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रघुराम ने गुजरात को कमतर क्यों आंका?

आरबीआइ गवर्नर रघुराम राजन की रिपोर्ट ने गुजरात को विकास के मामले में पिछड़ा बताया तो देश के जाने-माने    अर्थशास्त्री ने इस रिपोर्ट के दावों की पड़ताल की

अपडेटेड 22 अक्टूबर , 2013
राज्यों के संयुक्त विकास सूचकांक पर रघुराम राजन समिति की रिपोर्ट हाल में प्रकाशित हुई है और लोग यह टिप्पणी कर रहे हैं कि गुजरात का प्रदर्शन अच्छा नहीं है. गुजरात का प्रदर्शन अच्छा न होने का तर्क, खासकर मानव विकास के मामले में नया नहीं है. जब आंकड़ों की बात आती है तो एक संपूर्ण आंकड़ा (एब्सोल्यूट फिगर) होता है और एक ऐसा आंकड़ा होता है, जिसमें उत्तरोत्तर वृद्धि (इंक्रीमेंट) होती रहती है.

इन दोनों में अंतर होता है. किसी राज्य के प्रति व्यक्ति घरेलू उत्पाद का उदाहरण लें. अगर मैं संपूर्ण आंकड़े की बात करूं तो इसमें पंजाब सबसे ऊपर होगा, बिहार से काफी आगे. लेकिन अगर बढऩे वाले आंकड़े देखें तो बिहार इस श्रेणी में सबसे ऊपर होगा, पंजाब से काफी आगे. इन दोनों के बेस यानी आधार में अंतर है. क्या इसका मतलब यह है कि पंजाब अच्छा प्रदर्शन कर रहा है या बिहार का प्रदर्शन खराब है?

मैं ऐसा नहीं समझता. इसी तरह, मैं नहीं समझता कि गुजरात के विकास की कहानी कभी भी बेस के बारे में रही है. यह सुधार के बारे में थी. कुछ आंकड़ों से इसे समझते हैं. अखिल भारतीय साक्षरता दर वर्ष 1991 में 52.2 फीसदी, 2001 में 65.4 फीसदी और 2011 में 74 फीसदी थी. गुजरात की साक्षरता दर वर्ष 1991 में 61.2 फीसदी, 2001 में 69.1 फीसदी और 2011 में 79.3 फीसदी थी.

इसी प्रकार प्रतिशत के लिहाज से देखें तो 1991 से 2001 के बीच अखिल भारतीय साक्षरता दर में गुजरात से ज्यादा सुधार हुआ है, लेकिन 2001 से 2011 के बीच इसमें गुजरात से कम सुधार हुआ है. महिला साक्षरता में भी ऐसा ही रुख है. या गुजरात में प्राथमिक शिक्षा के दौरान स्कूल छोडऩे वालों की दर का ही उदाहरण लें. पहली से पांचवीं कक्षा के दौरान 2000-01 में यह 20.93 फीसदी और 2011-12 में महज 2.07 फीसदी था.

अंतिम उदाहरण के तौर पर आइए लिंगानुपात की बात करते हैं. पूरे देश के बच्चों में (0-6 वर्ष) 1991 में लिंगानुपात 945, 2001 में 927 और 2011 में 919 था जबकि इस दौरान गुजरात में बाल लिंगानुपात वर्ष 1991 में 928, 2001 में 883 और 2011 में 890 था. वर्ष 2001 से 2011 के बीच पूरे देश में बच्चों के लिंगानुपात की स्थिति खराब हुई है, जबकि गुजरात में मामूली सुधार हुआ है. हालांकि, 890 का आंकड़ा अब भी खराब ही है.

अगर किसी को सरकारी नीतियों के असर जानने में दिलचस्पी हो तो जन्म के समय लिंगानुपात को बाल लिंगानुपात का एक वैकल्पिक संकेतक माना जा सकता है. पूरे देश में यह वर्ष 2001 में 984 था और 2011 में 906. लेकिन गुजरात में वर्ष 2001 में यह 837 था और 2011 में 909. मैं इस सुधार की व्याख्या नीतियों के सकारात्मक असर के रूप में करने को तैयार था.

मैं सभी संकेतकों से कई और उदाहरण दे सकता हूं, लेकिन इससे संपूर्ण बनाम वृद्धि का मुद्दा और साथ ही घटनाक्रम की समस्या खड़ी होती है. ज्यादातर मानव विकास रैंकिंग में पुराने आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है. उदाहरण के लिए पिछला स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2005-06 में किया गया था. इसे याद रखना अहम है.

अब रघुराम राजन समिति की बात करते हैं. किसी भी राज्यवार रैंकिंग में आपको निम्न चीजें करनी पड़ती हैः
(ए) प्रभावित करने वाले कारकों की पहचानः अकसर आंकड़ों का अभाव आपको उन कारकों को शामिल करने से रोक देता है, जिन्हें आप शामिल करना चाहते थे. बीमारी की दर की तरह पर्यावरण इसका एक अच्छा उदाहरण है.  

(बी) सामान्यीकरण की विधि निकालें. एक उदाहरण से समझते हैं, देश में कई बड़े और छोटे राज्य हैं. बड़े राज्यों और छोटे राज्यों के बीच तुलना को संभव बनाने के लिए कारकों को जनसंख्या या भौगोलिक क्षेत्र के हिसाब से विभाजित कर सकते हैं.

(सी) चिन्हित कारकों के लिए वेटेज यानी भारांक तय करें.

(डी)  एकत्रीकरण का तरीका तय करें.

ये गंभीर मुद्दे हैं. इनमें किसी भी फेर-बदल से इंडेक्स वैल्यू बदल जाती है और उसके नतीजतन रैंकिंग भी. इसलिए आपने (ए) से लेकर (डी) तक जो भी विकल्प चुने हैं, उसका औचित्य साबित करना पड़ता है और यह जांचने के लिए कि आपकी इंडेक्स वैल्यू कितनी मजबूत है, एक तरह की सिमुलेशन एक्सरसाइज करनी पड़ती है.

राजन कमेटी ने कारकों के दस समूह स्वीकार किए हैः 1. आय 2. शिक्षा 3. स्वास्थ्य 4. हर घर में सुख-सुविधाओं का इंडेक्स 5. गरीबी अनुपात 6. महिला साक्षरता दर 7. जनसंख्या में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) का प्रतिशत 8. शहरीकरण की दर 8. वित्तीय समावेश 10. कनेक्टिविटी इंडेक्स. संभवतः इन कारकों को शामिल करना चाहिए था और शायद नहीं भी. यह पूरी कवायद क्यों की गई?

यह सुनिश्चित करने के लिए कि पूरे देश के नागरिकों को समान गुणवत्ता की सार्वजनिक वस्तुएं और सेवाएं हासिल हो सकें. ऐसे मामले में, अगर ऐसे राज्य हों जिनकी आबादी का बड़ा हिस्सा ऐसे गांवों में रहता हो जिनकी जनसंख्या 500 से कम हो और वहां पहाड़ी और दुर्गम इलाके भी हों, तो वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति लागत काफी ऊंची होती है. तो क्या इसे भी एक मानदंड नहीं होना चाहिए था?

इसके विपरीत, क्या एससी/एसटी का वर्गीकरण किसी पिछड़ेपन का संकेतक हो सकता है? अनुसूचित जाति की जनसंख्या के बारे में कई रिसर्च हुई हैं जिनसे पता चलता है कि अगर अन्य कारकों पर आपका नियंत्रण हो तो एससी होना कोई जन्म से फायदों से दूर रखने वाला नहीं है.

क्या महिला साक्षरता दर या महिला कार्य भागीदारी दर को मानदंड बनाना चाहिए था? प्रति व्यक्ति मासिक खपत व्यय को आय का एक वैकल्पिक संकेतक माना गया. क्या इसे अपनाना चाहिए था या इसके किसी विशिष्ट कारक को, जैसे गैर खाद्य वस्तुओं पर निजी खपत व्यय या शिक्षा और स्वास्थ्य पर व्यय?

एलपीजी के इस्तेमाल के बारे में क्या कहेंगे? कनेक्टिविटी की बात करें तो पक्की सड़क को बहुत अच्छा संकेतक माना जाता है. वित्तीय समावेश में बैंकों को ही क्यों शामिल किया जाता है? पोस्ट ऑफिस को क्यों नहीं? पुलिसकर्मियों की संख्या के बारे में क्या कहेंगे?

मैं यह सुझाव नहीं दे रहा कि इनमें से किसी एक या दूसरे कारक को शामिल करना चाहिए था, या समिति ने कारकों के जो समूह स्वीकार किए हैं, उन्हें खारिज कर देना चाहिए. मैं तो यह बिंदु उठा रहा हूं कि इन कारकों को शामिल करने या उनको खारिज करने पर कुछ चर्चा होनी चाहिए थी. समिति ने क्या अपने इस चुनाव के लिए कोई औचित्य साबित किया है? जी नहीं.

एक और बिंदु पर विचार करते हैं. विकास का मतलब बढऩा होता है. दूसरे संकेतकों के लिए या तो आप वृद्धि को देख सकते हैं या उसकी संपूर्ण वैल्यू को. उदाहरण के लिए बताऊं, तो मैं नवजात शिशु मृत्यु दर पर विचार कर सकता हूं, या मैं नवजात शिशु मृत्यु दर में सुधार पर नजर डाल सकता हूं. इन दोनों में से मैं कौन-सा विकल्प चुनता हूं, उसके आधार पर रैंकिंग में अंतर आ जाएगा. जी हां, इंक्रीमेंट के अनुसार सुधार आखिरकार बेस पर असर डालता है.

लेकिन क्या मुझे इंक्रीमेंट की तुलना वृद्धि से या वृद्धि की तुलना बेस से करनी चाहिए? मैं कहना यह चाहता हूं कि इस तरह की कवायद में अहम फैसला लेना होता है, इसलिए काफी चौकन्ना रहना चाहिए. जो दस कारक समूह चुने गए हैं, उन पर ध्यान दें तो नौ में एक समय के बाद सुधार (या क्षरण) आ सकता है. लेकिन एससी/एसटी के प्रतिशत में इस तरह से बदलाव नहीं होता. कुछ राज्यों में एससी/एसटी की जनसंख्या में ठहराव देखा जा सकता है.

अब आंकड़ों के स्रोत पर विचार करते हैं. शिक्षा का उदाहरण लेते हैं. इस मामले में आंकड़े राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) से लिए जाते हैं. मसला यह है कि बड़े पैमाने पर एनएसएसओ के सैंपल सर्वे आमतौर पर हर पांच साल पर होते हैं. क्या कोई बेस ऐेसे आंकड़ों के आधार पर तय किया जा सकता है जो पांच साल के बाद उपलब्ध होंगे?

कमेटी चाहती तो स्कूली शिक्षा के लिए शिक्षा पर जिला सूचना व्यवस्था से हर साल मिलने वाले बेहतरीन आंकड़ों का इस्तेमाल कर सकती थी. इसके अलावा कई अन्य कारकों के बारे में आंकड़े जनगणना से लिए जाते हैं. इसका मतलब यह है कि अगले आंकड़े दस साल बाद ही उपलब्ध होंगे.

जिस चयन ने मुझे वास्तव में हैरान किया है, वह है नवजात शिशु मृत्यु दर (आइएमआर), जो स्वास्थ्य का एकमात्र संकेतक है. इससे मुझे हैरानी इस वजह से हुई है क्योंकि पिछला स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2005-06 में किया गया था. मैं आंकड़ों के स्रोत पर नजर डालता हूं तो उसमें लिखा दिखता है, ‘‘सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम बुलेटिन, अक्तूबर, 2012.’’ ठीक है. एसआरएस बुलेटिन में राज्यों के आइएमआर आंकड़े होते हैं.

लेकिन ये सिर्फ अनुमान हैं. इसे अनुमान के लिए ही इस्तेमाल करना बेहतर है. एकेडमिक दृढ़ता के हिसाब से आवश्यकता इस बात की थी कि साफ तौर पर उल्लेख किया जाता कि ये सिर्फ अनुमान हैं, सर्वे पर आधारित वास्तविक आंकड़े नहीं. मुझे तो रिपोर्ट में इसका कहीं उल्लेख नहीं मिला. सामान्यीकरण के बारे में क्या कहेंगे? किसी भी तरीके से यह स्पष्ट है कि जनसंख्या का सामान्यीकरण अनिवार्य रूप से भौगोलिक इलाके के सामान्यीकरण से श्रेष्ठ है.

वेट्स यानी भारांक की बात करें तो पीसीए (प्रिंसिपल कम्पोनेंट एनालिसिस) बेहतर है क्योंकि वेटिंग सिस्टम अभ्यास से तैयार होता है. हमें यह बताया गया कि समान वेट्स का इस्तेमाल किया गया है क्योंकि उन्हें समझना आसान होता है. मैं नहीं समझता कि समझने की सुविधा को कोई मानदंड होना चाहिए था. यदि इसे मानदंड मान लें तो मौजूदा कवायद को समझना आसान नहीं है. इसमें मनमानेपन और पक्षपात की बू आती है.

इन सबको देखते हुए, यह तय करने का क्या कोई साफ रास्ता नजर नहीं आता है कि रघुराम राजन रिपोर्ट में तुलनात्मक रूप से गुजरात का प्रदर्शन खराब क्यों रहा है? जी नहीं, क्योंकि रिपोर्ट से कोई भी बिना विश्लेषण वाले आंकड़े नहीं मिलते. कुल मिलाकर कहें तो इस पूरी रिपोर्ट का रवैया कुछ हद तक अक्खड़पन की बू लिए लगता है.
 
लेखक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में प्रोफेसर हैं
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