सन् 1947 में सरगुजा, (अब छत्तीसगढ़ में) के महाराजा ने भारत के आखिरी तीन एशियाई चीतों को मार डाला था. 15 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण और वन मंत्रालय के भारत में फिर से अफ्रीकी चीतों को बसाने के प्रस्ताव को इस आधार पर खारिज कर दिया कि इस प्रस्ताव की गुणवत्ता को प्रमाणित करने के लिए कोई अध्ययन नहीं किया गया है.
लेकिन नागपुर की जीवविज्ञानी प्रदान्य गिराड़कर का कहना है कि वे वैज्ञानिक ढंग से यह साबित कर सकती हैं कि अफ्रीकी चीते भारत में जीवित रह सकते हैं. वे नामीबिया स्थित चीतों के संरक्षण के विश्व के प्रमुख केंद्र चीता कंजर्वेशन फंड (सीसीएफ) से प्रशिक्षित एकमात्र भारतीय हैं.
मंत्रालय ने वन्यजीव विशेषज्ञ एम.के. रंजीत सिंह, एक अमेरिकी आनुवंशिकी विज्ञानी स्टीफेन ओ ब्रायन और सीसीएफ के लारी मार्कर से विचार-विमर्श करने के बाद 2010 में नामीबिया से 18 चीतों को मंगाने का प्रस्ताव किया था. प्रस्ताव को संवैधानिक समिति राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के पास मंजूरी के लिए भेजा गया. बोर्ड ने प्रस्ताव को मंजूरी तो नहीं दी मगर कोई एतराज भी दर्ज नहीं किया. इसलिए पर्यावरण और वन मंत्रालय ने 300 करोड़ रु. खर्च कर चीतों को बसाने की योजना को औपचारिक रूप दे दिया.
देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान ने मध्य प्रदेश के 6,800 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले श्योपुर जिले में स्थित कुनो-पालपुर अभयारण्य को भारत में चीतों के घर के रूप में चिन्हित किया. मई, 2012 में गुजरात सरकार ने कुनो-पालपुर में चीतों को बसाने पर रोक लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया क्योंकि इस अभयारण्य को अत्यधिक आबादी वाले गिर अभयारण्य से सिंहों को लाकर बसाने के लिए चिन्हित किया गया था. गुजरात सरकार का तर्क था कि ङ्क्षसह तथा चीते अपने निवास का साझा नहीं कर सकते.
तदोबा-अंधारी अभयारण्य के चीतों पर किए गए अपने शोध के लिए मुंबई यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल करने वाली गिराड़कर कहती हैं, ''चीता भारत का मूल निवासी है. मैं अदालत के आदेश का सम्मान करती हूं मगर चीतों को बसाने पर की जा रही आपत्तियों को जायज नहीं ठहराया जा सकता. '' ओ ब्रायन के एक अध्ययन का हवाला देते हुए वे बताती हैं, ''अफ्रीकी और एशियाई चीते आनुवंशिक रूप से एक ही जैसे हैं और अफ्रीकी चीते भारत में जीवित रह सकते हैं. '' वे कहती हैं कि चीते वनों के साथ-साथ पहाड़ों पर भी रह सकते हैं और इस बात पर जोर देती हैं कि वे शेर के इलाके में कभी नहीं प्रवेश करते.
गिराड़कर का कहना है कि डीएनए जांच सुविधा वाला एक अनुसंधान केंद्र भारत में चीतों के बचे रहने में मदद कर सकता है. उनके अनुसार, ''चीते के दांत और हड्डियां कमजोर होती हैं. अगर हर तीन महीने पर उन्हें कैल्शियम की एक खुराक दी जाए तो उनके लिए बेहतर होगा. '' वे याद दिलाती हैं कि चीता ही एकमात्र ऐसा पशु है जिसकी प्रजनन क्षमता को दवा देकर बढ़ाया जा सकता है.

