सड़कें विकास की धमनियां मानी जाती हैं. इसीलिए केंद्र सरकार ने माओवादी हिंसा से जूझ रहे बस्तर को उसके मौजूदा हालात से उबारने के लिए 2009 में वहां सड़कों का जाल बिछाने का लक्ष्य रखा था. वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों के लिए बनी विशेष कार्ययोजना मद के तहत यहां 23 सड़कें तीन साल में तैयार हो जानी थीं. यहां पर पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के कुल 40,000 से ज्यादा जवान तैनात हैं लेकिन वे भी माओवादियों का खौफ कम नहीं कर पाए हैं. यही वजह है कि प्रस्तावित सड़कों में से एक भी सड़क आज तक नहीं बन पाई है.
देश में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित इलाकों के लिए केंद्र सरकार ने एकीकृत कार्ययोजना तैयार की थी, जिसमें प्राथमिकता के तौर पर प्रभावित क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण किया जाना था. संवेदनशील इलाकों में काम में हो रही असुविधा को देखते हुए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत इन सड़कों के लिए अलग से रकम मंजूर की गई थी. प्रभावित इलाकों में खास तरह के जोखिम को देखते हुए ही ठेकेदारों ने वहां चालू दरों से कहीं बढ़ा-चढ़ाकर निविदाएं भरी थीं और सरकार ने इन्हें मंजूर भी कर लिया था. यहां 1,506 करोड़ रु. की लागत से 1,039 किमी लंबी 23 सड़कें बननी थीं.
इससे लगा था कि मुख्य धारा से कटे बस्तर के अंदरूनी इलाकों को दूसरे क्षेत्रों से जोडऩे का सरकार का सपना पूरा हो जाएगा. लेकिन स्वीकृत 23 सड़कों में से अब तक एक का भी काम पूरा नहीं हो पाया है. इनमें से 8 सड़कों के लिए तो ठेकेदार ही नहीं मिले हैं. वहीं, बीजापुर जिले की मोदकपाल-तारलागुड़ा, मरियागुंडम- चिंतलनार और नेलसनार, कोडोली और गंगालूर के बीच तीन सड़कों का काम इसलिए निरस्त करना पड़ा पड़ा क्योंकि 215 करोड़ रु. में इसका ठेका लेने वाली मुंबई की मेसर्स नीरज सीमेंट स्ट्रक्चरल लिमिटेड काम शुरू ही नहीं कर पाई. बाकी की सड़कों का काम कछुआ चाल से चल रहा है.
सड़क निर्माण का पहला चरण तो पूरा होने का नाम नहीं ले रहा है. दूसरी ओर, लोक निर्माण विभाग ने दूसरे चरण के लिए उन क्षेत्रों का चयन कर लिया है, जहां आसानी से और तय समय सीमा में काम को पूरा किया जा सके. विभाग के मुख्य अभियंता ए.के. मंधान कहते हैं, ‘‘दूसरे चरण के लिए नए सिरे से सड़कों का चयन कर केंद्र सरकार को मंजूरी के लिए भेजा है. सड़कों की लंबाई 448 किमी और निर्माण की लागत 800 करोड़ रु. होगी.’’ इसमें सबसे ज्यादा पांच सड़कें बस्तर जिले में जबकि नारायणपुर-कोंडागांव में तीन, सुकमा में दो और दंतेवाड़ा, बीजापुर और कांकेर में एक-एक सड़क प्रस्तावित है. इस योजना में सुकमा-दंतेवाड़ा के बीच करीब 69 किमी राज्य राजमार्ग का निर्माण भी नए सिरे से किया जाना है.
सड़क निर्माण के लिए ठेकेदार नहीं मिलने की वजह माओवादियों के उत्पात के अलावा प्रशासन की उदासीनता भी है. दरअसल माओवाद प्रभावित इलाकों में सड़क निर्माण में लगे वाहनों और मशीनों में तोडफ़ोड़ और आगजनी का जोखिम हमेशा बना रहता है. वजह: माओवादी विकास कार्यों को अंजाम तक पहुंचने नहीं देना चाहते हैं. लेकिन ऐसे मामलों में नुकसान की एवज में प्रशासन की ओर से बेहद मामूली मुआवजा दिया जाता है.
ताजा मामला कटेकल्याण-दंतेवाड़ा रोड निर्माण का है. इसी साल 5 फरवरी को पोंदुम के करीब माओवादियों ने हमला कर सड़क निर्माण में लगी दो टिप्पर, वायब्रो रोलर को आग के हवाले कर दिया. पोकलेन मशीन को भी नुकसान पहुंचा. इससे ठेकेदार को करीब 40 लाख रु. का नुकसान हुआ लेकिन इसकीएवज में प्रशासन ने महज डेढ़ लाख रु. की मुआवजा राशि मंजूर की. एक ठेकेदार कहते हैं, ‘‘वाहनों और मशीनों का पर्याप्त बीमा कवर होने पर या प्रशासन की गारंटी पर ही काम करने का जोखिम उठाया जा सकता है, लेकिन ऐसे मामलों में प्रशासन में इच्छाशक्ति की कमी नजर आती है.’’
ठेकेदारों की एक दिक्कत यह भी है कि उन्हें काम स्थानीय श्रमिकों से ही लेना होता है, जो पुलिस की सुरक्षा में काम नहीं करना चाहते. इसलिए जोखिम होने के बावजूद ठेकदार सुरक्षा नहीं लेते. इससे भी माओवादी वारदातें बढ़ रही हैं. बीजापुर के पुलिस अधीक्षक प्रशांत अग्रवाल कहते हैं, ‘‘हर निर्माण कार्य के लिए ठेकेदार के कहने पर सुरक्षा दी जाती है.’’ लेकिन मंधान के मुताबिक पुलिस सुरक्षा मुहैया करवाए जाने के बावजूद ठेकेदार काम शुरू नहीं करते हैं.

