“राज्यों में शासन की स्थिति भारत में शासन से तो बेहतर ही है.” यह बात सुनने में भले थोड़ा अटपटी लगती हो लेकिन इस चुनावी साल में बन रहे सियासी माहौल की झलक तो दे ही देती है. चुनाव के इस साल में सारी बातचीत लस्टम-पस्टम ढंग से घिसटती केंद्र सरकार और उसे एक मजबूत मुख्यमंत्री से मिल रही चुनौती पर केंद्रित है.
कुछ राज्यों में हाल ही हुए विधानसभा चुनाव के ताजा दौर के नतीजों की भी झलक इसमें दिखाई दे रही थी. सुशासन को इन राज्यों की जनता ने दिल खोलकर इनाम दिया. दूसरी ओर केंद्र में एक नाकारा किस्म की मानी जाने वाली सरकार से संबद्ध नेताओं को बुरी तरह मार खानी पड़ी.
20 दिसंबर को नई दिल्ली में इंडिया टुडे समूह की ओर से आयोजित स्टेट ऑफ स्टेट्स (एसओएस) यानी राज्यों की दशा और दिशा कॉन्क्लेव का कुछ यही लब्बोलुबाब था.
इस आयोजन में पांच मुख्यमंत्रियों सहित राजनीति के कुछ सबसे बड़े नाम और कारोबार जगत की नामचीन हस्तियां मौजूद थीं. उद्घाटन भाषण में इंडिया टुडे के चेयरमैन और प्रधान संपादक अरुण पुरी ने कहा कि देश में खास तौर पर युवा वर्ग में बदलाव के लिए तगड़ी बेचैनी है. उसी का नतीजा था कि राज्यों में उस बदलाव ने चुपचाप आकार ले लिया.
उनका कहना था, ''पूर्वोत्तर के सीमावर्ती राज्यों से लेकर पश्चिमी घाट तक, दक्षिणी तट से लेकर हिमालय तक सबसे अच्छा करके दिखाने वाले हर जगह मौजूद हैं. इन राज्यों ने मिलकर भारत की उस संकल्पना को जीवित रखा है, जिसमें हम सब विश्वास करते आए हैं.
यानी कि एक ग्लोबल अगुआ, जो आर्थिक शक्ति संपन्न भी हो और सामाजिक न्याय में भी बड़ी ताकत हो.” उनका यह भी कहना था कि इसके ठीक उलट, केंद्र सरकार ने जितना पैसा परियोजनाओं में इस्तेमाल किया है, उससे कहीं ज्यादा घोटालों में गंवाया है.
आयोजन के मुख्य अतिथि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश बड़े ही सहज अंदाज में थे और जैसे तय करके आए थे कि किसी जाल में नहीं फंसेंगे. इसकी बजाए उन्होंने साल दर साल 'राज्यों की दशा और दिशा’ सर्वेक्षण निष्पक्ष ढंग से किए जाने की सराहना की और कहा कि हर राज्य में कामयाबी की कोई न कोई ऐसी दास्तान मौजूद है, जिससे दूसरे राज्य सबक ले सकते हैं.
उनका कहना था कि गुजरात का आर्थिक मॉडल अच्छा है, तो केरल ने स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक संकेतकों में जबरदस्त तरक्की की है और तमिलनाडु ने आर्थिक वृद्धि को सामाजिक विकास से जोड़ा है. रमेश ने कहा, ''लोग अकसर कहते हैं कि भारत की शक्ति विविधता में एकता है, पर मैं इसे विविधता के जरिए एकता कहता हूं.”
राज्य स्तर पर सशक्त नेतृत्व का उभरना इस ओर इशारा करता है कि सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ है लेकिन, रमेश के मुताबिक, अब इस विचार को आगे ले जाना होगा. उन्होंने कहा कि ''सारी चीजों की केंद्र सरकार निगरानी करे, यह विचार अब पुराना पड़ चुका है.
अब तो सत्ता की लगाम न सिर्फ राज्यों बल्कि स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ में देनी होगी. कई मुख्यमंत्री आकर केंद्र से कहते हैं कि वे दिल्ली से आजादी चाहते हैं, लेकिन वही मुख्यमंत्री ग्राम स्तर की संस्थाओं को अधिकार और धन देने में अकसर कतराते हैं.”

सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले राज्यों को पुरस्कृत किये जाने के बाद रमेश का भाषण हुआ. छोटे राज्य वाले वर्ग में होने के बावजूद गोवा बड़ा विजेता बना. राज्य के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को शिक्षा, बुनियादी ढांचा, उपभोक्ता बाजार, निवेश, मैक्रो इकोनॉमी यानी वृहद अर्थव्यवस्था और फिर समग्र श्रेष्ठता का पुरस्कार लेने के लिए बार-बार मंच पर बुलाया गया. बड़े राज्यों में सर्वश्रेष्ठ का पुरस्कार केरल को मिला.
दूसरे बड़े विजेताओं में शासन वर्ग में आंध्र प्रदेश अव्वल रहा. अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर राज्य में हो रही उथल-पुथल को देखते हुए यह बड़ी उपलब्धि रही. ज्यूरी का विशेष पुरस्कार ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को वर्ष के शुरू में चक्रवाती तूफान पाइलिन के समय आपदा टालने में उल्लेखनीय प्रयास के लिए दिया गया.
इस तरह की कामयाबी का क्या कोई खास तरीका है? पुरस्कारों के बाद हुए पैनल डिस्कशन में मनोहर पर्रिकर, जयराम रमेश, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. किरण कुमार रेड्डी और हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने विकास का वादा बनाम लोकलुभावन योजनाओं की सचाई पर बहस की. हाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के लिए कुछ लोग लोकलुभावन योजनाओं पर अनावश्यक जोर को जिम्मेदार मान रहे हैं.
जबकि दूसरी ओर भाजपा विकास को प्राथमिकता दे रही है. बहस की शुरुआत करते हुए जयराम रमेश ने लोकलुभावन शब्द के इस्तेमाल पर असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि कल्याण योजनाओं के महत्व पर सबकी एक राय रही है. उनका कहना था कि ''लोग अकसर किसी कड़क राजनेता की तरफ यह सोचकर आकर्षित हो जाते हैं कि वह लोकलुभावन राजनीति नहीं करेगा.
लेकिन इस बात की संभावना बहुत कम होती है कि नया नेता पिछली सरकार की कल्याण योजनाओं को रद्द करे. मिसाल के तौर पर मुझे इस बात से बहुत हैरानी होगी, अगर राजस्थान की नई मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे मुफ्त दवा देने की अशोक गहलोत की योजना बंद कर देती हैं.”
पर्रिकर और रेड्डी की नजर में बहस का ज्यादा बड़ा मुद्दा था कल्याणकारी योजनाओं पर कारगर ढंग से अमल करने के लिए सुशासन का उपयोग. पर्रिकर ने कहा कि ''गैर चुनावी साल में ऐसी योजनाएं बनाई जा सकती हैं, जो सिर्फ वोट न दिलाएं बल्कि लंबे समय तक सामाजिक विकास के लिए हों. मिसाल के तौर पर गोवा सरकार ने ही 2002 में नकदी सीधे खाते में डालने की योजना शुरू की थी.
राज्य के सामने चुनौती यह पता लगाने की है कि पैसा लाभार्थी तक पहुंच रहा है या नहीं.” आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी ने इससे सहमत होते हुए कहा कि पहले योजना के उद्देश्य का आकलन होना चाहिए और उन लोगों का पूरा आंकड़ा रखा जाना चाहिए, जिन्हें लाभ देना है. उनका कहना था कि ''सभी योजनाओं को लोकलुभावन नहीं कहा जा सकता.”
स्थानीय निकायों को सशक्त बनाना योजनाओं पर कारगर अमल का एक तरीका हो सकता है. तीनों मुख्यमंत्रियों का कहना था कि वे अधिकारों के विकेंद्रीकरण पर काम कर रहे हैं. बातचीत का रुख राजनीति में नई उभरती शक्ति अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की तरफ मुडऩा स्वाभाविक था.

दिल्ली में पार्टी की सनसनीखेज जीत जनता की सरकार बनाने के वादे पर टिकी है, जिसमें फैसले मुहल्ला सभाओं में होंगे. गोष्ठी में शामिल दिग्गज नेताओं के चेहरे इस पर व्यंग्य भरी मुस्कान से खिल उठे. हालांकि उन्होंने माना कि भारतीय राजनीति को ऐसे रोमांटिक विचारों की जरूरत है.
रमेश बोले, ''अमेरिकी राजनेता मारियो क्यूमो ने एक बार कहा था कि आप कविता में प्रचार तो कर सकते हैं लेकिन शासन गद्य में ही होता है. आप को जनादेश पर अमल का हक दिया जाना चाहिए. उसे जल्दी ही मुश्किलों का एहसास हो जाएगा.”
स्थानीय निकायों को कारगर ढंग से सशक्त कर पाने वाला एक राज्य है त्रिपुरा. उसके मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने इस काम में नेतृत्व की चुनौती का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि ''राजनीति में ऊपर बैठे अधिकार प्राप्त लोगों को कार्यक्रम तैयार करने चाहिए और निर्णय लेने में जनता की भागीदारी होनी चाहिए.
त्रिपुरा में स्थानीय शासन बहुत जीवंत है. हम ग्राम पंचायत और नगरपालिका स्तर पर चुने हुए प्रतिनिधियों से आगे बढ़कर जनता से संपर्क रखते हैं. नीतियों और योजनाओं के बारे में उनकी राय सुनते हैं.”
बीजू जनता दल के सांसद जय पांडा ने माणिक सरकार से सहमति व्यक्त की कि राज्य भले ही बड़ा हो या छोटा, अगर तंत्र मजबूत है तो कारगर प्रशासन हो सकता है. पाइलिन तूफान से कारगर ढंग से निबटने का प्रबंध रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि इसके लिए पिछले एक दशक में ओडिसा में पूरे तंत्र को व्यवस्थित ढंग से सुधारा गया.
उन्होंने बताया कि ''पिछले एक दशक में हमने सकल घरेलू उत्पाद में दस प्रतिशत की वृद्धि की है और पिछले साल भारत की जीडीपी से दोगुनी वृद्धि हुई है. हमें एक दशक और देकर देखिए.”
अगले साल इन दोनों मॉडलों की आजमाइश होने की उम्मीद है और इससे भी कहीं बड़े सवालों पर सोचने की जरूरत पड़ेगी. अगर केंद्र में बीजेपी को जनादेश मिल गया तो क्या मजबूत नेतृत्व का उसका वादा वास्तव में बदलाव ला पाएगा?
क्या डायरेक्ट डेमोक्रेसी (सीधा लोकतंत्र) का आप का सिद्धांत शासन का पूरा ढांचा बदल देगा? और इसका राज्यों की दशा-दिशा पर क्या असर पड़ेगा? प्रदर्शन के लिए मजबूत बुनियाद डाली जा चुकी है. अगले संस्करण में कुछ दिलचस्प नतीजे दिखाई दे सकते हैं.
कुछ राज्यों में हाल ही हुए विधानसभा चुनाव के ताजा दौर के नतीजों की भी झलक इसमें दिखाई दे रही थी. सुशासन को इन राज्यों की जनता ने दिल खोलकर इनाम दिया. दूसरी ओर केंद्र में एक नाकारा किस्म की मानी जाने वाली सरकार से संबद्ध नेताओं को बुरी तरह मार खानी पड़ी.
20 दिसंबर को नई दिल्ली में इंडिया टुडे समूह की ओर से आयोजित स्टेट ऑफ स्टेट्स (एसओएस) यानी राज्यों की दशा और दिशा कॉन्क्लेव का कुछ यही लब्बोलुबाब था.
इस आयोजन में पांच मुख्यमंत्रियों सहित राजनीति के कुछ सबसे बड़े नाम और कारोबार जगत की नामचीन हस्तियां मौजूद थीं. उद्घाटन भाषण में इंडिया टुडे के चेयरमैन और प्रधान संपादक अरुण पुरी ने कहा कि देश में खास तौर पर युवा वर्ग में बदलाव के लिए तगड़ी बेचैनी है. उसी का नतीजा था कि राज्यों में उस बदलाव ने चुपचाप आकार ले लिया.
उनका कहना था, ''पूर्वोत्तर के सीमावर्ती राज्यों से लेकर पश्चिमी घाट तक, दक्षिणी तट से लेकर हिमालय तक सबसे अच्छा करके दिखाने वाले हर जगह मौजूद हैं. इन राज्यों ने मिलकर भारत की उस संकल्पना को जीवित रखा है, जिसमें हम सब विश्वास करते आए हैं.
यानी कि एक ग्लोबल अगुआ, जो आर्थिक शक्ति संपन्न भी हो और सामाजिक न्याय में भी बड़ी ताकत हो.” उनका यह भी कहना था कि इसके ठीक उलट, केंद्र सरकार ने जितना पैसा परियोजनाओं में इस्तेमाल किया है, उससे कहीं ज्यादा घोटालों में गंवाया है.
आयोजन के मुख्य अतिथि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश बड़े ही सहज अंदाज में थे और जैसे तय करके आए थे कि किसी जाल में नहीं फंसेंगे. इसकी बजाए उन्होंने साल दर साल 'राज्यों की दशा और दिशा’ सर्वेक्षण निष्पक्ष ढंग से किए जाने की सराहना की और कहा कि हर राज्य में कामयाबी की कोई न कोई ऐसी दास्तान मौजूद है, जिससे दूसरे राज्य सबक ले सकते हैं.
उनका कहना था कि गुजरात का आर्थिक मॉडल अच्छा है, तो केरल ने स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक संकेतकों में जबरदस्त तरक्की की है और तमिलनाडु ने आर्थिक वृद्धि को सामाजिक विकास से जोड़ा है. रमेश ने कहा, ''लोग अकसर कहते हैं कि भारत की शक्ति विविधता में एकता है, पर मैं इसे विविधता के जरिए एकता कहता हूं.”
राज्य स्तर पर सशक्त नेतृत्व का उभरना इस ओर इशारा करता है कि सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ है लेकिन, रमेश के मुताबिक, अब इस विचार को आगे ले जाना होगा. उन्होंने कहा कि ''सारी चीजों की केंद्र सरकार निगरानी करे, यह विचार अब पुराना पड़ चुका है.
अब तो सत्ता की लगाम न सिर्फ राज्यों बल्कि स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ में देनी होगी. कई मुख्यमंत्री आकर केंद्र से कहते हैं कि वे दिल्ली से आजादी चाहते हैं, लेकिन वही मुख्यमंत्री ग्राम स्तर की संस्थाओं को अधिकार और धन देने में अकसर कतराते हैं.”

सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले राज्यों को पुरस्कृत किये जाने के बाद रमेश का भाषण हुआ. छोटे राज्य वाले वर्ग में होने के बावजूद गोवा बड़ा विजेता बना. राज्य के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को शिक्षा, बुनियादी ढांचा, उपभोक्ता बाजार, निवेश, मैक्रो इकोनॉमी यानी वृहद अर्थव्यवस्था और फिर समग्र श्रेष्ठता का पुरस्कार लेने के लिए बार-बार मंच पर बुलाया गया. बड़े राज्यों में सर्वश्रेष्ठ का पुरस्कार केरल को मिला.
दूसरे बड़े विजेताओं में शासन वर्ग में आंध्र प्रदेश अव्वल रहा. अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर राज्य में हो रही उथल-पुथल को देखते हुए यह बड़ी उपलब्धि रही. ज्यूरी का विशेष पुरस्कार ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को वर्ष के शुरू में चक्रवाती तूफान पाइलिन के समय आपदा टालने में उल्लेखनीय प्रयास के लिए दिया गया.
इस तरह की कामयाबी का क्या कोई खास तरीका है? पुरस्कारों के बाद हुए पैनल डिस्कशन में मनोहर पर्रिकर, जयराम रमेश, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. किरण कुमार रेड्डी और हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने विकास का वादा बनाम लोकलुभावन योजनाओं की सचाई पर बहस की. हाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के लिए कुछ लोग लोकलुभावन योजनाओं पर अनावश्यक जोर को जिम्मेदार मान रहे हैं.
जबकि दूसरी ओर भाजपा विकास को प्राथमिकता दे रही है. बहस की शुरुआत करते हुए जयराम रमेश ने लोकलुभावन शब्द के इस्तेमाल पर असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि कल्याण योजनाओं के महत्व पर सबकी एक राय रही है. उनका कहना था कि ''लोग अकसर किसी कड़क राजनेता की तरफ यह सोचकर आकर्षित हो जाते हैं कि वह लोकलुभावन राजनीति नहीं करेगा.
लेकिन इस बात की संभावना बहुत कम होती है कि नया नेता पिछली सरकार की कल्याण योजनाओं को रद्द करे. मिसाल के तौर पर मुझे इस बात से बहुत हैरानी होगी, अगर राजस्थान की नई मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे मुफ्त दवा देने की अशोक गहलोत की योजना बंद कर देती हैं.”
पर्रिकर और रेड्डी की नजर में बहस का ज्यादा बड़ा मुद्दा था कल्याणकारी योजनाओं पर कारगर ढंग से अमल करने के लिए सुशासन का उपयोग. पर्रिकर ने कहा कि ''गैर चुनावी साल में ऐसी योजनाएं बनाई जा सकती हैं, जो सिर्फ वोट न दिलाएं बल्कि लंबे समय तक सामाजिक विकास के लिए हों. मिसाल के तौर पर गोवा सरकार ने ही 2002 में नकदी सीधे खाते में डालने की योजना शुरू की थी.
राज्य के सामने चुनौती यह पता लगाने की है कि पैसा लाभार्थी तक पहुंच रहा है या नहीं.” आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी ने इससे सहमत होते हुए कहा कि पहले योजना के उद्देश्य का आकलन होना चाहिए और उन लोगों का पूरा आंकड़ा रखा जाना चाहिए, जिन्हें लाभ देना है. उनका कहना था कि ''सभी योजनाओं को लोकलुभावन नहीं कहा जा सकता.”
स्थानीय निकायों को सशक्त बनाना योजनाओं पर कारगर अमल का एक तरीका हो सकता है. तीनों मुख्यमंत्रियों का कहना था कि वे अधिकारों के विकेंद्रीकरण पर काम कर रहे हैं. बातचीत का रुख राजनीति में नई उभरती शक्ति अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की तरफ मुडऩा स्वाभाविक था.

दिल्ली में पार्टी की सनसनीखेज जीत जनता की सरकार बनाने के वादे पर टिकी है, जिसमें फैसले मुहल्ला सभाओं में होंगे. गोष्ठी में शामिल दिग्गज नेताओं के चेहरे इस पर व्यंग्य भरी मुस्कान से खिल उठे. हालांकि उन्होंने माना कि भारतीय राजनीति को ऐसे रोमांटिक विचारों की जरूरत है.
रमेश बोले, ''अमेरिकी राजनेता मारियो क्यूमो ने एक बार कहा था कि आप कविता में प्रचार तो कर सकते हैं लेकिन शासन गद्य में ही होता है. आप को जनादेश पर अमल का हक दिया जाना चाहिए. उसे जल्दी ही मुश्किलों का एहसास हो जाएगा.”
स्थानीय निकायों को कारगर ढंग से सशक्त कर पाने वाला एक राज्य है त्रिपुरा. उसके मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने इस काम में नेतृत्व की चुनौती का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि ''राजनीति में ऊपर बैठे अधिकार प्राप्त लोगों को कार्यक्रम तैयार करने चाहिए और निर्णय लेने में जनता की भागीदारी होनी चाहिए.
त्रिपुरा में स्थानीय शासन बहुत जीवंत है. हम ग्राम पंचायत और नगरपालिका स्तर पर चुने हुए प्रतिनिधियों से आगे बढ़कर जनता से संपर्क रखते हैं. नीतियों और योजनाओं के बारे में उनकी राय सुनते हैं.”
बीजू जनता दल के सांसद जय पांडा ने माणिक सरकार से सहमति व्यक्त की कि राज्य भले ही बड़ा हो या छोटा, अगर तंत्र मजबूत है तो कारगर प्रशासन हो सकता है. पाइलिन तूफान से कारगर ढंग से निबटने का प्रबंध रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि इसके लिए पिछले एक दशक में ओडिसा में पूरे तंत्र को व्यवस्थित ढंग से सुधारा गया.
उन्होंने बताया कि ''पिछले एक दशक में हमने सकल घरेलू उत्पाद में दस प्रतिशत की वृद्धि की है और पिछले साल भारत की जीडीपी से दोगुनी वृद्धि हुई है. हमें एक दशक और देकर देखिए.”
अगले साल इन दोनों मॉडलों की आजमाइश होने की उम्मीद है और इससे भी कहीं बड़े सवालों पर सोचने की जरूरत पड़ेगी. अगर केंद्र में बीजेपी को जनादेश मिल गया तो क्या मजबूत नेतृत्व का उसका वादा वास्तव में बदलाव ला पाएगा?
क्या डायरेक्ट डेमोक्रेसी (सीधा लोकतंत्र) का आप का सिद्धांत शासन का पूरा ढांचा बदल देगा? और इसका राज्यों की दशा-दिशा पर क्या असर पड़ेगा? प्रदर्शन के लिए मजबूत बुनियाद डाली जा चुकी है. अगले संस्करण में कुछ दिलचस्प नतीजे दिखाई दे सकते हैं.

