राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव हमेशा बिहार में अलग-अलग तरह की भावनाओं को प्रेरित करते रहे हैं. उनके नाम से उनके समर्थकों में प्यार उमड़ पड़ता है तो विरोधियों में घबराहट पैदा होती है और कुछ नेताओं के लिए तो वे एक अवसर की तरह हैं जो पप्पू के जबरदस्त प्रभाव को भुनाना चाहते हैं.
जब पटना हाइकोर्ट ने विधायक अजित सरकार की हत्या के मामले में उन्हें बरी कर दिया तो 48 वर्षीय पप्पू यादव 22 मई को जोर-शोर के साथ बेऊर जेल से बाहर आ गए, जहां वह 2008 में दोषी ठहराए जाने के बाद से ही उम्र कैद की सजा काट रहे थे. अब उन्होंने यह पाया कि उनके आसपास की दुनिया दो खेमों में बंटी हुई है.
बाहर निकलते ही वे अपने दोस्तों से घिर गए, जबकि उनके विरोधियों ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) पर आरोप लगाया कि उसके लापरवाह तरीके से जांच किए जाने की वजह से ही पप्पू यादव बरी हो गए हैं. मारे गए विधायक अजित सरकार की पत्नी माधवी सरकार ने कहा कि वे इस रिहाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगी, लेकिन पप्पू यादव के मित्रों और दुश्मनों के अलावा बिहार के राजनैतिक दिग्गज उनकी रिहाई पर पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए हैं. पप्पू ने भी अपने राजनैतिक पत्ते नहीं खोले हैं, हालांकि उन्होंने यह बताया कि उनकी रणनीति 'युवाओं को जगाने' की होगी.
पप्पू यादव 1990 में सिर्फ 25 वर्ष की उम्र में ही विधायक बन गए थे और इसके बाद उन्होंने 1991, 1996 और 1999 में तीन बार पूर्णिया लोकसभा सीट पर जीत हासिल की. सीमांचल और कोसी इलाके में अच्छा प्रभाव रखने वाले पप्पू यादव 2004 में मधेपुरा से विजयी हुए थे. 1990 से 2004 के अपने 14 साल के छोटे से राजनैतिक करियर में पप्पू ने छह बार चुनाव लड़ा है और इसमें से पांच बार विजयी हुए हैं. बिहार की राजनीति में जो समीकरण बन रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि पूर्णिया से बीजेपी के ताकतवर सांसद उदय सिंह से निबटने के लिए जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) पप्पू यादव के साथ आ सकता है. वैसे तो उदय सिंह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भरोसेमंद एन.के. सिंह के भाई हैं, लेकिन जेडीयू पूर्णिया के इस सांसद से तब से खफा है, जब उन्होंने पिछले साल बिहार में अच्छे प्रशासन के मुख्यमंत्री के दावों की पोल खोलने के लिए वेदना रैली का आयोजन किया था.
जेडीयू की एक ताकवर लॉबी रणनीतिक तरीके से पूर्णिया से पप्पू यादव को समर्थन देने के पक्ष में है. उनके मुताबिक पप्पू यादव को पार्टी में भी शामिल करने में हिचक नहीं होनी चाहिए, क्योंकि अब वे पटना हाइकोर्ट से बरी हो गए हैं. जेडीयू के एक नेता कहते हैं, 'पूर्णिया में यदि उदय सिंह से कोई मुकाबला करने में सक्षम है तो वह पप्पू यादव ही हो सकते हैं.' बीजेपी और जेडीयू के रिश्तों से ही पप्पू यादव के प्रति उनका व्यवहार तय होगा.
वैसे तो पप्पू की नजदीकी कांग्रेस से है, क्योंकि उनकी पत्नी और सहरसा की पूर्व सांसद रंजीता रंजन कांग्रेस में हैं, लेकिन अब कांग्रेस खुद ही बिहार में नीतीश पर डोरे डाल रही है, जिसकी अनदेखी पप्पू यादव नहीं कर सकते.
2004 में मधेपुरा उपचुनाव में जब पप्पू यादव ने अपना पिछला चुनाव लड़ा था, तो उन्होंने जेडीयू के प्रत्याशी आर.पी. यादव को 2.08 लाख के रिकॉर्ड मतों से हराया था. उस समय उनकी जीत को उनकी पार्टी से बढ़कर एक व्यक्ति की जीत माना गया था.
शरद यादव और नीतीश कुमार, दोनों ने उस चुनाव में जेडीयू प्रत्याशी के समर्थन में प्रचार किया था, फिर भी पप्पू यादव भारी अंतर से विजयी हुए थे. नौ साल बाद अब दोनों नेता पप्पू को अपनी योजना के लिए उपयोगी मान सकते हैं. बिना किसी की चर्चा किए पप्पू यादव ने इंडिया टुडे से कहा, 'मैं पूर्णिया, मधेपुरा, खगड़िया और भागलपुर संसदीय क्षेत्र पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करूंगा.'
पप्पू यादव साफ तौर से एक सांसद के तौर पर बनी अपनी गरीब समर्थक छवि को ही भुनाने का इरादा रखते हैं. जेल जाने से पहले तक उन्होंने अपनी छवि रॉबिन हुड जैसी ही बना ली थी. उनके जबरदस्त दबदबे की वजह से ही उनके लोकसभा क्षेत्र में बिजली कभी नहीं कटती थी. डॉक्टर गरीबों का इलाज मुफ्त में किया करते थे. वे उनके उत्कर्ष के दिन थे. अब एक दशक के बाद पप्पू यादव इस बारे में गहरा विचार-विमर्श कर रहे हैं कि इतिहास को किस तरह दोहराया जाए. हालांकि, यह इतना आसान भी नहीं है.

