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छत्तीसगढ़ में नशेड़ी हाथियों का हमला

शराब की गंध से मदमस्त होकर हाथी आबादी की ओर आकर तबाही मचाते हैं.

अपडेटेड 12 मई , 2013

उत्तरी छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के सुतरी गांव में कुछ आदिवासी अपने खेतों और मकानों को पागल हाथियों के झुंड की मार से बचाने के लिए मशालें जलाते हैं, पटाखे चलाते हैं और ढोल बजाकर शोर करते हैं. पर यह मुकाबला बराबरी का नहीं है क्योंकि जीत आम तौर पर नशे में झूमते हाथियों की ही होती है.

ये आदिवासी इस इलाके में बहुतायत में होने वाले महुआ से शराब बनाते हैं. हर परिवार को पांच लीटर शराब बनाने की इजाजत है. महुआ से शराब बनाने और पीने की तरह ही हाथियों का उत्पात झेलना भी आदिवासियों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. हर साल गर्मी आते ही महुआ की नशीली गंध, जशपुर के जंगलों के आस-पास बसे गांवों में जबरदस्त तबाही लेकर आती है और उसकी मार झारखंड और ओडिसा को भी झेलनी पड़ती है.

पिछले कु छ दिनों से दर्जनों हाथियों ने जशपुर के गांवों को अपना निशाना बना रखा है, उन्हें मशालों, पटाखों और ढोल-नगाड़ों के शोर की भी कोई परवाह नहीं है. मस्त हाथी मिट्टी के घरों को तोड़कर वहां रखी महुआ की शराब पीते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं. और पीछे रह जाते हैं अपनी आंखों के सामने हुई तबाही को देख अपनी बेबसी पर रोते आदिवासी लोग.

चूंकि गर्मी के महीने में जंगल का पानी सूख जाता है और पेड़-पौधे भी कम हो जाते हैं, इसलिए हाथी पानी और भोजन की तलाश में इंसानी बस्तियों की तरफ बढऩे लगते हैं. वहां रखी महुआ की शराब नशा करा ही देती है.

लेकिन सरकार को मनुष्यों से ज्यादा चिंता हाथियों की है. 9 अप्रैल को हाथियों ने कुंकरी गांव में 5 साल की अन्नू बाई को कुचल दिया था और एक अन्य बच्ची को घायल कर दिया था. पिछले एक माह में जशपुर में हाथियों के 40 से ज्यादा हमले हो चुके हैं. लेकिन लोगों की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं हुआ, उलटा 14 अप्रैल को रायगढ़ जिले के सागरपुर गांव में जब एक गर्भवती हथिनी की लाश मिली, जो बिजली का तार सटने से मरी थी तो 50 वर्षीय किसान नारायण विश्वास को उसे मारने के आरोप में जेल भेज दिया गया.

हाथियों की तबाही से प्रभावित लोगों को सरकार की ओर से मामूली मुआवजा मिलता है. हाथियों के हमले में मौत होने पर दो लाख रु., पूर्ण शारीरिक अपंगता के मामले में 75,000 रु., पालतू पशु की मौत के बदले 20,000 रु., फसल उजडऩे पर प्रति हेक्टेयर 4,000 रु. और कच्चे घर को नुकसान पहुंचने पर 2,000 रु. दिए जाते हैं.

छत्तीसगढ़ के वन अधिकारियों की मानें तो जंगली जानवरों ने झारखंड और ओडिसा से छत्तीसगढ़ तक गलियारा बना लिया है. एक वरिष्ठ वन अधिकारी बताते हैं कि पेड़ों की अवैध कटाई और झरखंड तथा ओडिसा में खनन से सिकुड़ते जंगलों ने हाथियों को छत्तीसगढ़ की तरफ आने पर मजबूर कर दिया है. छत्तीसगढ़ के वन मंत्री विक्रम उसेंडी ने विधानसभा में बताया कि 2010 से अब तक हाथियों के हमले से 82 लोगों की मौत हो चुकी है.

ये हाथी 1994 से उत्तरी छत्तीसगढ़ में जशपुर, रायगढ़, सरगुजा, कोरबा और कोरिया की तरफ आ रहे हैं. इनमें से कुछ तो झारखंड और ओडिसा लौट गए पर 150 से अधिक हाथियों ने छत्तीसगढ़ के जंगलों में ही डेरा डाल लिया है.

मुख्य वन्यजीव संरक्षक राम प्रकाश का कहना है कि ये हाथी, पानी और भोजन की तलाश में इंसानी बस्तियों में आते हैं. वे बताते हैं, ‘‘बांस, फलों और ऐसी दूसरी चीजों के पेड़ लगाए जा रहे हैं जिनसे इनका जंगल में ही पेट भर जाए और ये इंसानी बस्तियों की तरफ न आएं. जंगल में तालाब और पोखर भी बनाए जा रहे हैं ताकि इनकी प्यास बुझ सके.’’

राम प्रकाश के मुताबिक, गांववालों को अब मिट्टी के तेल सहित दूसरी सामग्री भी दी जा रही है जिसकी मदद से वे हाथियों को अपनी बस्तियों से दूर रख सकें. उनका कहना है कि हालात धीरे-धीरे सुधर रहे हैं. हमलों में मरने वालों की तादाद में ठहराव आने से पता लगता है कि इंसान और हाथी साथ मिलकर रहना सीख रहे हैं. 1990 के दशक की शुरु आत में यहां सिर्फ 25-30 हाथी हुआ करते थे, उनके हमले में हर साल 27-30 लोगों की मौत होती थी. पिछले कुछ वर्षों में मृतकों की संख्या में बहुत अधिक बढ़ोतरी नहीं हुई है. इंसानों और हाथियों के बीच जारी इस जंग में 2003 से अब तक एक दर्जन से भी कम हाथियों की मौत हुई है. यह वन्यजीव प्रेमी लोगों के लिए राहत की बात हो सकती है.

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