मई महीने की 30 तारीख है और सुबह से ही दिल्ली यूनिवर्सिटी की आर्ट्स फैकल्टी के सामने छात्रों और टीचर्स की भीड़ जमा होनी शुरू हो गई है. दिन चढ़ रहा है, पारा 45 डिग्री तक पहुंच चुका है. लोग पसीने से तरबतर हैं, फिर भी डटे हुए हैं. ये सब लोग आज अंडरग्रेजुएट कोर्स को तीन वर्ष से बढ़ाकर चार वर्ष का करने के दिल्ली यूनिवर्सिटी के फैसले के विरोध में एकजुट हुए हैं.
इस भीड़ में 21 साल का एक लड़का राजेश भाटी सबसे ऊंची आवाज में नारे लगा रहा है. राजेश पॉलिटिकल साइंस से बीए थर्ड ईयर का स्टूडेंट है. ग्रेटर नोएडा के पास एक छोटे से गांव का यह लड़का सुबह एक मोबाइल शॉप में नौकरी करता है और दोपहर में ग्रेटर नोएडा से नॉर्थ कैंपस आकर क्लास करता है. तीन साल के कोर्स को छह सेमेस्टर में बांट देने के बाद ही उसके गरीब परिवार पर फीस का बोझ दोगुना हो गया था, लेकिन अब चार साल की पढ़ाई तो और मुश्किल हो जाएगी. राजेश कहता है, 'घर में छोटे भाई-बहन हैं. खर्चा बढ़ जाएगा. बहन को पढ़ाना तो दूर, भाई को भी ग्रेजुएट बनाना मुश्किल होगा.'
उधर, इस आर्ट्स फैकल्टी से थोड़ी ही दूर अपने एयरकंडीशंड दफ्तर में बैठे दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. दिनेश सिंह इस विरोध-प्रदर्शन से बिलकुल निश्चिंत चार वर्षीय पाठ्यक्रम के फायदे गिना रहे हैं, 'यह मॉडर्न एजुकेशन सिस्टम है. इससे छात्रों को बहुत फायदा होगा, उनकी काबिलियत बढ़ेगी. उन्हें अच्छी नौकरी मिलने में आसानी होगी.'
वर्ष 2008 में दिल्ली विवि की एकेडमिक काउंसिल में चार वर्षीय पाठ्यक्रम का प्रस्ताव लाया गया था. उसके बाद से लंबे उतार-चढ़ाव और विरोध के बावजूद आखिरकार बीती 9 मई को डीयू की एग्जीक्यूटिव काउंसिल ने बहुमत से अंडरग्रेजुएट कोर्स को तीन वर्ष से बढ़ाकर चार वर्ष करने के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी. मीटिंग में मौजूद 21 लोगों में से महज दो लोगों ने इसका विरोध किया. इसी तरह एकेडमिक काउंसिल ने भी 86 सदस्यों के समर्थन और 6 सदस्यों के विरोध के साथ प्रस्ताव को सफलतापूर्वक पारित कर दिया.
अब जुलाई 2012 में शुरू हो रहे नए सत्र के साथ डीयू नए कोर्स को लागू करने जा रहा है. छात्र उलझन में हैं. छोटे कस्बों और गांवों से आने वाले छात्रों के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं. लेकिन डीयू की वेबसाइट का नजारा कुछ और ही है. सीबीएसई बोर्ड के इस वर्ष के टॉपर्स की फोटो के साथ डीयू की वेबसाइट पर लिखा है, 'सीबीएसई टॉपर्स ने किया चार वर्षीय पाठ्यक्रम का स्वागत.'
एक ओर जहां यूजीसी के चेरयरमैन प्रो. वेदप्रकाश इस फैसले का स्वागत किया है, वहीं केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री शशि थरूर इस मामले में किसी प्रकार के हस्तक्षेप से इन्कार करते हैं. वे कहते हैं, 'नेताओं और नौकरशाहों को विवि के फैसले में दखल नहीं देना चाहिए.' प्रसिद्घ वैज्ञानिक और शिक्षाविद् प्रो. यशपाल के मन में कुछ आशंकाएं हैं, लेकिन वे इस फैसले का स्वागत करना चाहते हैं.
वहीं, एक बड़ा वर्ग इसके विरोध में डटा हुआ है. डीयू में अंग्रेजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हेनी बाबू कहते हैं, 'इसका मतलब ऑनर्स डिग्री को उन लोगों तक सीमित कर देना है, जो एक साल का अतिरिक्त बोझ उठा सकते हैं. पहले से ही वंचित एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यकों और लड़कियों को इस फैसले से नुकसान होगा. शिक्षा उनसे और दूर हो जाएगी.'
मिरांडा हाउस में फिजिक्स की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आभा देवहबीब तो इस फैसले को शिक्षा के निजीकरण और फॉरेन यूनिवर्सिटीज के लिए अपने दरवाजे खोल देने की बड़ी साजिश के रूप में देख रही हैं. वे कहती हैं, 'आप यूनिवर्सिटी को सरकार के लिए मुनाफा कमाने वाली मशीनरी बनाना चाहते हैं. फोर ईयर प्रोग्राम एजुकेशन में फॉरेन इन्वेस्टमेंट का स्वागत करने के लिए उठाया गया कदम है.'
यूनिवर्सिटी प्रशासन के इसके पक्ष में अपने तर्क हैं. डीयू के डीन ऑफ स्टूडेंट वेलफेयर जे.एम. खुराना कहते हैं, 'हर साल 25 फीसदी छात्र पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं. इस प्रोग्राम में उन्हें दो साल में डिप्लोमा, तीन साल में ग्रेजुएशन और चार साल में ऑनर्स की डिग्री मिलेगी. साथ ही 12 फाउंडेशन कोर्स उन्हें जॉब मार्केट में ज्यादा योग्य उम्मीदवार बनाने में सहयोगी होंगे.' दिल्ली विवि छात्रसंघ के अध्यक्ष अरुण हुड्डा कहते हैं, 'कुछ लोगों का काम सिर्फ विरोध करना है. यह कोर्स छात्रों के फायदे के लिए है.'
इन सबके बीच उलझन में फंसे छात्रों के अपने सवाल हैं. 12 फाउंडेशन कोर्स का स्वरूप क्या होगा? उन विषयों का आधा-अधूरा ज्ञान किस काम का, जिसमें स्पेशलाइजेशन नहीं होना है? चौथे साल के 55,000 नए छात्रों (डीयू में हर साल लगभग इतने ही छात्र दाखिला लेते हैं) को पढ़ाने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर कहां से आएगा? एक साल की बढ़ी हुई फीस और दिल्ली में रहने के खर्चे कौन उठाएगा? लड़कियों की शादी के लिए क्या माता-पिता चार साल इंतजार करेंगे और एक लड़की की पढ़ाई पर इतने पैसे खर्च करने को तैयार होंगे? हंसराज कॉलेज में इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर जस्टिन का यह बुनियादी सवाल ही शायद इस बहस का वाजिब जवाब है- 'गरीबों, दलितों और लड़कियों के लिए शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है, जिसके जरिए वे अपनी जिंदगी बदल सकते हैं, लेकिन क्या इस फैसले से वही शिक्षा से और दूर नहीं हो जाएंगे?'

