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झारखंड: आजसू की महिला पंचायत में जुटी भीड़

झारखंड में आजसू नेता नीतीश के मंत्र पर काम कर महिला वोट बैंक को रिझाने की कोशिशों में जुटे.

अपडेटेड 9 अप्रैल , 2013

झारखंड अपने पड़ोसी राज्य बिहार से सबक ले रहा है. नीतीश कुमार ने बिहार की आधी आबादी के बीच ऐसा काम किया कि जातिगत समीकरणों की राजनीति में उन्होंने एक जाति निरपेक्ष मतदाता समूह खड़ा कर डाला. ममता बनर्जी ने राजनैतिक रणनीति के बतौर पश्चिम बंगाल में मानुष के साथ मा और माटी को जोड़कर जो चुनावी नारा गढ़ा, उसने महिला मतदाताओं में उन्हें कामयाबी दिलाई.

साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर झारखंड के पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुदेश महतो ने अपने दोनों पड़ोसी राज्यों से महिला केंद्रित चुनावी रणनीति को उधार लेते हुए अपनी ऐसी मिश्रित रणनीति बनाई है जिसका उद्देश्य झारखंड में महिला मतदाताओं को सत्ता के एक केंद्र में रूप में उभारना है.

झारखंड इत्तेफाक से अपनी स्थापना के दिन 15 नवंबर, 2000 के बाद से ही लगातार राजनैतिक रूप से अस्थिर रहा है और इस दौरान आई आठ सरकारों में से किसी ने भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया. इस पृष्ठभूमि में अपने समर्थकों के बीच दादा कहे जाने वाले झारखंडी युवाओं के चेहरे सुदेश महतो ने अपना ध्यान महिलाओं की तरफ मोड़ दिया है.

सुदेश महतो की आजसू पार्टी ने पिछले रविवार को एक महिला पंचायत रखी, जिसे महिलाओं की आज तक की सबसे बड़ी रैली कहा जा रहा है. रांची के मोराबादी मैदान में राज्य भर से बड़ी संख्या में आई महिलाएं इस रैली में शामिल हुईं. सुदेश की महिला केंद्रित राजनैतिक रणनीति की भले यह पहली झलक रही हो, लेकिन वे लंबे समय से इस पर काम कर रहे हैं. अर्जुन मुंडा की कैबिनेट में उप-मुख्यमंत्री के बतौर सुदेश की कई जिम्मेदारियां थीं. उन्होंने अपने जिम्मे हर विभाग का इस्तेमाल महिला मतदाताओं को खुद से जोडऩे के लिए किया. पंचायती राज मंत्री रहते हुए उन्होंने पंचायती राज संस्थानों में 50 फीसदी महिला आरक्षण लागू करवाया.

ग्रामीण विकास मंत्रालय का पद उनके काफी काम आया. उन्होंने महिलाओं के सैकड़ों स्व-सहायता समूह गठित करने में मदद दी, उन्हें विभागीय परियोजनाए सौंपीं और इस तरह इन समूहों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया. खेल मंत्री रहते हुए सुदेश ने झारखंड के गांवों में महिलाओं के खेलों को आर्थिक प्रोत्साहन दिया.

गरीबी-बदहाली की राजनीति करते हुए और ममता बनर्जी से शब्द उधार लेते हुए महतो ने अपने संघर्ष को ‘‘मां और माटी’’ के लिए बताया. मोराबादी मैदान में जुटी महिलाओं की भारी भीड़ के बीच उन्होंने कहा कि कोई दूसरा उन्हें तभी ताकत दे सकता है यदि खुद वे तय कर लें कि उन्हें अपनी जिंदगी बदलनी है. सुदेश ने कहा, ‘‘यह चौंकाने वाली बात है कि हमारी महिलाएं दूसरे राज्यों में पलायन कर घरों में काम कर रही हैं. हमें शिक्षा और सम्मानजनक काम दिलाकर महिलाओं को सशक्त करना होगा और पलायन रोकना होगा.’’

झारखंड की राजनीति में अपनी अलग राह बनाने की कोशिश में लगे सुदेश महतो का बड़ा असर होने वाला है. जेवीएम के बाबूलाल मरांडी को छोड़ दें तो अकेले सुदेश ही मौजूदा राजनैतिक गतिरोध से साफ-सुथरे बाहर आ पाए हैं क्योंकि दोनों ने ही इस साल जनवरी में अर्जुन मुंडा की सरकार गिरने के बाद वैकल्पिक सरकार बनाने के लिए कांग्रेस और जेएमएम के साथ गठजोड़ करने से इनकार कर दिया था. दरअसल, महतो यदि अपने 6 विधायकों के साथ नई सरकार को समर्थन दे देते, तो जेएमएम बड़ी आसानी से कांग्रेस (13) और आरजेडी (5) के साथ मिलकर 82 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में अपने 18 विधायकों के साथ बहुमत में आ जाती.

ऐसा पहली बार नहीं है कि सुदेश ने झारखंड में गठबंधन सरकार को समर्थन देने की बजाए विपक्ष में बैठना मंजूर किया है. झारखंड की राजनीति के पथरीले रास्ते पर चलते हुए सुदेश महतो ने इससे पहले भी मधु कोड़ा और शिबू सोरेन की सरकारों को समर्थन न देकर अपनी अलग विश्वसनीयता कायम की है. आजसू प्रमुख के सामने हालांकि समस्याएं भी बहुत हैं. लेकिन इस हालात में सियासी जमीन मजबूत करने का उनके लिए सबसे सटीक मौका भी है.

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