चालीस बाइ अस्सी वर्ग फुट के बड़े से कमरे के बीचोबीच एक दूसरे से सटीं काले रंग की कोई बीस अलमारियां करीने से रखी हैं. इनके बीच में लगे मॉनीटर पर अगर एक वैज्ञानिक आंकड़े न जांच रहा हो तो यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि आप दुनिया के सर्वोत्तम सुपर कंप्यूटरों में से एक के सामने खड़े हैं. और कंप्यूटर भी ऐसा जिसके आने के बाद भारत में मौसम का पूर्वानुमान जताने की दुनिया ही बदल गई. इस फरवरी में मौसम की जो सटीक भविष्यवाणी आपको सुनने को मिली, उसके पीछे नोएडा के नेशनल सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्टिंग (एनसीएमआरडब्ल्यूएफ) के इस सुपर कंप्यूटर, नए मौसम पूर्वानुमान मॉडल और उपकरणों की एक पूरी श्रृंखला का योगदान है.
पूर्वानुमान की सटीकता के सवाल पर सेंटर की निदेशक डॉ. स्वाति बसु ने कहा, “मानसून की तुलना में सर्दियों के मौसम का पूर्वानुमान करना आसान होता है. इसके अलावा सेंटर द्वारा तैयार किए गए नए मॉडल टी574एल64 की भी खास भूमिका रही.” मौसम विज्ञान की भाषा में मॉडल गणितीय समीकरणों का एक खास और उन्नत प्रारूप है, जिसमें तापमान, दबाव, हवा की गति और आद्र्रता (उमस) जैसे फैक्टर मुख्य रूप से शामिल होते हैं. केंद्र ने यह मॉडल 2010 के अंत में भारतीय मौसम विभाग को सौंपा.
मॉडल की खासियत यह है कि यह 23-23 किमी के क्षेत्रफल को अपनी जांच का न्यूनतम दायरा मानता है, जबकि पुराने मॉडल में यही दायरा 35-35 किमी का होता था. यानी यह मॉडल वायुमंडल को ढाई गुना ज्यादा सटीकता से व्यक्त कर सकता है. इस स्वदेशी मॉडल की तुलना यूरोपीय सेंटर के मौजूदा मॉडल और अमेरिका के एनसीईपी के आधुनिकतम मॉडलों से की जाती है. “लेकिन सिर्फ अत्याधुनिक मॉडल बनाना काफी नहीं है, इसके साथ ही ऐसे सुपर कंप्यूटर की जरूरत होती है जो बारीक आंकड़ों के विपुल भंडार की बहुत तेजी से गणना कर सके.”
सेंटर में कंप्यूटर और नेटवर्क डिवीजन के प्रमुख बालकृष्ण अथीयमान ने आबीएम पी 6 बेस्ड सुपर कंप्यूटर पर काम करते हुए यह बात कही. उन्होंने बताया कि किस तरह 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय भारत का पहला सुपर कंप्यूटर इस केंद्र में आया था और तब से मौसम विज्ञान में आदमी से ज्यादा कंप्यूटर का दखल बढ़ता चला गया.
तो क्या सिर्फ अत्याधुनिक सुपर कंप्यूटर और मॉडल ही सटीक पूर्वानुमान के लिए काफी है? इस सवाल का जवाब भारतीय मौसम विभाग के महानिदेशक एल.एस. राठौर ने दिया, “नहीं, जब तक आपके पास सटीक इनीशियल ऑब्जर्वेशन नहीं होगा, तब तक अच्छे से अच्छा मॉडल भी कामयाब नहीं हो सकता.” बल्कि मॉडल और सुपर कंप्यूटर की जुगलबंदी इनपुट में मौजूद कमी को कई गुना बढ़ा कर पेश कर देगी. दरअसल, मौसम की भविष्यवाणी का मूल आधार है तापमान, उमस, हवा की गति और वायुमंडलीय दबाव के सटीक और अधिक से अधिक क्षेत्रफल में फैले ऐसे आंकड़े, जो जल्दी से जल्दी मुहैया हो जाएं.
2007 से पहले जहां देश में सिर्फ 400 ऑब्जर्वेशन सेंटर थे, वहीं 2012 तक इनके अलावा 675 नए ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन और 1,000 नए ऑटोमैटिक रेन गेज स्थापित किए गए. राठौर इसे सटीक आंकड़े जुटाने में उल्लेखनीय कदम मानते हैं. इन उपकरणों के साथ ही मौसम विभाग कृत्रिम उपग्रह, डॉप्लर वेदर रडार, समुद्र में स्थापित स्टेशनों से भी लगातार आंकड़े हासिल करता है. मौसम के पूर्वानुमान को और सटीक बनाने के लिए भारतीय मॉडल के साथ ही यूरोप, अमेरिका, ब्रिटेन के मौसम विभाग और जापान मौसम एजेंसी के मॉडल के निष्कर्षों को भी सामने रखा जाता है. राठौर ने कहा, “इनमें से जिस मॉडल के नतीजे ज्यादा सटीक होते हैं, उसके आधार पर ही मौसम का पूर्वानुमान व्यक्त किया जाता है.”
मौसम के पूर्वानुमान को औैर सटीक बनाने के लिए 23 किमी वाले मॉडल के आधार पर ही 9 किमी वाले एक और मॉडल को भी विकसित किया गया है. बड़ा मॉडल जहां पूरे भूमंडल पर लागू होता है, वहीं 9 किमी आधार वाला मॉडल भारत औैर आसपास के इलाके के लिए सटीक भविष्यवाणियां कर रहा है. दिल्ली शहर के लिए खास तौर पर 5 किमी आधार वाला मॉडल बनाया गया है. यह मॉडल हर छह घंटे के लिए पूर्वानुमान जताने में सक्षम है. मौसम विभाग की वेबसाइट पर आप दिल्ली के अलग-अलग इलाकों के लिए जो पूर्वानुमान देखते हैं, उसके पीछे यही नया मॉडल काम कर रहा है.
अपनी इस हालिया कामयाबी के बावजूद मौसम विभाग की आगे की राह आसान नहीं है. मौसम विज्ञानी इस बात को मानने में नहीं हिचकते कि मॉनसून के लिए सटीक भविष्यवाणी अब भी बड़ी चुनौती है. दरअसल, मॉनसून के समय जमीन के अलग-अलग इलाकों का तापमान बरसात में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इसमें धरती से नीचे से ऊपर की ओर लंबवत (वर्टिकल प्रोफाइल) ताप वितरण के सटीक आंकड़ों की जरूरत होती है, इस मामले में सटीक आंकड़े जुटाने में अब भी वैज्ञानिकों का हाथ तंग है.
वैसे वैज्ञानिकों को इस साल के मध्य में इसरो द्वारा छोड़े जाने वाले उपग्रह इनसैट 3-डी से बड़ी उम्मीदें हैं. उपग्रह में छह चैनलों वाला इमेजर और 19 चैनलों वाला साउंडर लगा होगा. यह उपग्रह दृश्य प्रकाश तरंग दैध्र्य बैंड में 1 किमी का रिजोल्यूशन, इन्फ्रारेड बैंड में 4 किमी का रिजोल्यूशन और वाटर वैपर चैनल में 8 किमी का रिजोल्यूशन देगा. इसके अलावा वातावरण के वर्टिकल प्रोफाइल में ताप वितरण को भी यह ज्यादा बेहतर तरह से माप सकेगा.
मौसम विभाग ने इससे मिलने वाले आंकड़ों के उपयोग के लिए पहले से ही अपने दिल्ली दफ्तर में नया अर्थ स्टेशन तैयार कर लिया है. उधर, एनसीएमआरडब्ल्यूएफ के वैज्ञानिक इस साल अगस्त में नए सुपर कंप्यूटर की आमद का इंतजार कर रहे हैं. यह कंप्यूटर उनके नए अत्याधुनिक मॉडल का एनालिसिस करने में सक्षम होगा. वरिष्ठ वैज्ञानिक आशीष कुमार मित्रा ने कहा, “नए मॉडल का आधार 14-14 किमी होगा और यह वर्टिकल प्रोफाइल में वायुमंडल को 64 की बजाए 90 सतहों में बांटेगा.” उनके मुताबिक नई प्रणाली पांच गुना ज्यादा कारगर होगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसके नतीजे भी पांच गुना बेहतर होंगे. हो सकता है, इससे 10 फीसदी ही सही, पर बेहतर नतीजे मिलें.
यानी मौसम की भविष्यवाणी सुनने वालों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए वैज्ञानिकों को अभी लंबा सफर तय करना है. फरवरी भले ही उम्मीदों से बेहतर गुजरी हो लेकिन, उनकी अगली परीक्षा लेने के लिए मानसून का अगला मौसम इंतजार कर रहा है.

