अब विधानसभा चुनाव के नतीजों ने हो सकता है उन्हें कुछ कर दिखाने के लिए झ्कझेर दिया हो. 21 दिसंबर को फिक्की की बैठक में उन्होंने कहा, ''मैं अपनी बात यह स्वीकार करने के साथ शुरू करना चाहता हूं कि मेरे पिछली तिमाही के नतीजे बहुत अच्छे नहीं रहे हैं. मैं जानता हूं कि जब आप बुरी खबरों के साथ बैठक में जाते हैं तो कैसा महसूस होता है.”
साल का अंत राहुल की स्वीकारोक्ति के साथ हुआ है. समय कम है, ऐसे में उन्हें खुद के लिए एस्केप वेलोसिटी यानी दुष्चक्र से बाहर आने वाली रफ्तार की सख्त जरूरत होगी.
अगर 2013 का साल विपक्षी खेमे के लिए घटना प्रधान रहा, बीजेपी ने कांग्रेस की तरह व्यक्ति को ज्यादा अहमियत देते हुए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया और वे पार्टी से बड़े हो गए, तो दूसरी ओर कांग्रेस ने भी राहुल को शीर्ष पर लाने की कवायद शुरू कर दी.
128 साल पुरानी पार्टी ने जनवरी, 2013 में हुए जयपुर चिंतन शिविर में 43 वर्षीय राहुल को पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया. राहुल ने अपने भाषण में पार्टी के लिए भविष्य की रूपरेखा तय करने की जगह परिवार की विरासत पर ही जोर दिया. चुनावी साल की पूर्व संध्या पर एक ऐसी पार्टी के लिए जो लगभग 10 साल से सत्ता में है और जिसे देश की मौजूदा ज्यादातर समस्याओं के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है, इससे ज्यादा चिंता की बात और कुछ नहीं हो सकती थी.
राहुल ने जयपुर में कहा, ''अब शासन, प्रशासन और राजनीति में फैसले लेने की केंद्रीकृत और गैर-जिम्मेदाराना व्यवस्था पर सवाल उठाने का समय आ गया है. इसका जवाब यह नहीं है कि लोग कहें, व्यवस्था को बेहतर ढंग से चलाने की जरूरत है. इसका जवाब व्यवस्था को बेहतर तरीके से चलाने में नहीं है. इसका जवाब यह है कि व्यवस्था को पूरी तरह बदलने की जरूरत है.”
वे दरअसल क्या कहना चाहते थे, इसका अर्थ वहां मौजूद कांग्रेस के लोगों की समझ में भी नहीं आया. राहुल ने जब बताया कि यह पद सौंपने से पहले उनकी मां उनके कमरे में आईं और रोने लगीं तो वहां मौजूद चाटुकारों की आंखों से गंगा-यमुना बहने लगी और वे रुमाल से अपने आंसू पोंछते नजर आए.
आउट-ऑफ-फॉर्म चल रहे किसी बल्लेबाज की तरह राहुल ने अपनी विरासत और पार्टी से बाहर लोगों की उम्मीदों के साथ अपने नजरिए को जोडऩे की नाकाम कोशिश की. राहुल ने पिछले साल अपने भाषणों से जो कुछ कहने की कोशिश की, उससे उनका संदेश और भी धुंधलाता गया, क्योंकि उनकी बातों में स्पष्टता की जगह अमूर्तवाद ही नजर आया.
उन्होंने अप्रैल में कन्फडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआइआइ) के सम्मेलन में उद्योगपतियों से कहा था कि ''भारत मधुमक्खी का छत्ता है और यहां की जटिलताओं को देखते हुए व्यापारियों को पश्चिम की तुलना में प्रतिस्पर्धा का ज्यादा लाभ मिलेगा.”
सोशल मीडिया में उनके भाषण का मजाक उड़ाते हुए उन्हें #पप्पू करार दिया गया. मोदी ने राजस्थान की एक जनसभा में कहा, ''राहुल गांधी कहते हैं कि भारत मधुमक्खी का छत्ता है, लेकिन हमारे लिए भारत हमारी मां है.” और जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो जनता ने सरलता की जगह राहुल की इन जटिल और अस्पष्ट बातों को नकार दिया.

इसी तरह राहुल ने अक्तूबर में दिल्ली में अनुसूचित जातियों के लिए आयोजित राष्ट्रीय जागरूकता शिविर में कहा था कि दलित समुदाय को सफलता पाने और भारत में दमन के सामाजिक ढांचे से बाहर निकलने के लिए जुपिटर की ''एस्केप वेलोसिटी” की दरकार है. शायद उन्हें पता नहीं कि एस्केप वेलोसिटी शब्दावली का प्रयोग आम तौर पर सामाजिक उत्थान के संदर्भ में किया जाता है. लेकिन जिस संदर्भ में उन्होंने इसका इस्तेमाल किया, वह लोगों की समझ में आ ही नहीं सका.
राहुल ने इसी तरह का एक और उदाहरण उस वक्त पेश किया जब उन्होंने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में पार्टी के कार्यक्रम में कम्युनिकेशन विभाग के प्रमुख अजय माकन को एक तरफ हटाते हुए घोषणा की कि दागी सांसदों को चुनाव में अयोग्य ठहराने से बचाने के लिए यूपीए सरकार का प्रस्तावित अध्यादेश ''पूरी तरह बकवास है और उसे फाड़कर फेंक दिया जाना चाहिए. यह मेरी निजी राय है.” लेकिन उनकी इस बेबाकी का मतदाताओं पर कोई असर नहीं हुआ.
अब विधानसभा चुनाव के नतीजों ने हो सकता है उन्हें कुछ कर दिखाने के लिए झ्कझेर दिया हो. 21 दिसंबर को फिक्की की बैठक में उन्होंने कहा, ''मैं अपनी बात यह स्वीकार करने के साथ शुरू करना चाहता हूं कि मेरे पिछली तिमाही के नतीजे बहुत अच्छे नहीं रहे हैं. मैं जानता हूं कि जब आप बुरी खबरों के साथ बैठक में जाते हैं तो कैसा महसूस होता है.”
साल का अंत राहुल की स्वीकारोक्ति के साथ हुआ है. समय कम है, ऐसे में उन्हें खुद के लिए एस्केप वेलोसिटी यानी दुष्चक्र से बाहर आने वाली रफ्तार की सख्त जरूरत होगी.

