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नए उम्‍मीदवार करते हैं सबसे ज्‍यादा 'हाथी' की सवारी

चुनाव की जमीन पर खुद को आजमाना चाह रहे नेताओं के लिए बीएसपी बन रही आदर्श जगह.

अपडेटेड 12 मई , 2013

कहते हैं न कि जिंदा हाथी लाख का और मरा तो सवा लाख का. इस कहावत को पिछले विधानसभा चुनाव में बीएसपी से जीते उन 6 विधायकों से बेहतर कौन जान सकता है, जो जीते तो हाथी के सहारे लेकिन उसके बाद बीएसपी का साथ छोडऩे से हाथी उनके लिए लाख से सवा लाख का साबित हुआ. ये सभी विधायक कांग्रेस से तिकड़म लड़ाकर मंत्री या फिर संसदीय सचिव बन गए. हालांकि इनकी जीत जटिल गुणा-गणित का नतीजा थी. लेकिन बाद में जोड़-तोड़ से इन विधायकों के सिर पर ताज सज गया. इसी ताज की चमक ने इस बार बीएसपी के टिकटों के लिए संभावित उम्मीदवारों की लाइन लगा दी है. 29 उम्मीदवार तो घोषित भी किए जा चुके हैं, हालांकि चुनाव साल के अंत में हैं.

घोषित उम्मीदवारों में ब्राह्मण, राजपूत, गुर्जर और दलित हैं. इतने पहले प्रत्याशियों का ऐलान? बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष भगवानसिंह बाबा साफ करते हैं, ‘‘देखिए, टिकट तो देना ही है. पुराने और सच्चे कार्यकर्ताओं को ही टिकट दे रहे हैं.’’ पिछले चुनाव में अच्छे प्रदर्शन से बीएसपी उत्साहित है पर चौकन्नी भी. पिछले चुनाव में उसने दोनों बड़े दलों कांग्रेस और बीजेपी से दरकिनार उम्मीदवारों को टिकट दिए जो जीतने के बाद पार्टी के ही नहीं रहे. ऐसा फिर न हो, इसलिए बीएसपी फूंक-फूंक कर कदम रख रही है. फिलहाल दूसरे दल यात्राओं में लगे हैं तो बीएसपी ने जिला स्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन शुरू कर रखा है.

पिछले चुनाव में जीते 6 विधायक बाद में कांग्रेस सरकार में शामिल हो गए थे. डॉ. राजकुमार शर्मा, राजेंद्र सिंह गुढ़ा और मुरारीलाल मीणा तो राज्यमंत्री बन गए और रामकेश मीणा, रमेश मीणा और गिर्राजसिंह संसदीय सचिव. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से इनकी खूब जमी. इन्हीं के समर्थन के बूते गहलोत सरकार का कार्यकाल भी पूरा होने को है. बीएसपी ने विधानसभा अध्यक्ष दीपेंद्रसिंह शेखावत से इन विधायकों की सदस्यता भंग किए जाने की दरखास्त की. शेखावत ने कार्रवाई में तीन साल लगा दिए. बसपाई हाइकोर्ट गए तो उसके आदेश के बाद स्पीकर ने कार्रवाई आगे बढ़ाई लेकिन कोर्ट का फैसला इन विधायकों के पक्ष में गया.

इस फैसले के खिलाफ बसपाई सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचे. पार्टी को उम्मीद है कि इस मामले में ऐसा कोई फैसला आएगा, जिससे भविष्य में कोई इस तरह से हाथी का साथ न छोड़ सकेगा.

खैर, प्रदेश में बीएसपी ने 1998 में 112 और 2003 में 125 उम्मीदवार उतारे पर जीते 2-2 ही. 2008 में वह सभी 200 विधानसभा सीटों पर उतर पड़ी और 6 सीटें जीत लीं. अब बीएसपी यहां बड़े दलों में उम्मीदवारी के लिए तैयारी के मंच जैसा बन गई है. पिछले चुनाव में 6 सीटों पर जीत के अलावा उसके 11 उम्मीदवार दूसरे नंबर पर थे. ऐसे भी कई उम्मीदवार थे, जो खुद तो लड़ाई में नहीं आए लेकिन समीकरण जरूर बिगाड़ दिया. नागौर के डीडवाना विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी के पूर्व मंत्री की जीत में हाथी ही रोड़ा बना. बीएसपी से श्याम प्रताप सिंह ने यहां से चुनाव लड़ा. अपने पहले चुनाव में उन्हें करीब 16,000 वोट मिले और इतने ही वोटों से पूर्व मंत्री यूनुस खां हारे. खींवसर से दुर्गसिंह के खड़े होने से बीजेपी के पूर्व मंत्री गजेंद्रसिंह को जोधपुर के लोहावट भागना पड़ा. पूरे प्रदेश में बीएसपी उम्मीदवारों ने कदकाठी दिखाई.

नए नेताओं की जमात के लिए बीएसपी बेहतर विकल्प साबित हो रही है. उन्हें दलितों के एकमुश्त वोट तो मिल ही जाते हैं. इसके अलावा कुछ अपनी जाति-समाज के. 15,000-25,000 वोट किसी भी विधानसभा क्षेत्र में समीकरण बदल देते हैं. ऐसे में कांग्रेस और बीजेपी बीएसपी के उम्मीदवारों की अनदेखी नहीं कर सकतीं. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. चंद्रभान की मानें तो राजस्थान में तीसरे विकल्प की संभावना भले न हो पर उम्मीदवार तय करते वक्त दोनों दलों को पिछली हार की पहली वजह (यानी हाथी) पर जरूर ध्यान देना होगा.

मदन प्रजापत बाड़मेर के पचपदरा से कांग्रेस विधायक हैं लेकिन 2003 में  यहां उन्होंने बीएसपी के टिकट पर ही जमीन आजमाई थी. तब उन्हें 21,000 वोट मिले. उनकी कदकाठी को देख 2008 में कांग्रेस ने उन्हें टिकट दे दिया. भरतपुर के नगर से माहिर आजाद 1998 में बीएसपी से विधायक बने और 2003 में कांग्रेस के विधायक थे. हनुमानगढ़ में 2008 के चुनाव में बीएसपी के जसपालसिंह दूसरे नंबर पर रहे. उन पर बीजेपी नेता वसुंधरा राजे की नजर गड़ गई. उन्होंने सिंह को बीजेपी से जोड़ लिया और इसी पार्टी के टिकट पर सिंह की पत्नी नगरपरिषद की चेयरमैन बन गईं. बीएसपी के बाबा इसी पर तो कहते हैं,  ‘‘बीएसपी नेता बनाने का कारखाना है.’’ नागौर जिले में मकराना के पूर्व विधायक भंवरलाल राजपुरोहित बीजेपी से विधायक हुआ करते थे. 2008 में बीजेपी ने टिकट काटा तो वे हाथी पर चढ़ लिए और बीजेपी की लुटिया डुबो दी.

पिछले चुनावों में मिली कामयाबी की बिना पर बीएसपी अब राजस्थान में तीसरी ताकत के रूप में उभरने की कोशिश में है. लेकिन बीएसपी का टिकट थामने वाले शायद यही सोच रहे हों कि जीते तो तिकड़म की गुंजाइश होगी ही.

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