वह 1996 का साल था. इंग्लैंड में बर्मिंघम के एजबस्टन मैदान पर मैं मौजूद था. इंग्लैंड आठ विकेट से मैच जीत गया था. यह ज्यादा स्कोर वाला मैच नहीं था. लेकिन वह मैच मुझे ही नहीं बल्कि और भी कई लोगों को दूसरी पारी में इंग्लैंड के गेंदबाजों की सचिन तेंडुलकर के हाथों की गई धुलाई की वजह से याद रह गया.
उस पिच पर वह चौथी पारी थी और तेज गेंदबाजों को ज्यादा ही मदद मिल रही थी, गेंद बेतरह घूम रही थी और लहरा रही थी. फिर भी सचिन ने उस वक्त आग उगल रहे क्रिस लेविस को अकेले ही ठिकाने लगा दिया. भारत के कुल 219 रनों में 122 अकेले सचिन ने बनाए थे. उनके अलावा संजय मांजरेकर ही सबसे ज्यादा 18 रन बना पाए थे.
उस पिच पर वह चौथी पारी थी और तेज गेंदबाजों को ज्यादा ही मदद मिल रही थी, गेंद बेतरह घूम रही थी और लहरा रही थी. फिर भी सचिन ने उस वक्त आग उगल रहे क्रिस लेविस को अकेले ही ठिकाने लगा दिया. भारत के कुल 219 रनों में 122 अकेले सचिन ने बनाए थे. उनके अलावा संजय मांजरेकर ही सबसे ज्यादा 18 रन बना पाए थे.
ऐसी कठिन पारी खेलने के लिए जिस अनुशासन और फोकस की दरकार होती है, उसे लय और आक्रामकता दोनों को साधते हुए अंजाम नहीं दिया जा सकता. लेकिन सचिन ने दोनों का ही यकीनन दुर्लभ प्रदर्शन किया. हम सभी यह देख कर हैरान थे कि उस कहर ढाती गेंदबाजी के आक्रमण से पूरी निडरता से अकेले ही जूझ रहे थे, जबकि दूसरे छोर से उनके साथी बल्लेबाज 'तू चल मैं आता हूं’ की मुद्रा में मैदान छोड़ते जा रहे थे.
मेरी समझ में यह दिलेरी सिर्फ वही दिखा सकता है जिसके पास ऐसी तकनीकी क्षमता हो कि एक के बाद दूसरी का बखूबी इस्तेमाल कर सके. यह वही कर सकता है जो अपनी कमजोरियों से पहले दो-चार हो चुका हो और उनकी काट खोज ली हो. ऐसी कमजोरियां जिन्होंने अपेक्षाकृत कम कुव्वत वाले कई खिलाडिय़ों को निगल लिया.
इन बीते वर्षों में मैं सचिन को इतनी बार और इतने पहलुओं से देख चुका हूं कि अब मेरे लिए यह कह पाना मुश्किल हो गया है कि उनकी कौन-सी पारी, मैच या पहलू मुझे सबसे अच्छा लगा. कोई मोटी मिसाल देनी हो तो मैं ऑस्ट्रेलिया के एक भारत दौरे में शेन वार्न से टक्कर लेने की उनकी तैयारी को याद करूंगा.
सामान्य समझ तो यही कहेगी कि भारतीय बल्लेबाजों को उस समय का मिजाज भांपकर ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाजी का मुकाबला करने को तैयार होना चाहिए लेकिन दोस्तों, सामान्य समझ कई बार धोखा दे जाती है. पिचें अगर स्पिन गेंदबाजी को मदद करने वाली हों तो तेज गेंदबाजी से मुकाबले की तैयारी करने की क्या तुक है भला?
भारतीय टीम में इस बात को समझने वाले सचिन शायद इकलौते खिलाड़ी थे. सो, उन्होंने लक्ष्मण शिवरामकृष्णन से गुजारिश की कि वे उनकी प्रैक्टिस के लिए जरा राउंड द विकेट गेंद डालें, वह भी उस जगह पर जहां गेंदबाजों का पैर पड़ते रहने से एक गड्ढा-सा बन जाता है. उसका क्या नतीजा क्या हुआ, आप उसे इतिहास के पन्नों में देख सकते हैं. उसे यहां दोहराने का कोई फायदा नहीं.
मुझे वह अभ्यास सत्र एक तरह से दूर तक सोच लेने वाली सचिन की उस खूबी की वजह से ही याद रह गया. मुझे लगा कि देखो, यह कैसा बल्लेबाज है! कहां धोखा हो सकता है, उसे पहले से ही भांपकर यह बंदा तैयारी करने में लगा हुआ है. और यहां यह बात गौर करने लायक है कि वे सिर्फ प्रैक्टिस नहीं कर रहे थे. कड़ी प्रैक्टिस तो बहुत-सारे लोग किया करते हैं. लेकिन सिर्फ प्रैक्टिस करने से ही बात नहीं बनती.
हर तरह के हालात को ध्यान में रखकर जब तक परफेक्ट प्रैक्टिस नहीं करते, तब तक उसका कोई मतलब नहीं. अगर आप गलत चीजों की प्रैक्टिस किए चले जा रहे हैं तो आप तो गलत करने में ही और काबिल होते चले जाएंगे ना. अपने लगभग समूचे करियर में सचिन ने यह बात दर्शाई है कि सही प्रैक्टिस को लेकर वे कितने सतर्क रहे हैं.
और इससे उन्हें मन मुताबिक फुटवर्क हासिल करने में मदद मिली है. खिलाड़ी का यह फुटवर्क हासिल कर लेना किसी भी कोच को खुशी से झूमने का अवसर दे देता है. अगर आप पिछले डेढ़ेक साल के उनके प्रदर्शन को भुला दें—आपको भुला देना चाहिए क्योंकि यह तो बहुत ही स्वाभाविक बात है—तो मैंने उन्हें कभी गलत पैर बाहर निकालते नहीं देखा है.

अपनी कला में महारत रखने वाले किसी नर्तक की तरह सचिन ने हर बार अपना शॉट खेलने के वास्ते उसके लिए एकदम माकूल मुद्रा अपनाई है. इसकी वजह यह है, जैसा कि मैं हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को बता रहा था, सबसे पहले आपको अपने पैर जमाने की जरूरत होती है.
आपके हाथ और बांहें तो अपने आप अपनी सही जगह पर सेट हो जाते हैं. सचिन के मामले में तो फुटवर्क की अहमियत और भी बढ़ जाती है क्योंकि सुनील गावसकर की तरह वे भी कद में छोटे हैं. और छोटे कद के बल्लेबाज आगे बढ़कर खेलने के लिए छोटा कदम बढ़ाते हैं. अगर आपका फुटवर्क सही नहीं है और आपके पैर डेढ़ेक फुट ही बाहर आते हैं और आप गेंद की पिच से काफी दूर हैं तो आपके लिए मामला खतरनाक हो सकता है.
अपनी जगह पर आप जाम-से हो जाएंगे. इधर के 18 महीनों को छोड़ दें तो मैंने सचिन को इतने कमजोर फुटवर्क के साथ नहीं देखा. अब उनके कदमों ने उस तरह से मूव करना बंद कर दिया है, और मेरे हिसाब से यही होना था. इसी को तो वक्त कहते हैं. है कि नहीं?
सचिन की तकनीक का दूसरा अहम पहलू रहा है गेंद की लंबाई पढ़ लेने की उनकी काबिलियत. और मैं इस बात के लिए उनका दीवाना रहा हूं. मुझे इस बात का शायद उतना खुलासा करने की जरूरत नहीं लेकिन हमने देखा है कि कई बल्लेबाज, जब उन्हें फ्रंटफुट पर खेलना होता है तो बैकफुट पर खेलते दिखते हैं और जब बैकफुट पर खेलना होता है तो फ्रंटपुट पर.
ऐसा लगातार होता आया है. यहां तक कि महेंद्र सिंह धोनी जैसा काबिल खिलाड़ी भी हाल ही में वेस्ट इंडीज के खिलाफ कोलकाता टेस्ट में विकेटकीपर को कैच थमा बैठा. वजह? वही. वे आगे निकलने की बजाए पिछले पैर पर ही डटे रहे. यह सब आप सचिन के साथ होता हुआ नहीं पाएंगे, अमूमन.
इस बंदे में तो लंबाई का अंदाजा लगा लेने की गजब की काबिलियत है. और यही बात तो वाकई मायने रखती है—फुटवर्क और गेंद की लंबाई की समझदारी. किसी भी अच्छे बल्लेबाज के लिए ये बुनियादी तकनीक हैं या कहें कि होनी चाहिए. सचिन के खेल की खूबसूरती यह रही है कि वे यह सब बड़ी सहजता से करते हैं.
मोटे तौर पर ये ही वे वजहें रही हैं, जिससे कि वे किसी भी तरह की पिच पर कैसी भी गेंदबाजी को आसानी से खेलते आए हैं. इन्हीं वजहों से उन्हें ज्यादा ताकत लगाए बगैर उम्दा ड्राइव, कट और पुल शॉट खेलने में आसानी रही है. इस तरह की समझदारी और शारीरिक संतुलन लगातार और घंटे-दर-घंटे पूरी लगन से प्रैक्टिस करने के बाद ही बन पाता है.
इसमें सामान्य और परंपरागत तरीकों के अलावा हर बार अचानक अनोखे उपाय भी सूझ जाते हैं. अगर किसी ने गौर से देखा हो तो उसे पता चल गया होगा कि सचिन के पैर हमेशा दोनों विकेटों के बीच की लाइन में होते हैं. बल्ला हमेशा ऑफ स्टंप की लाइन में होता है और बैकलिफ्ट कुछ इस तरह से होती है, जिससे बल्ले को आगे लाकर शॉट खेलने में आसानी हो. वे जिस ताकत से शॉट खेलते हैं, उसकी असल वजह यही है कि वे पूरे संतुलन के साथ शरीर की ताकत लगा पाते हैं.
आप उनकी हर पारी के पीछे एक तरह की निश्चित योजना को भांप सकते हैं. उसके बाद तकनीक तो सचिन के खेल में उनकी आज्ञा का पालन करने वाली चेरी की तरह होती है. वे तकनीक का महज तकनीक के तौर पर इस्तेमाल नहीं करते.
हालांकि कई बार लगता है कि यह संभव नहीं मगर वे ऐसा आभास देते हैं कि उन्होंने जैसे हर पारी की हर गेंद के लिए तैयारी कर रखी है, हर गेंदबाज का पूरा अध्ययन किया है और हर शॉट के बारे में सोच-समझ रखा है. यही तो है जो उन्हें 'गेम कंट्रोलर’ और कई मौकों पर 'गेम चेंजर’ की भूमिका में ला देता है.
किसी के खेल में धीरे-धीरे लगातार गिरावट आना कोई शर्म की बात नहीं है. जैसा कि सचिन के साथ हुआ है. लगातार खेलते रहने की उनकी लालसा को भी मैं समझ सकता हूं.
इन तमाम किस्म के उतार-चढ़ावों के बीच ऐसा कभी नहीं लगा कि सचिन खेल का आनंद नहीं उठा रहे हैं. और अब जब उन्होंने इसे अलविदा कहने का फैसला कर लिया है तो वह भी उनके हर शॉट की तरह एकदम परफेक्ट है.
मेरी समझ में यह दिलेरी सिर्फ वही दिखा सकता है जिसके पास ऐसी तकनीकी क्षमता हो कि एक के बाद दूसरी का बखूबी इस्तेमाल कर सके. यह वही कर सकता है जो अपनी कमजोरियों से पहले दो-चार हो चुका हो और उनकी काट खोज ली हो. ऐसी कमजोरियां जिन्होंने अपेक्षाकृत कम कुव्वत वाले कई खिलाडिय़ों को निगल लिया.
इन बीते वर्षों में मैं सचिन को इतनी बार और इतने पहलुओं से देख चुका हूं कि अब मेरे लिए यह कह पाना मुश्किल हो गया है कि उनकी कौन-सी पारी, मैच या पहलू मुझे सबसे अच्छा लगा. कोई मोटी मिसाल देनी हो तो मैं ऑस्ट्रेलिया के एक भारत दौरे में शेन वार्न से टक्कर लेने की उनकी तैयारी को याद करूंगा.
सामान्य समझ तो यही कहेगी कि भारतीय बल्लेबाजों को उस समय का मिजाज भांपकर ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाजी का मुकाबला करने को तैयार होना चाहिए लेकिन दोस्तों, सामान्य समझ कई बार धोखा दे जाती है. पिचें अगर स्पिन गेंदबाजी को मदद करने वाली हों तो तेज गेंदबाजी से मुकाबले की तैयारी करने की क्या तुक है भला?
भारतीय टीम में इस बात को समझने वाले सचिन शायद इकलौते खिलाड़ी थे. सो, उन्होंने लक्ष्मण शिवरामकृष्णन से गुजारिश की कि वे उनकी प्रैक्टिस के लिए जरा राउंड द विकेट गेंद डालें, वह भी उस जगह पर जहां गेंदबाजों का पैर पड़ते रहने से एक गड्ढा-सा बन जाता है. उसका क्या नतीजा क्या हुआ, आप उसे इतिहास के पन्नों में देख सकते हैं. उसे यहां दोहराने का कोई फायदा नहीं.
मुझे वह अभ्यास सत्र एक तरह से दूर तक सोच लेने वाली सचिन की उस खूबी की वजह से ही याद रह गया. मुझे लगा कि देखो, यह कैसा बल्लेबाज है! कहां धोखा हो सकता है, उसे पहले से ही भांपकर यह बंदा तैयारी करने में लगा हुआ है. और यहां यह बात गौर करने लायक है कि वे सिर्फ प्रैक्टिस नहीं कर रहे थे. कड़ी प्रैक्टिस तो बहुत-सारे लोग किया करते हैं. लेकिन सिर्फ प्रैक्टिस करने से ही बात नहीं बनती.
हर तरह के हालात को ध्यान में रखकर जब तक परफेक्ट प्रैक्टिस नहीं करते, तब तक उसका कोई मतलब नहीं. अगर आप गलत चीजों की प्रैक्टिस किए चले जा रहे हैं तो आप तो गलत करने में ही और काबिल होते चले जाएंगे ना. अपने लगभग समूचे करियर में सचिन ने यह बात दर्शाई है कि सही प्रैक्टिस को लेकर वे कितने सतर्क रहे हैं.
और इससे उन्हें मन मुताबिक फुटवर्क हासिल करने में मदद मिली है. खिलाड़ी का यह फुटवर्क हासिल कर लेना किसी भी कोच को खुशी से झूमने का अवसर दे देता है. अगर आप पिछले डेढ़ेक साल के उनके प्रदर्शन को भुला दें—आपको भुला देना चाहिए क्योंकि यह तो बहुत ही स्वाभाविक बात है—तो मैंने उन्हें कभी गलत पैर बाहर निकालते नहीं देखा है.

अपनी कला में महारत रखने वाले किसी नर्तक की तरह सचिन ने हर बार अपना शॉट खेलने के वास्ते उसके लिए एकदम माकूल मुद्रा अपनाई है. इसकी वजह यह है, जैसा कि मैं हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को बता रहा था, सबसे पहले आपको अपने पैर जमाने की जरूरत होती है.
आपके हाथ और बांहें तो अपने आप अपनी सही जगह पर सेट हो जाते हैं. सचिन के मामले में तो फुटवर्क की अहमियत और भी बढ़ जाती है क्योंकि सुनील गावसकर की तरह वे भी कद में छोटे हैं. और छोटे कद के बल्लेबाज आगे बढ़कर खेलने के लिए छोटा कदम बढ़ाते हैं. अगर आपका फुटवर्क सही नहीं है और आपके पैर डेढ़ेक फुट ही बाहर आते हैं और आप गेंद की पिच से काफी दूर हैं तो आपके लिए मामला खतरनाक हो सकता है.
अपनी जगह पर आप जाम-से हो जाएंगे. इधर के 18 महीनों को छोड़ दें तो मैंने सचिन को इतने कमजोर फुटवर्क के साथ नहीं देखा. अब उनके कदमों ने उस तरह से मूव करना बंद कर दिया है, और मेरे हिसाब से यही होना था. इसी को तो वक्त कहते हैं. है कि नहीं?
सचिन की तकनीक का दूसरा अहम पहलू रहा है गेंद की लंबाई पढ़ लेने की उनकी काबिलियत. और मैं इस बात के लिए उनका दीवाना रहा हूं. मुझे इस बात का शायद उतना खुलासा करने की जरूरत नहीं लेकिन हमने देखा है कि कई बल्लेबाज, जब उन्हें फ्रंटफुट पर खेलना होता है तो बैकफुट पर खेलते दिखते हैं और जब बैकफुट पर खेलना होता है तो फ्रंटपुट पर.
ऐसा लगातार होता आया है. यहां तक कि महेंद्र सिंह धोनी जैसा काबिल खिलाड़ी भी हाल ही में वेस्ट इंडीज के खिलाफ कोलकाता टेस्ट में विकेटकीपर को कैच थमा बैठा. वजह? वही. वे आगे निकलने की बजाए पिछले पैर पर ही डटे रहे. यह सब आप सचिन के साथ होता हुआ नहीं पाएंगे, अमूमन.
इस बंदे में तो लंबाई का अंदाजा लगा लेने की गजब की काबिलियत है. और यही बात तो वाकई मायने रखती है—फुटवर्क और गेंद की लंबाई की समझदारी. किसी भी अच्छे बल्लेबाज के लिए ये बुनियादी तकनीक हैं या कहें कि होनी चाहिए. सचिन के खेल की खूबसूरती यह रही है कि वे यह सब बड़ी सहजता से करते हैं.
मोटे तौर पर ये ही वे वजहें रही हैं, जिससे कि वे किसी भी तरह की पिच पर कैसी भी गेंदबाजी को आसानी से खेलते आए हैं. इन्हीं वजहों से उन्हें ज्यादा ताकत लगाए बगैर उम्दा ड्राइव, कट और पुल शॉट खेलने में आसानी रही है. इस तरह की समझदारी और शारीरिक संतुलन लगातार और घंटे-दर-घंटे पूरी लगन से प्रैक्टिस करने के बाद ही बन पाता है.
इसमें सामान्य और परंपरागत तरीकों के अलावा हर बार अचानक अनोखे उपाय भी सूझ जाते हैं. अगर किसी ने गौर से देखा हो तो उसे पता चल गया होगा कि सचिन के पैर हमेशा दोनों विकेटों के बीच की लाइन में होते हैं. बल्ला हमेशा ऑफ स्टंप की लाइन में होता है और बैकलिफ्ट कुछ इस तरह से होती है, जिससे बल्ले को आगे लाकर शॉट खेलने में आसानी हो. वे जिस ताकत से शॉट खेलते हैं, उसकी असल वजह यही है कि वे पूरे संतुलन के साथ शरीर की ताकत लगा पाते हैं.
आप उनकी हर पारी के पीछे एक तरह की निश्चित योजना को भांप सकते हैं. उसके बाद तकनीक तो सचिन के खेल में उनकी आज्ञा का पालन करने वाली चेरी की तरह होती है. वे तकनीक का महज तकनीक के तौर पर इस्तेमाल नहीं करते.
हालांकि कई बार लगता है कि यह संभव नहीं मगर वे ऐसा आभास देते हैं कि उन्होंने जैसे हर पारी की हर गेंद के लिए तैयारी कर रखी है, हर गेंदबाज का पूरा अध्ययन किया है और हर शॉट के बारे में सोच-समझ रखा है. यही तो है जो उन्हें 'गेम कंट्रोलर’ और कई मौकों पर 'गेम चेंजर’ की भूमिका में ला देता है.
किसी के खेल में धीरे-धीरे लगातार गिरावट आना कोई शर्म की बात नहीं है. जैसा कि सचिन के साथ हुआ है. लगातार खेलते रहने की उनकी लालसा को भी मैं समझ सकता हूं.
इन तमाम किस्म के उतार-चढ़ावों के बीच ऐसा कभी नहीं लगा कि सचिन खेल का आनंद नहीं उठा रहे हैं. और अब जब उन्होंने इसे अलविदा कहने का फैसला कर लिया है तो वह भी उनके हर शॉट की तरह एकदम परफेक्ट है.

