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स्वरूपा सान्याल: ऊंची छलांग

वे ऐसी योजना लागू कर रही हैं जिससे देश का सबसे बड़ा बीपीओ और भी कमाऊ कंपनी हो जाएगा

अपडेटेड 10 सितंबर , 2013
उनकी एड़ी की ठक-ठक बोर्ड रूम के सन्नाटे को तोड़ती है. 41 साल की स्वरूपा सान्याल बेरंग से कमरे में प्रवेश करते ही गुलाबी कवरवाला अपना आइफोन मेज पर रखती हैं. वे फौरन एक ऐसे प्लान के बारे में बात करने लगती हैं, जिसका मकसद देश की सबसे बड़ी बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग कंपनी, जेनपैक्ट को अगले पांच साल में ज्यादा मुनाफा देने वाली कंपनी बनाना है.

सान्याल को उनके उपनाम साशा से ज्यादा जाना जाता है. वे जेनपैक्ट को स्ट्रेटजी और कॉर्पोरेट इनिशियेटिव्ज के मामले में ग्लोबल लीडर बनाने के काम की अगुआई कर रही हैं. वर्षों तक जेनपैक्ट का मकसद आमदनी बढ़ाना रहा है. यह विशाल बीपीओ कंपनी बन गई. इसने 24 बिजनेस वर्टिकल्स से 2012 में 1.9 अरब डॉलर का राजस्व और 17.8 करोड़ डॉलर का मुनाफा कमाया.

लेकिन अब सान्याल का लक्ष्य 2013 में जेनपैक्ट की आमदनी चार से छह करोड़ डॉलर बढ़ाने का है. इसके लिए वे लागत घटाएंगी, दाम और ग्राहक बढ़ाएंगी. वे कहती हैं कि उनकी टीम जेनपैक्ट के सबसे कम मुनाफा देने वाले 15 ग्राहकों से मुनाफा बढ़ाने में जुटी है. नए खाके में बिजनेस वर्टिकल्स को घटाकर आठ करना और लक्ष्य 2017 तक कोई अधिग्रहण किए बिना कमाई को दोगुनी यानी चार अरब डॉलर करने का है.


सान्याल को यह चुनौती भरी भूमिका रातो-रात नहीं मिल गई. उन्होंने याद किया कि कैसे छह साल पहले जब वे कॉर्बेट नेशनल पार्क में थीं तब जेनपैक्ट के सीईओ एन.वी. 'टाइगर’ त्यागराजन का फोन आया. वे चाहते थे कि सान्याल स्मार्ट इंटरप्राइज प्रोसेसेज चलाएं जो जेनपैक्ट के ग्राहकों को अधिक प्रोडक्टिव होने में मदद देता है.

सान्याल यह ऑफर लेने में हिचक रही थीं, क्योंकि उन्होंने इससे पहले ऐसा काम नहीं किया था. उस समय उनकी बेटी भी सिर्फ छह महीने की थी. लेकिन त्यागराजन ने उन्हें मना लिया.

जेनपैक्ट में दस साल से ज्यादा काम करते हुए सान्याल ने सात भूमिकाएं अपनाई हैं. वे कहती हैं, ''मैं जब भी कुछ सहज होने लगती हूं तो टाइगर मुझे कोई नया काम थमा देते हैं.”

आज उनके पास अपने लिए पहले से ज्यादा समय है. वे शाम सात बजे घर पहुंच जाती हैं और साढ़े आठ बजे जब तक उनके बच्चे सो नहीं जाते, तब तक कोई कॉल नहीं लेतीं. उनकी जिंदगी बड़े नियम से चलती है. उन्होंने बताया, ''सोमवार से शुक्रवार तक सुबह उठते ही जिम जाती हूं, बच्चों को तैयार करके उन्हें स्कूल पहुंचाती हूं, काम पर जाती हूं और रात साढ़े नौ बजे तक सो जाती हूं.”

इस सब के बीच अचानक उन्हें अपना बचपन याद आ गया, तब सौतेले बाप ने कहा था कि महिला या तो सिर्फ घर संभाल सकती है या काम. वे कहती हैं, ''उस समय भी मैं दोनों करना चाहती थी. मैं हमेशा से बच्चे चाहती थी और हमेशा काम करना चाहती थी.” यह है उनके भीतर की महिला और शायद फोन का गुलाबी कवर उसी महिला की पसंद है.
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