यह पहला मौका था, जब समाजवादी पार्टी ( सपा) के किसी आयोजन में पार्टी के शीर्ष नेता हिंदू धर्मनगरी अयोध्या और मथुरा के उन साधु-संतों के सामने शीश नवाए खड़े थे, जिनसे वे अभी तक दूरी बनाए रखते थे. परशुराम जयंती पर बीती 12 मई को सपा के प्रदेश मुख्यालय में आयोजित भव्य ब्राह्मण समारोह ने साफ कर दिया कि दलित, मुसलमान के बाद अब ब्राह्मïण समुदाय भी राजनीतिक पार्टियों की वोट बैंक की राजनीति में निशाने पर आ गया है.
इसी समय लखनऊ से 350 किलोमीटर दूर पूर्वी जिले महाराजगंज में बीएसपी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद मिश्र वहां के जवाहर लाल नेहरू पीजी कॉलेज के मैदान में आयोजित एक ब्राह्मïण सम्मेलन में पंडितों को बीएसपी से जुडऩे के फायदे गिना रहे थे. बीते एक माह में सपा का अपने पार्टी कार्यालय में यह दूसरा ब्राह्मण सम्मेलन था तो बीते 18 अप्रैल को लखनऊ में ब्राह्मण भाईचारा रैली करने के बाद बीएसपी ने सूबे की 36 लोकसभा सीटों पर ऐसी ही रैलियों का सिलसिला शुरू किया है.
2014 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों का बिगुल बजते ही पार्टियों को ब्राह्मणों में अचानक वोट बैंक क्यों नजर आने लगा है? चार बार प्रदेश के मुख्यमंत्री और 1989 के विधानसभा चुनाव से पहले तक अंतिम ब्राह्मण मुख्यमंत्री रहे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी कहते हैं, ''बीते वर्षों में प्रदेश में सबसे ज्यादा ब्राह्मण ही उपेक्षित हुआ है. अब पहली बार यह वर्ग अपने अधिकारों के लिए एकजुट हो रहा है. इसी एकजुटता में पार्टियों को वोट बैंक नजर आ रहा है. '' ऐसा दावा है कि यूपी में 12 फीसदी ब्राह्मण हैं. राज्य नियोजन संस्थान के एक अधिकारी बताते हैं कि 2007 में सुल्तानपुर जिले में कराए गए एक सर्वे के मुताबिक, यहां कन्या विद्या धन पाने वाली छात्राओं में करीब 40 फीसदी ब्राह्मण परिवारों से थीं. इतना ही नहीं, पिछले वर्ष सपा सरकार बनने के बाद बेरोजगारी भत्ता पाने वाले बेरोजगारों में सबसे ज्यादा 40 से 45 फीसदी ब्राह्मण हैं. पिछले 20 वर्षों से यूपी में लगातर कम होती जा रही नौकरियों की सबसे ज्यादा मार ब्राह्मणों पर ही पड़ी है. नौकरियों में उचित प्रतिनिधित्व न मिलने के कारण ब्राह्मण समुदाय में रोष है.
प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में 20 ऐसी हैं, जिनमें ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या 20 से 25 फीसदी होने का दावा किया जाता है और यहां यह समुदाय चुनाव में निर्णायक भूमिका में है. ये सीटें हैं—शाहजहांपुर, हरदोई, सीतापुर, लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, अमेठी, सुल्तानपुर, भदोही, वाराणसी, मिर्जापुर, फैजाबाद, गोंडा, बस्ती, देवरिया, बलिया, खलीलाबाद, महाराजगंज, कुशीनगर और गाजियाबाद.
इन 20 लोकसभा सीटों में लखनऊ, वाराणसी और गाजियाबाद को छोड़कर बाकी सभी पिछड़े जिलों से आती हैं. इससे सामान्य रूप से एक अंदाजा लगाया जा सकता है कि ब्राह्मण वर्ग में एकजुटता की एक बड़ी वजह आर्थिक पिछड़ापन भी है. लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी पार्टियों में सबसे पहले सपा ने ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने की कोशिश शुरू की. पार्टी ने इसका जिम्मा रायबरेली की ऊंचाहार विधानसभा से विधायक और समाजवादी ब्राह्मण सभा के अध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार पांडेय को सौंपा. पांडेय ने पिछले साल नवंबर में सपा के प्रदेश मुख्यालय से ब्राह्मïण सम्मेलनों के एक सिलसिले का आगाज किया, जो सूबे के आधे से ज्यादा जिलों में हुए.
मार्च में प्रतापगढ़ के कुंडा में सीओ जियाउल हक की हत्या के बाद यहां से विधायक और तत्कालीन खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाने के बाद ठाकुर वोटरों के पार्टी से छिटकने के भय से सपा ने इसकी भरपाई ब्राह्मणों को साथ जोडऩे की रणनीति अख्तियार करके की है.
पांडेय बताते हैं, ''पिछले साल प्रदेश में सरकार बनाने के बाद सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण को समाप्त करने से भी सपा ब्राह्मण मतदाताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुई है. प्रमोशन में आरक्षण ही एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर बीएसपी ब्राह्मïण मतदाताओं के बीच बैकफुट पर है. '' बीएसपी के प्रदेश प्रवक्ता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं, ''प्रमोशन में आरक्षण अनुसूचित जाति और जनजाति को मिला संवैधानिक अधिकार है. इससे अन्य जातियों के हक पर कोई आंच नहीं आने वाली. लेकिन विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे पर कुप्रचार कर ब्राह्मïण समेत सभी सवर्ण जातियों को भ्रमित कर रही हैं. ''
सपा और बीएसपी अगर ब्राह्मण वोटों की जंग में कूद पड़ी हैं तो बीजेपी को भी सपा सरकार की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के चलते बने माहौल में ब्राह्मणों के फिर से बीजेपी से जुडऩे की संभावना नजर आने लगी है. वरिष्ठ बीजेपी नेता कलराज मिश्र कहते हैं, ''रामजन्म भूमि का निर्माण न करवा पाने से ब्राह्मण मतदाता पार्टी से दूर हुआ. तीन साल पहले इसे मुद्दे पर हाइकोर्ट के निर्णय के बाद इसे आम सहमति से हल करने के प्रयास तेज हो गए हैं. इसके अलावा सपा और बीएसपी की सरकारों के कुशासन से आजिज आकर ब्राह्मण मतदाताओं में बीजेपी के सुशासन से जुडऩे की ललक पैदा हुई है. ''
सूबे में बीजेपी, सपा और बीएसपी की तुलना में कांग्रेस भले ही चुनावी तैयारियों की दौड़ में सुस्त हो लेकिन यूपी में ब्राह्मण वोटों को हथियाने की जंग अब जबानी जमाखर्च से निकलकर रैलियों तक पहुंच गई है. आगामी दिनों में बीजेपी और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां भी अगर इस जंग में अपने ब्राह्मण नेताओं के कंधों पर बंदूक रखकर कूद पड़ें तो आश्चर्य नहीं होगा.

