जब शुभलक्ष्मी पानसे की नजर सरकारी स्वामित्व वाले बैंक ऑफ महाराष्ट्र में प्रोबेशनरी अधिकारियों की जरूरत वाले विज्ञापन पर पड़ी उस समय वे पुणे यूनिवर्सिटी से भ्रूणविज्ञान में कोशिका मृत्यु पर शोध कर रही थीं. पात्रता परीक्षा में वे 'बस मजे के लिए’ बैठ गईं और पास भी हो गईं. बस यहीं से उनके कोशिका शोध का अंत हो गया.
वे बैंक में भर्ती हो गईं और अगले 37 वर्ष तक अपने पेशे की सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ती रहीं. पिछले अक्तूबर में उन्होंने इलाहाबाद बैंक की मुखिया का पदभार ग्रहण करने के लिए विजया बैंक के एकमात्र कार्यकारी निदेशक की कुर्सी छोड़ दी.
इस प्रक्रिया में वे 148 वर्ष पुरानी संस्था, भारत के सबसे पुराने बैंक का नेतृत्व करने वाली पहली महिला बन गई हैं. पानसे 'चेयरमैन’ शब्द पर जोर देती हैं. उनके लिए यह कार्यकारी निदेशक या प्रोबेशनरी ऑफिसर जैसा 'एक पदनाम भर’ है. वे कहती हैं, ''इसमें कोई जेंडर, सेक्स, महिला या पुरुष की बात नहीं है.”
वे महिलाओं की तरक्की की राह में अदृश्य दीवार की धारणा से जरा भी विचलित नहीं होतीं. वे कहती हैं, ''मैं इसे उस तरह नहीं देखती.” वे बताती हैं कि महिला होना उनकी पेशेवर जिंदगी में तब तक कोई मुद्दा नहीं था जब तक कि वे जनरल मैनेजर नहीं बन गईं. वे कहती हैं, ''महिलाओं को (तब) नीची निगाह से देखा जाता था और उनसे बहुत अपेक्षा नहीं की जाती थी.
सरकारी क्षेत्र में आज भी ऐसा ही है.” लेकिन वे यह भी जोड़ती हैं कि मानसिकता बदल रही है—सार्वजनिक क्षेत्र के 26 बैंकों में से तीन का नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं (पनसे के अलावा बैंक ऑफ इंडिया में विजयलक्ष्मी अय्यर और युनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया में अर्चना भार्गव हैं), और ऐसी खबर है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की प्रबंध निदेशक अरुंधती भट्टाचार्य उसकी अगली प्रमुख होंगी.
59 वर्षीया पानसे अपनी उपलब्धियों का श्रेय अपने माता-पिता को देती हैं. वे बताती हैं, ''हमारा पालन-पोषण आत्मनिर्भर लोगों के रूप में हुआ था. मेरी मां कहा करती थीं, 'तुम इसे कर सकती हो’.” पनसे ने अपने करियर को गंभीरता से लेते हुए शाम को बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई की और 1993 में मैनेजमेंट और फाइनेंस में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की.
1998 में जब उनके पति को काम के सिलसिले में अमेरिका जाना पड़ा तो पनसे ने अध्ययन अवकाश ले लिया और फिलाडेल्फिया की ड्रेक्सेल यूनिवर्सिटी से तीन वर्षीय एमबीए कोर्स 12 महीनों में कर डाला. वे कहती हैं, ''मेरी प्रतिबद्धता 200 प्रतिशत है.” इलाहाबाद बैंक का कामकाज संभालने के बाद जल्द ही यह जाहिर भी हो गया.
वे एक दुर्घटना में घायल हो गई थीं और उन्हें दो महीने आराम करने की सलाह दी गई थी. 13वें दिन उन्होंने घर से ही काम करना शुरू कर दिया और एक माह भी नहीं बीता था कि वे अपने दफ्तर पहुंच गईं.
जनवरी में रिटायर होने से पहले वे एक साल से थोड़ा ज्यादा समय तक बैंक का नेतृत्व कर चुकी होंगी. वे कहती हैं, ''एक साल बहुत कम होता है. इसलिए मैंने बस सभी चीजों को फास्टफारवर्ड कर दिया है.” ठीक वैसे ही जैसा कि 15 साल पहले उन्होंने ड्रेक्सेल में किया था.
अप्रैल-जून की तिमाही 3.09 लाख करोड़ के कुल कारोबार के साथ समाप्त करने के बाद अब उनका लक्ष्य एक ऐसा बैंक पीछे छोड़कर जाने का है जो 3.6 लाख करोड़ के कुल कारोबार के साथ वित्तीय वर्ष की समाप्ति करे. वे कहती हैं, ''हम इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे.”
वे बैंक में भर्ती हो गईं और अगले 37 वर्ष तक अपने पेशे की सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ती रहीं. पिछले अक्तूबर में उन्होंने इलाहाबाद बैंक की मुखिया का पदभार ग्रहण करने के लिए विजया बैंक के एकमात्र कार्यकारी निदेशक की कुर्सी छोड़ दी.
इस प्रक्रिया में वे 148 वर्ष पुरानी संस्था, भारत के सबसे पुराने बैंक का नेतृत्व करने वाली पहली महिला बन गई हैं. पानसे 'चेयरमैन’ शब्द पर जोर देती हैं. उनके लिए यह कार्यकारी निदेशक या प्रोबेशनरी ऑफिसर जैसा 'एक पदनाम भर’ है. वे कहती हैं, ''इसमें कोई जेंडर, सेक्स, महिला या पुरुष की बात नहीं है.”
वे महिलाओं की तरक्की की राह में अदृश्य दीवार की धारणा से जरा भी विचलित नहीं होतीं. वे कहती हैं, ''मैं इसे उस तरह नहीं देखती.” वे बताती हैं कि महिला होना उनकी पेशेवर जिंदगी में तब तक कोई मुद्दा नहीं था जब तक कि वे जनरल मैनेजर नहीं बन गईं. वे कहती हैं, ''महिलाओं को (तब) नीची निगाह से देखा जाता था और उनसे बहुत अपेक्षा नहीं की जाती थी.
सरकारी क्षेत्र में आज भी ऐसा ही है.” लेकिन वे यह भी जोड़ती हैं कि मानसिकता बदल रही है—सार्वजनिक क्षेत्र के 26 बैंकों में से तीन का नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं (पनसे के अलावा बैंक ऑफ इंडिया में विजयलक्ष्मी अय्यर और युनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया में अर्चना भार्गव हैं), और ऐसी खबर है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की प्रबंध निदेशक अरुंधती भट्टाचार्य उसकी अगली प्रमुख होंगी.
59 वर्षीया पानसे अपनी उपलब्धियों का श्रेय अपने माता-पिता को देती हैं. वे बताती हैं, ''हमारा पालन-पोषण आत्मनिर्भर लोगों के रूप में हुआ था. मेरी मां कहा करती थीं, 'तुम इसे कर सकती हो’.” पनसे ने अपने करियर को गंभीरता से लेते हुए शाम को बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई की और 1993 में मैनेजमेंट और फाइनेंस में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की.
1998 में जब उनके पति को काम के सिलसिले में अमेरिका जाना पड़ा तो पनसे ने अध्ययन अवकाश ले लिया और फिलाडेल्फिया की ड्रेक्सेल यूनिवर्सिटी से तीन वर्षीय एमबीए कोर्स 12 महीनों में कर डाला. वे कहती हैं, ''मेरी प्रतिबद्धता 200 प्रतिशत है.” इलाहाबाद बैंक का कामकाज संभालने के बाद जल्द ही यह जाहिर भी हो गया.
वे एक दुर्घटना में घायल हो गई थीं और उन्हें दो महीने आराम करने की सलाह दी गई थी. 13वें दिन उन्होंने घर से ही काम करना शुरू कर दिया और एक माह भी नहीं बीता था कि वे अपने दफ्तर पहुंच गईं.
जनवरी में रिटायर होने से पहले वे एक साल से थोड़ा ज्यादा समय तक बैंक का नेतृत्व कर चुकी होंगी. वे कहती हैं, ''एक साल बहुत कम होता है. इसलिए मैंने बस सभी चीजों को फास्टफारवर्ड कर दिया है.” ठीक वैसे ही जैसा कि 15 साल पहले उन्होंने ड्रेक्सेल में किया था.
अप्रैल-जून की तिमाही 3.09 लाख करोड़ के कुल कारोबार के साथ समाप्त करने के बाद अब उनका लक्ष्य एक ऐसा बैंक पीछे छोड़कर जाने का है जो 3.6 लाख करोड़ के कुल कारोबार के साथ वित्तीय वर्ष की समाप्ति करे. वे कहती हैं, ''हम इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे.”

