वह जून, 2011 की एक तपती दोपहरी थी, जब 18 साल की लक्ष्मी अपने घर के आंगन में चूल्हा जलाए रोटियां सेंक रही थी. तभी किवाड़ खटखटाने की अवाज सुनाई दी. जैसी कि लक्ष्मी की हमेशा आदत थी, वह चूल्हा जलता छोड़ दरवाजे की ओर लपकी. द्वार पर चार अजनबी चेहरे थे, जिन्हें वह पहली बार देख रही थी.
इससे पहले कि वह पूछती कि 'कौन हो, किससे मिलना है'. पीछे से लक्ष्मी की मां नमूदार हुईं और झटके से उसकी ओढऩी चेहरे पर खींच दी, 'अंदर जा, तेरे सासरे वाले आए हैं.' उस दिन लक्ष्मी को पहली बार पता चला कि वह शादीशुदा है. बचपन में जब नानी के गुजरने पर वह ननिहाल गई थी, तभी मामा ने वहीं एक साल की लक्ष्मी का ब्याह करवा दिया था. गोदी में उठाकर फेरे लगवाए और इस तरह उसकी पूरी जिंदगी दो साल के राकेश नाम के एक लड़के के संग सात फेरों में बांध दी.
लेकिन लक्ष्मी ने समाज द्वारा तय की गई उस जिंदगी को सिर झुकाकर मानने से इनकार कर दिया और अपने परिवार के फैसले के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. अब वह हिंदुस्तान की पहली ऐसी लड़की बन गई है, जिसके बाल-विवाह को बाकायदा कोर्ट ने बाल विवाह निषेध अधिनियम, 1929 के तहत रद्द करार दिया है.
राजस्थान में जोधपुर जिला मुख्यालय से तकरीबन 40 किमी दूर स्थित गांव लोणी में रहने वाली अनुसूचित जनजाति की इस लड़की और एक दिहाड़ी मजूदर की बेटी से किसी ने ऐसी उम्मीद नहीं की थी. घरवालों ने सोचा भी नहीं था कि तीखी आंखों वाली साधारण-सी दिखने वाली यह लड़की सात फेरों और माथे के सिंदूर को चुनौती भी दे सकती है. लक्ष्मी के पिता 50 वर्षीय तेजाराम उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, 'पूरे दिन बावली बने फिरे थी. रो-रोकर बुरा हाल हो गया.' लक्ष्मी ने फरमान सुना दिया, 'मुझे नहीं जाना ससुराल. मैं नहीं मानती इस शादी को. मैं उस लड़के को जानती नहीं.'
यह बहुत बड़ा फैसला था. गांव की 90 फीसदी लड़कियों को गोदी में बिठाकर ही फेरे लगाए गए थे. लक्ष्मी की मां 45 वर्षीया सुक्खी देवी अपना हवाला देतीं, 'मेरा ब्याह भी ऐसे ही हुआ था. तेरी बहन का भी ऐसे ही हुआ. सबका ऐसे होता है. क्यों नहीं जाएगी ससुराल.' लेकिन मजाल कि लक्ष्मी टस से मस हो. लक्ष्मी के चाचा 45 वर्षीय ताराराम कहते हैं, 'लक्ष्मी बचपन से ही बहुत तेज-तर्रार थी. कोई चीज ठान ले तो ठान ले. कोई जबरदस्ती नहीं कर सकता.'
लक्ष्मी के जीजा 25 वर्षीय भादाराम आगे का किस्सा सुनाते हैं, 'लक्ष्मी घर पर लड़ती रही, गुस्से में भूखी सोती रही और ससुराल वालों के चक्कर पर चक्कर लगते रहे. लेकिन तभी हमें पता चला कि राकेश का चाल-चलन भी ठीक नहीं है. वह कुछ कमाता नहीं, शराब पीता है और बुरी संगत में रहता है.' इससे पहले कि घरवाले कुछ और समझ पाते, पुलिस उनके घर पहुंच गई. तेजाराम कहते हैं, 'हम गरीब लोग हैं. कोरट-कचहरी, पुलिस-थाना हम क्या जानें.'
घरवाले लक्ष्मी का साथ देना चाहते थे, लेकिन पुलिस और कचहरी के नाम से वे भी डर गए. फिर थाने में पेशी हुई. पुलिस ने सुलह कराने की कोशिश की. लक्ष्मी को डराया-धमकाया भी, लेकिन उसका फैसला नहीं बदला. राकेश का परिवार अपेक्षाकृत धनी था. उसके पिता ताराचंद ठेकेदारी करते थे. एक दिन वे बुलेरो गाड़ी में दो-चार लठैत लेकर लोणी पहुंच गए. उस दिन भी लक्ष्मी उसी आंगन में रोटियां सेंक रही थी और दरवाजा भी उसी ने खोला था. फिर पूरे गांव की पंचायत बैठी. अब क्या किया जाए. लड़की मर जाने को तैयार है, लेकिन ससुराल जाने को नहीं.
लेकिन तभी गांव के एक अखबार वाले ने एक कागज पर लिखकर अनपढ़ लक्ष्मी को एक पता दिया. यह पता था जोधपुर के सारथी ट्रस्ट का, जिसकी संचालक कृति भारती की मदद से आखिरकार लक्ष्मी न्यायालय तक पहुंच पाई और कोर्ट ने अपने फैसले में उसके बाल विवाह को रद्द करार दिया. भारती कहती हैं, 'लक्ष्मी जब मेरे पास आई तो बहुत डरी हुई थी. उसे ससुराल ले जाने के लिए राकेश के घरवालों ने पुलिस से लेकर गुंडों तक का सहारा लिया. लेकिन यह उस लड़की की हिम्मत ही थी कि वह उनके आगे झुकी नहीं.' राकेश शुरू में इस फैसले को मानने के लिए तैयार नहीं था, लेकिन ट्रस्ट द्वारा काउंसिलिंग किए जाने के बाद आखिरकार नोटरी के सामने वह उस एफिडेविट पर साइन करने के लिए राजी हो गया, जिसके मुताबिक एक साल की उम्र में हुए बाल विवाह को रद्द करार दिया गया. यह घटना 24 अप्रैल, 2012 की है.
कोर्ट के फैसले के तकरीबन एक साल बाद अब लक्ष्मी ने दोबारा ब्याह किया है अपनी पसंद के लड़के से. जोधपुर से 30 किमी दूर स्थित गांव रोहट निवासी महेंद्र सरगारा से लक्ष्मी की पहली मुलाकात अपने पड़ोसी के घर में हुई थी. दोनों ने एक-दूसरे को देखा, प्रेम में पड़ गए और अब शादी के बाद लक्ष्मी अपनी नई ससुराल में बहुत खुश है.
महेंद्र दिहाड़ी मजदूर है, लेकिन लक्ष्मी से काम नहीं करवाना चाहता. वह कहता है, 'मैं लक्ष्मी से प्यार करता हूं और अपनी मेहनत से उसे हर तरह खुश रखना चाहता हूं.' लक्ष्मी भी सिर्फ हिम्मत ही नहीं, बल्कि आत्मसम्मान से छलकती हुई स्त्री है. उसका घर टूटा झोंपड़ा है तो क्या हुआ, उसके पिता और पति दिहाड़ी मजदूर हैं तो क्या हुआ, उसे बरदाश्त नहीं कि कोई उसे कमतर समझे या दबाए. कोई जर्नलिस्ट अगर झाडू लगाते हुए उसकी तस्वीर खींचना चाहता है तो वह बिदक जाती है. 'हम नहीं लगाएंगे झाडू, हमको नहीं खिंचवानी फोटो.'
राजस्थान में बाल विवाह एक गंभीर समस्या है. गैर-कानूनी होने और राज्य सरकार द्वारा तमाम कोशिशों के बावजूद यह पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है. 1992 का चर्चित भंवरी देवी केस हमारे सामने है, जिन्हें अपने गांव में हो रहे बाल विवाह को रोकने के जुर्म में ऊंची जाति के लोगों के सामूहिक बलात्कार का शिकार होना पड़ा था. लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि अब शिक्षा से स्थिति में थोड़ा सुधार आया है. तभी तो लोणी और रोहट से लेकर पूरे राजस्थान में बाल विवाह की शिकार और फिर अनचाहे पति के साथ जीवन बिताने को मजबूर लड़कियों के लिए लक्ष्मी एक मिसाल बन गई है.
रोहट की सरपंच 25 वर्षीया विमला पटेल कहती हैं, 'लक्ष्मी हमारे गांव की लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत है. लक्ष्मी को देखकर कई लड़कियां ससुराल जाने से इनकार कर रही हैं.' खुद लक्ष्मी के परिवार को भी इस घटना से सबक मिला है. ताराराम कहते हैं, 'हमें समझ में आ गया है कि बाल विवाह कितना गलत है. अब हम अपने किसी बच्चे की बचपन में शादी नहीं करेंगे.' राजस्थान की महिला एवं बाल विकास मंत्री बीना काक भी अभिभूत हैं. वे कहती हैं, 'लक्ष्मी से राजस्थान की बहुत सारी लड़कियों को प्रेरणा मिलेगी. वह बहादुरी की मिसाल है.'
लक्ष्मी से प्रेरित होकर 23 फरवरी को जोधपुर की दो लड़कियों 18 वर्षीया तरुणा और 15 वर्षीया भारती ने भी अपना बाल विवाह निरस्त करवाने के लिए याचिका दायर की है. भारती कहती हैं, 'हमारे पास आने वाली ऐसी लड़कियों की संख्या बढ़ गई है, जो अपने बाल विवाह को रद्द करवाना चाहती हैं.' मनो-चिकित्सक सुधीर कक्कड़ हंसते हुए कहते हैं, 'परंपरावादी लोग कहेंगे कि यह सब लड़कियों को पढ़ाने का नतीजा है. चार अक्षर पढ़कर चुनौती देने लगी हैं. लेकिन यही सच है. कानून बनाकर बाल विवाह को नहीं रोका जा सकता, लेकिन लड़कियों को शिक्षा देकर उसे रद्द जरूर करवाया जा सकता है.'

