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आर्थिक आजादी की प्रतिनिधि महिलाएं

अपनी ईमानदारी, कड़ी मेहनत और लगन के बूते महिलाएं भेदभाव के सारे अड़ंगों को लांघकर कॉर्पोरेट जगत में ऊंचे ओहदों पर अपने लिए जगह बना रही हैं. बता रही हैं

अपडेटेड 11 सितंबर , 2013
महिलाएं कंपनी के वित्तीय मामलों में किसी तरह का घपला नहीं होने देतीं. अमेरिकन अकाउंटिंग एसोसिएशन की पत्रिका अकाउंटिंग होराइजन के अध्ययनों के मुताबिक, महिला सीएफओ अपने पुरुष समकक्षों के मुकाबले ज्यादा विश्वसनीय वित्तीय स्टेटमेंट तैयार करती हैं और कॉर्पोरेट बोर्ड में महिलाओं की मौजूदगी से घपले की आशंका कम हो जाती है.

अपनी इसी विश्वसनीयता की वजह से भारतीय कॉर्पोरेट जगत में भी महिलाएं सफलता के सोपान लांघ रही हैं.

वैसे, भारत में सिर्फ छह फीसदी महिलाएं संगठित क्षेत्र में काम करती हैं और उनमें से काफी लोगों को समान काम के लिए समान वेतन न मिलने की शिकायत होती है. संगठित क्षेत्र में काम करने वाली केवल पांच फीसदी महिलाएं ही वरिष्ठ पदों पर पहुंच पाती हैं, बाकी सभी अदृश्य दीवार या महिलाओं के साथ भेदभाव का शिकार हो जाती हैं.

लेकिन जिन क्षेत्रों में सिर्फ प्रतिभा और कड़ी मेहनत की दरकार होती है, उनमें उन्हें कोई नहीं रोक पाता. मिसाल के तौर पर आइटी, जिसके कामगारों में महिलाओं का प्रतिशत 30 फीसदी है. लेकिन लगभग हर क्षेत्र में उनकी संख्या बढ़ रही है. भारतीय कॉर्पोरेट जगत में वे टॉप पोजिशन में हैं.

वे अपनी कंपनी चला रही हैं, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डील कर रही हैं, पूंजी बाजार की दिग्गज वकील हैं, शेफ हैं, पीएसयू की प्रमुख हैं, मार्केटिंग के मामले में उनका सानी नहीं है.

चंदा कोचर, किरण मजूमदार शॉ, इंद्रा नूयी जैसी दिग्गज महिलाओं ने अपनी क्षमता साबित कर दी है. अगले पन्नों पर कंपनी जगत की 20 ऐसी कामयाब महिलाओं का जिक्र है, जिनमें से प्रत्येक की जिंदगी कड़ी मेहनत, बलिदान और महान उपलब्धि की कहानी है. एक ओर जहां आर्थिक सुस्ती, छंटनी और भ्रष्टाचार मायूस कर रहा है, वहीं ये महिलाएं अपनी ऊर्जा और नए विचारों से उम्मीद जगाती हैं.

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