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उत्तर प्रदेश: पानी में अस्तित्व की लड़ाई

सैकड़ों महिलाओं, पुरुषों, बूढ़ों और बच्चों ने शारदा नदी के तेज बहाव में खड़े होकर सरकार को आखिरकार अपनी मांगें मानने और उसके कटाव को रोकने के लिए गंभीर कदम उठाने को मजबूर किया.

अपडेटेड 12 मार्च , 2013

शारदा नदी की तेज कटान ने उनके जीवन से सुख-चैन की डोर काट दी.उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने घर-गृहस्थी को पानी में समाते देखा. पक्के मकानों में रहने वालों को फूस की झेंपड़ी नसीब हुई.

प्राकृतिक आपदा ने पीड़ा पहुंचाई तो जनप्रतिनिधियों, शासन और प्रशासन की झूठी दिलासाओं ने पूरी तरह तोड़कर रख दिया. पीड़ा ने जब सारी सीमाएं तोड़ दीं तो सैकड़ों की तादाद में लोग नदी में उतर गए और शुरू हुआ एक सत्याग्रह, जिसमें महिलाएं, पुरुष और बूढ़े ही नहीं, बल्कि बच्चे भी शामिल थे, जो सीने तक पानी में डूबे अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे थे. मन में दबी पीड़ा मुंह से नारों के रूप में बाहर निकल पड़ी— मेरा किसी से बैर नहीं, जो घर कटे तो खैर नहीं/ हम अपना अधिकार मांगते, नहीं किसी से भीख मांगते.

यह दर्द भरी दास्तान यूपी के सीतापुर जिला मुख्यालय से 70 किमी दूर पूर्वोत्तर दिशा में रेउसा ब्लॉक के तीन दर्जन गांवों के उन 892 किसान परिवारों की है, जिनके घर 15 वर्ष के भीतर शारदा नदी की तेज कटान में समा चुके हैं. सीतापुर के राजस्व अभिलेखों के मुताबिक नेपाल से निकलने वाली शारदा नदी 1952 में सीतापुर और लखीमपुर की सीमा के साथ बहती थी. तेज धारा वाली इस नदी ने किस कदर अपने किनारों को काटकर रास्ता बदल लिया है, उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब यह नदी जिस इलाके में बह रही है, वह सीतापुर-लखीमपुर की सीमा से सात किमी दूर है.

इस नदी की कटान की समस्या ने पहली बार वर्ष 2000 में खतरनाक रूप धारण किया, जब इसमें भारी बाढ़ आई. इस कटान ने मिटरिया, असईपुर, काशीपुर, बैरागीपुर, रतनगंज, मूसेपुर, रायपुर, भम्भरपुर और शेखूपुर गांवों के अस्तित्व को ही मिटा दिया. इन गांवों में रहने वाले साढ़े छह सौ से ज्यादा किसान परिवार अचानक बेघर हो गए. उनका मकान, खेत सब कुछ नदी में समा गया.

इन्हीं किसानों में एक असईपुर के रहने वाले 45 वर्षीय गिरीश गुप्ता भी हैं, जिनकी 15 बीघा जमीन और पक्का मकान सन् 2000 में नदी की कटान में समा गए. अब भिठौली कस्बे से काशीपुर जाने वाले 10 किमी लंबे मार्ग के किनारे फूस की टूटी झोंपड़ी में पत्नी, 9 और 12 साल की दो बेटियों और 15 साल के बेटे के साथ रह रहे गिरीश के पास अपने इलाज के लिए भी पैसे नहीं हैं. बेटा ठेले पर बिस्कुट और टॉफी बेचकर परिवार का खर्च चलाता है.

इस मार्ग पर दोनों तरफ सटी हुई फूस की झेंपडिय़ों में इस समय गिरीश ही नहीं, करीब 800 परिवार विस्थापितों की तरह से जीवन बिता रहे हैं. असईपुर के शिवबरनलाल कहते हैं, ''गांव के नष्ट हो जाने के चलते किसान परिवारों की पहचान ही समाप्त हो गई है. इनके पास न तो राशनकार्ड है और न ही पहचान से जुड़ा कोई और दस्तावेज. नतीजतन अचानक बेहद गरीब हो चुके इन किसान परिवारों को 13 वषों से किसी भी सरकारी योजना का कोई लाभ नहीं मिला है. ''

गरीबी और लाचारी से तंग आकर काशीपुर गांव के श्यामलाल ने जनवरी 2012 में आत्महत्या कर ली थी. श्यामलाल का छोटा बेटा 17 वर्षीय विष्णु कहता है, ''पिता के गुजर जाने के बाद मुझसे बड़े तीन भाइयों ने एक रिक्शे का इंतजाम किया और बारी-बारी रिक्शा चलाकर घर का खर्च चला रहे हैं. इसी आमदनी से तीनों बहनों का ब्याह भी करना है. '' इस इलाके में श्यामलाल जैसे एक दर्जन लोग 13 वर्षों के दौरान अपनी जीवनलीला को समाप्त कर चुके हैं.

मगर घर-बार से तबाह हो चुके इन किसानों की सुध न तो प्रशासन ने ही ली और न ही सरकार ने. 13 वर्ष के दौरान शारदा में चार बार भीषण बाढ़ आ चुकी है, लेकिन प्रशासन मूकदर्शक बना रहा. 2010 में जब यह नदी एक बार फिर उफान पर आई तो काशीपुर, मल्लापुर, दलजिम पुरवा, प्लाट, बाजपेई पुरवा और चमारनपुरवा गांव नष्ट हो गए. इस बार ढाई सौ से ज्यादा परिवार बेघर हुए, लेकिन तत्कालीन बीएसपी सरकार ने पीडि़तों को मुआवजा देने में वोट बैंक का ही ख्याल रखा. सीतापुर जिला प्रशासन ने आधा दर्जन गांवों में से केवल चमारनपुरवा में रहने वाले दलितों के 60 परिवारों का ही पुनर्वास किया. असईपुर के 28 वर्षीय अरविंद वाजपेयी कहते हैं, ''वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेसी नेता और केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद पीडि़तों से मिले थे और उनके पुनर्वास के लिए प्रयास करने का भरोसा भी जताया था, लेकिन चुनाव बाद कोई जनप्रतिनिधि यहां झांकने भी नहीं आया. ''

शारदा की कटान अब भी जारी है. इस समय इसके किनारे बसे अमईपुर, शेखूपुर, बढ़ईनपुरवा के दो सौ परिवारों को अपने गांव का अस्तित्व समाप्त होने की आंशका सता रही है.

टिहरी प्रोजेक्ट समेत कई प्रोजेक्ट का प्रबंधन संभालने वाले इंजीनियर आर.के. मिश्र कहते हैं कि शारदा के पानी की गति 2 मीटर प्रति सेकेंड और पानी का बहाव 4 लाख क्यूसेक फुट प्रति सेकेंड है. इस हिसाब से यह नदी देश की सबसे तेज बहने वाली नदियों में से एक है. तेज बहाव और पानी की अधिक मात्रा के चलते शारदा नदी अपने किनारों को तेजी से काटती है. मिश्र कहते हैं, ''अब इंजीनियरिंग की ऐसी तकनीकें मौजूद हैं, जिनसे न केवल कटान रोकी जा सकती है बल्कि नदी द्वारा नष्ट की गई भूमि को भी वापस पाया जा सकता है. ''

लेकिन पिछले  13 वर्ष के दौरान प्रशासन को पिछले वर्ष इस समस्या की सुध आई, जब मैगसेसे पुरस्कार विजेता 52 वर्षीय संदीप पांडेय और सीतापुर की सामाजिक कार्यकर्ता 40 वर्षीया रिचा सिंह ने पीडि़त किसानों को एकजुट कर 'कटान रोको संघर्ष समिति' बनाई. पिछले वर्ष जून में 500 किसानों ने सीतापुर से लखनऊ तक पैदल मार्च किया. बात प्रदेश सरकार तक पहुंची तो जिला प्रशासन ने 90 लाख रु. खर्च कर तुरंत नदी के किनारे बालू की बोरियां रखवाईं. लेकिन यह काम भी नदी के किनारे केवल 1,300 मीटर तक ही हुआ, जबकि कटान लंबाई में साढ़े तीन किमी तक तेजी से हो रही है. संदीप पांडेय

कहते हैं, ''पैदल मार्च के बाद से प्रशासन ने जिस तरह सक्रियता दिखाई और कटान रोकने का अस्थायी इंतजाम किया, उससे किसानों को बल मिला कि शांतिपूर्व आंदोलन के जरिए भी मांगें मनवाई जा सकती हैं. ''

लेकिन इसके बाद प्रशासन द्वारा कोई स्थायी इंतजाम न किए जाने पर किसानों ने अपने परिवार समेत शारदा के तेज बहाव में खड़े होकर पिछली 25 फरवरी से जल सत्याग्रह शुरू कर दिया. उनकी मांग केवल इतनी थी कि सरकार नदी की कटान रोकने का स्थायी इंतजाम करे. सत्याग्रह के 48 घंटे बीतते ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 27 फरवरी को आंदोलनकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल से वार्ता कर कटान रोकने की स्थायी व्यवस्था करने के लिए 3.5 करोड़ रु. की एक योजना को मंजूरी दे दी.

एक आंदोलन की सफलता ने दूसरे बड़े आंदोलन की नींव भी डाल दी है. पिछले एक वर्ष से शारदा नदी के कटान के पीडि़तों को आंदोलन के लिए प्रेरित करने वाली समाज सेविका रिचा सिंह कहती हैं, ''अब अगली लड़ाई जमीन और पुनर्वास के लिए होगी. ''

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