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महाराष्ट्र: पवार दुर्ग में शेट्टी की सेंध

जमीन से जुड़कर काम करने वाले नेता राजू शेट्टी ने शरद पवार को इस बार करारा झटका दिया है, जिसके साथ ही पश्चिम महाराष्ट्र के को-ऑपरेटिव संस्थाओं पर एनसीपी की पकड़ ढीली पड़ गई.

शरद पवार
शरद पवार
अपडेटेड 13 मार्च , 2013

महाराष्ट्र के कोऑपरेटिव संस्थाओं पर 40 वर्षों से चला आ रहा शरद पवार का एकछत्र राज अब खतरे में दिखाई दे रहा है. राजू शेट्टी के नेतृत्व में चल रहा स्वाभिमान शेतकारी संगठन (एसएसएस) किसानों का एक संगठन है. इस संगठन ने किसानों को एकजुट कर नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के अध्यक्ष को हिला दिया है और उनके राजनैतिक विरोधी तुरत-फुरत इन शक्तियों के साथ हो गए हैं. राजू शेट्टी हतकांगले से निर्दलीय सांसद हैं.

महाराष्ट्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कपास, चीनी और दूध पर आधारित है. पवार ने 1970 के दशक में सहकारी दूध संघों, सहकारी चीनी, कपड़ा मिलों, जिला बैंकों और महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक (एमएससीबी) को नियंत्रित करके अपना राजनैतिक साम्राज्य खड़ा किया था. एमएससीबी एक बड़ा बैंक है, जो चीनी और अन्य मिलों को कर्ज देता है. अब पहली बार उन पर पवार की पकड़ ढीली पड़ रही है. खासकर पश्चिम महाराष्ट्र के सतारा, पुणे, कोल्हापुर, शोलापुर और सांगली जिलों में.

पवार की इस रणनीतिक पकड़ ने उन्हें महाराष्ट्र के चीनी उद्योग का सर्वेसर्वा बना दिया था. को-ऑपरेटिव चीनी मिल में गन्ना उत्पादक शेयरधारक होते हैं, लेकिन एक अधिकृत प्रबंधन मिल का संचालन करता है. आम तौर पर चीनी मिल का चेयरमैन मिल के आसपास के कम-से-कम दो तालुकों की राजनीति में अपना प्रभाव रखता है. किसानों को पैसा मुहैया कराने वाले जिला बैंक फैसला करते हैं कि किस किसान को कर्ज दिया जाए और कितना पैसा दिया जाए. समय के साथ पवार ने चीनी मिलों और बैंकों में अपने समर्थकों को मुखिया के तौर पर बिठा दिया था और इस तरह ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मजबूत पकड़ बना ली थी.

पवार के साम्राज्य में पहली दरार 2004 में पड़ी. उस साल सफलतापूर्वक विधानसभा चुनाव लडऩे के लिए किसानों से पैसा जमा कर चुके शेट्टी ने गन्ने की दर बढ़ाए जाने की मांग का कार्ड खेलकर किसानों को लुभाना शुरू किया. उन्होंने किसानों से कहा कि मिलें शीरे से शराब बनाकर मोटी कमाई करती हैं, लेकिन उन्हें नाम मात्र का ही पैसा देती हैं.

महाराष्ट्र में गन्ना किसानों का समुदाय एक ताकतवर राजनैतिक समूह है क्योंकि अकेला यह प्रदेश देश की एक-तिहाई चीनी पैदा करता है और 3 करोड़ से भी ज्यादा किसान इस उद्योग पर निर्भर हैं. शेट्टी ने किसानों को गन्ने के लिए ऊंची कीमत दिए जाने की मांग की, जिससे सरकार को मजबूर होकर कीमत 1,700 रु. प्रति टन से बढ़ाकर 2,500 रु. प्रति टन करनी पड़ी. चीनी के बाद शेट्टी ने दूध की ओर रुख किया. यहां भी सरकार को दूध की कीमत 18 रु. प्रति लीटर से बढ़ाकर 20 रु. प्रति लीटर करनी पड़ी. एनसीपी प्रमुख पवार की पकड़ एक बार फिर कुछ ढीली पड़ गई.

सितंबर, 2011 में एमएससीबी के लिए एक प्रशासक के रूप में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की नियुक्ति ने इस बैंक पर से एनसीपी के शासन को समाप्त कर दिया. पार्टी को इसका परिणाम भी भुगतना पड़ा. हालांकि 2012 के ग्राम पंचायत चुनावों में एनसीपी राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन पश्चिमी महाराष्ट्र में शेट्टी की पार्टी ‘स्वाभिमानी पक्ष’ की वजह से उसे काफी सीटें गंवानी पड़ीं.

शेट्टी उसके बाद से पवार के सबसे बड़े दुश्मन बन गए हैं और बीजेपी के गोपीनाथ मुंडे और पवार के चेले रह चुके प्रतापसिंह मोहित-पाटिल जैसे लोग शेट्टी के साथ हो गए हैं. पवार ने 13 नवंबर, 2012 को पुणे में शेट्टी के खिलाफ जातिगत हमला तक शुरू किया. पवार ने कहा, ‘‘वे (शेट्टी) पक्की तैयारी कर रहे हैं कि उनकी बिरादरी के लोगों की चीनी मिलें चलती रहें और दूसरी बिरादरी वालों की चीनी मिलें बंद हो जाएं.” लेकिन शेट्टी अविचलित बने रहे. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, “मेरा अगला निशाना मराठवाड़ा है, जहां अब भी को-ऑपरेटिवों पर पवार का नियंत्रण है.”

संकट का अंदाजा लगाकर पवार ने राज्य में एनसीपी के सात बड़े मंत्रियों से कहा है कि वे 2014 के लोकसभा चुनावों की तैयारी शुरू कर दें. वे खुद तो मैदान में नहीं उतरेंगे, लेकिन पार्टी को मजबूत करने के लिए काम करेंगे. इस लड़ाई में जीत हासिल करने के लिए उन्हें अपने सारे दांव दिखाने होंगे.

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