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''दुनिया को करीब से देखा है” : विनीता बाली

अपने इसी दर्शन के चलते आज मैं पांच महाद्वीपों के छह देशों में रहते हुए काम कर रही हूं, 45 देशों की यात्रा करती रहती हूं और सबसे बड़ी बात यह कि मैं दुनिया की विविधताओं को करीब से देख पा रही हूं.

अपडेटेड 11 सितंबर , 2013
कभी सोचा नहीं था कि मैं कॉर्पोरेट जगत में जाऊंगी. यह महज एक संयोग ही था. मैं तो बस समय के बहाव के साथ चलते हुए कुछ अलग काम करना चाहती थी, जो मेरे लिए मजेदार भी हो. अपने इसी दर्शन के चलते आज मैं पांच महाद्वीपों के छह देशों में रहते हुए काम कर रही हूं, 45 देशों की यात्रा करती रहती हूं और सबसे बड़ी बात यह कि मैं दुनिया की विविधताओं को करीब से देख पा रही हूं.

दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से इकोनॉमिक्स (ऑनर्स) की डिग्री लेने के बाद मैं विदेश सेवा में जाना चाहती थी, लेकिन इसके लिए मुझे मास्टर की डिग्री लेने की जरूरत थी. मैंने दिल्ली स्कूल ऑफ  इकॉनोमिक्स और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दोनों जगह एमए में दाखिला ले लिया, लेकिन बस एक हफ्ते का ही अनुभव लिया क्योंकि मुझे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, कोलकाता और जमनालाल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, मुंबई में एडमिशन मिल गया था.

उस समय मैंने सोचा कि मुंबई में रहना ज्यादा मजेदार रहेगा, इसलिए जमनालाल बजाज इंस्टीट्यूट में दाखिला ले लिया. तब भी मेरे मन में था कि बिजनेस की डिग्री लेने के बाद विदेश सेवा की परीक्षा में बैठूंगी. लेकिन पढ़ाई के दौरान ही मुझे वोल्टास में नौकरी मिल गई. वोल्टास ने मुझे जबरदस्त अवसर दिया. मैंने रसना को बाजार में उतारा, जिसने मुझे तुरंत बड़ी सफलता दिला दी.

वोल्टास में थोड़े समय तक नौकरी करने के बाद मैं कैडबरी में चली गई, जहां एक युवा ब्रांड मैनेजर के तौर पर मुझे तत्कालीन ग्लोबल चेयरमैन सर एड्रियन कैडबरी से उनके भारत दौरे पर मिलने का अवसर मिला. वह मेरे लिए यादगार पल था. कैडबरी में काम के दौरान 1982 में विदेश में पढऩे के लिए मुझे रोटरी इंटरनेशनल की ओर से स्कॉलरशिप मिल गई. मैंने तुरंत इस अवसर को हथिया लिया.

अमेरिका में स्टुडेंट के तौर पर यह लाजवाब अनुभव था. मैंने न्यूयॉर्क में युनाइटेड नेशंस में इंटर्नशिप की. वहां दुनियाभर के लोगों से मेरी मित्रता हो गई और वियतनाम, दक्षिण अफ्रीका, कंबोडिया आदि देशों में उनके अनुभवों को जाना. कुछ दिन बाद कैडबरी ने यूके में मुझे सीनियर ब्रांड मैनेजर बनाने का प्रस्ताव दिया. मैंने पहला एयरेटेड चॉकलेट विस्पा लॉन्च किया. इसे तुरंत ही भारी सफलता मिली.

उस समय (1984-86) मार्केटिंग के लोगों के लिए विदेश में काम करना दुर्लभ बात हुआ करती थी. मैं कैडबरी इंडिया से पहली व्यक्ति थी, जो यूके में काम कर रही थी. मेरे लिए कैडबरी का महत्व एक और कारण से भी था. इसने मुझे नाइजीरिया और दक्षिण अफ्रीका में काम करने का अवसर दिया. वहां मैं सेल्स और मार्केटिंग विभाग की प्रमुख थी. इसके बाद मैं कोका-कोला कंपनी में आ गई, जहां मैं पहले ग्लोबल मार्केटिंग डायरेक्टर बनी.

कोका-कोला में मेरी दूसरी भूमिका भी उतनी ही चुनौती भरी थी. मुझे लैटिन अमेरिका के लिए मार्केटिंग की वाइस प्रेसिडेंट, एंडियन डिवीजन की डिवीजन प्रेसिडेंट आदि बना दिया गया था. इसकी वजह से मुझे सैंटियागो में रहना पड़ा और स्पैनिश भाषा सीखनी पड़ी. वहां मेरा अलग तरह की संस्कृति से परिचय हुआ.

फिर मैं निजी कारणों से 2005 में वापस भारत आ गई. यहां आकर मैंने ब्रिटानिया में जॉब कर ली. यहां का अनुभव भी मेरे लिए निराला था. 16 साल विदेश में बिताने के बाद जब भारत लौटी तो सब कुछ बदल गया था. 2005 का भारत आत्मविश्वास और उम्मीदों से भरा और गतिशील देश बन चुका था. पिछले आठ वर्षों में और भी बदलाव आ गया है.

आज देश में भारी विरोधाभास दिखता है. एक ओर तो हम इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए दुनिया से जुड़ गए हैं और दूसरी ओर हमें व्यक्तिगत स्तर पर लोगों को जोडऩे की जरूरत है. आर्थिक विकास तो हो रहा है, लेकिन मानव विकास के मामले में हम बहुत पीछे हैं.

समाज के निर्माण में हम सभी का योगदान जरूरी है. ऐसा समाज जहां समानता हो, जहां के कानून पारदर्शी हों, जहां लोगों की भावनाएं समझी जाती हों, उन्हें सम्मान दिया जाता हो और जहां शासन में साफगोई हो.
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