कहावत है कि जहां चाह, वहां राह. बस्तर के आदिवासियों ने इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है. दर्जन भर आदिवासियों की ‘धरोहर’ नाम की एक समिति है. इसने संसाधनों के नितांत अभाव के बावजूद धान की विलुप्त हो रही 261 प्रजातियों का पारंपरिक जैविक तरीके से संरक्षण और संवर्धन कर एक मिसाल पेश की है. यह सब बिना किसी सरकारी मदद के हुआ है. धरोहर के प्रयासों से प्रभावित नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (एनबीपीजीआर) ने भी अध्ययन के लिए धान की 35 किस्मों के बीज मंगवाए हैं.
बस्तर में कोंडागांव से 20 किमी दूर 1,600 की आबादी वाले भतरा और मुरिया जनजाति बहुल गोलावंड गांव के आदिवासी पिछले 18 साल से धान की लुप्त हो रही किस्मों को बचाने की कोशिश में जुटे हुए हैं. धान की पारंपरिक प्रजातियों के संरक्षण का खयाल उन्हें 1995 में आया, जब कोंडागांव में हस्तशिल्प का काम करने वाले गांव के कुछ लोगों की मुलाकात मुंबई के एनजीओ सरल से जुड़े मुनीर अल्वी से हुई. आदिवासियों ने उन्हीं की प्रेरणा से इस काम को समर्पित धरोहर नाम से समिति बनाई.
समिति के सदस्य इलाकों में घूम-घूमकर विलुप्त हो रही धान की प्रजातियों का पता लगाकर उनके बीजों का संकलन करते हैं. धरोहर के अध्यक्ष रामूराम बघेल बताते हैं, ‘‘शुरुआत में दूरदराज के गांवों में जादू-टोने के शक में आदिवासी हमें धान के बीज देने को तैयार नहीं होते थे.’’ बीजों की शुद्धता को बनाए रखने के लिए भी समिति के सदस्यों को खासी मेहनत करनी पड़ती है. फसल पूरी तरह से जैविक तरीके से ही ली जाती है.
समिति के सदस्य अपने खेत के रकबे के हिसाब से बीज लेते हैं और खलिहान में फसल आने के बाद बीजों को उतनी ही मात्रा में समिति को लौटा देते हैं. इस सिलसिले और हिसाब को बरकरार रखने के लिए हर सदस्य का खाता बना हुआ है. अनपढ़ होने के बावजूद विलुप्त प्रजातियों को बचाने की आदिवासियों की कोशिश देख खुद कृषि वैज्ञानिक भी हैरान हैं. कृषि वैज्ञानिक डॉ. आदिकांत प्रधान कहते हैं, ‘‘धान की किस्मों के संरक्षण का धरोहर का तौर-तरीका पारंपरिक और पूरी तरह से वैज्ञानिक है. बीजों की शुद्धता बनाए रखना इनकी खासियत है.’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘धान की पुरानी प्रजातियों में भले ही पैदावार कम होती थी लेकिन इनकी प्रतिरोध क्षमता आधुनिक किस्मों से कहीं अधिक थी. इनकी फसल के लिए ज्यादा पानी की जरूरत भी नहीं पड़ती.’’
धान की पारंपरिक प्रजातियों के लुप्त होने की वजह बताते हुए धरोहर के सचिव शिवनाथ कहते हैं, ‘‘बस्तर के आदिवासी खर्री बुआई यानी बारिश से पहले खेत जोतकर बीज छिड़क देते हैं. इस तरीके से फसल लेने पर हर तीन साल में धान की किस्म बदलनी पड़ती है. यही वजह है कि नई किस्मों के फेर में देसी प्रजाति के बीज गायब होते जा रहे हैं.’’
धरोहर ने लोकटीमेछि, बांडीलुचई, तुरयालुचई, बासाभोग और बांसपत्ती समेत अब तक धान की 261 लुप्तप्राय किस्मों का संरक्षण किया है. इस दौरान समिति को पूसबांडा, आलचा, सारसमुंडी, बेनियार कुकड़ी और बेनीसार जैसी पांच नई किस्मों का पता भी चला है, जिनके बीजों की तलाश अबूझमाड़ और ओडिसा सीमा से सटे इलाकों में की जा रही है.
धरोहर जैव विविधता पंजी तैयार करवा रही है, जिसमें जंगलों में मिलने वाली वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों से संबंधित तमाम जानकारियां दर्ज की जाती हैं. समिति घोड़ागांव, खजगांव, हीरामांदला समेत 10 गांवों के किसानों को श्री (सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन) पद्धति से धान की फसल लेने के गुर भी सिखा रही है.
इस समिति को उसकी ईमानदार कोशिशों के चलते छत्तीसगढ़ सरकार का संत गहिरा गुरु महाराजा पर्यावरण पुरस्कार मिल चुका है. राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद ने भी उसके प्रयासों की सराहना की है. शहीद गुंडाधूर कृषि महाविद्यालय और अनुसंधान केंद्र के डीन डॉ. एस.सी. मुखर्जी कहते हैं, ‘‘धरोहर की कोशिशों का भविष्य में बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा.’’ वाकई धरोहर सहेजने की ये कोशिशें जरूर रंग लाएंगी.

