सात साल में बुंदेलखंड के लोगों ने पहले सूखा देखा, फिर बुंदेलखंड पैकेज की मुनादी सुनी और आजकल वे सरकारी पत्रों की बरसात से दो-चार हो रहे हैं. बुंदेलखंड पैकेज के सभी लाभार्थियों को भेजे जा रहे इन पत्रों में पूछा जा रहा है कि क्या आपको पैकेज में स्वीकृत की गई सुविधा मिल गई है? यदि हां तो आप जान लें कि यह केंद्र सरकार की पहल पर हुआ है और अगर नहीं मिली तो केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री प्रदीप जैन 'आदित्य' से शिकायत करें. यूपीए सरकार के कार्यकाल के साढ़े तीन साल बीतने के बाद अचानक 30,000 चिट्ठियां भेजने के अलावा जैन खुद भी दिल्ली छोड़कर इलाके के गांव-गांव का दौरा करने में व्यस्त हैं.
बुंदेलखंड में कांग्रेस की अचानक बढ़ी इस सक्रियता को राहुल गांधी की टीम की दूरगामी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. राहुल गांधी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले तक इस इलाके में लंबे समय तक सक्रिय रहे और माना जा रहा है कि उपाध्यक्ष के रूप में उनकी नई पारी की एक पिच बुंदेलखंड भी होगी.
बुंदेलखंड में अचानक पत्रों की बाढ़ लाने की वजह के सवाल पर जैन कहते हैं, ''राहुल गांधी की पहल पर ही बुंदेलखंड को 7,400 करोड़ रु. का बुंदेलखंड पैकेज स्वीकृत किया गया था. विभाग का मंत्री होने के नाते मेरी यह जिम्मेदारी है कि मैं यह पता करूं कि लाभार्थियों को वाकई लाभ मिला है या नहीं. और नहीं मिला है तो किस तरह इसे सुनिश्चित कराया जाए. '' पत्रों की यह पहली खेप जैन के संसदीय क्षेत्र वाले झांसी और ललितपुर जिलों में पहुंच रही है. अगले चरण में उत्तर प्रदेश वाले बुंदलेखंड के सभी सात जिलों में इस तरह के पत्र भेजे जाएंगे.
मंत्रालय का इसी तरह का पत्र प्राप्त करने के बाद झंसी की टहरौली तहसील के गुरसरांय ब्लॉक में स्थित भसनेह गांव के किसान परमानंद ने बुंदेलखंड पैकेज में अपने साथ हुर्ई ज्यादती की व्यथा सुनाई. परमानंद का कहना है कि दो साल पहले उनके खेत में बुंदेलखंड पैकेज के तहत एक कुआं खोदे जाने का प्रस्ताव तैयार किया गया था. उस समय कूप निर्माण की लागत 2,86,000 रु. बताई गई थी. लेकिन दो साल बाद भी कूप निर्माण कार्य अधूरा ही पड़ा हुआ है.
परमानंद कहते हैं कि विभागीय अधिकारियों ने इस काम को उनसे ही कराने को कहा था, जिस पर उन्होंने मजदूर लगाकर कुएं की खुदाई कराई. उन्हें सिर्फ काम के एवज में 22,000 रु. का ही भुगतान किया गया, जबकि कुएं की खुदाई में जो खर्च आया उसके एवज में उन्हें अपना खेत साहूकार के यहां 40,000 रु. में गिरवी रखना पड़ा. अब उनका दर्द यह है कि कुआं तो बना नहीं है, साथ ही इस सरकारी सहायता की आस में उनका खेत भी गिरवी रखा गया.
भसनेह गांव के ही नाथूराम ने भी बड़ी आस के साथ खेत पर सरकारी मदद से कुआं खोदे जाने का सपना संजोया था. मजदूरी की आस में नाथूराम ने अन्य मजदूरों के साथ अपने पूरे परिवार के सदस्यों को भी खुदाई के काम में लगाया, लेकिन विभागीय अधिकारियों ने केवल 20,000 रु. का भुगतान कर काम रोक दिया. न कुआं पूरा खोदा गया और न ही मजदूरों की मजदूरी दी गई. उल्टे इस कूप निर्माण से उनके खेत का रकबा कम हो गया सो अलग. गुरसरांय के किसान अच्छेलाल को भी ग्रामीण विकास मंत्रालय से कूप निर्माण की जानकारी को लेकर पत्र भेजा गया है, लेकिन पत्र मिलने के बाद वे सरकार को ही कोस रहे हैं उन्होंने ग्रामीण विकास राज्यमंत्री को मोबाइल पर अपने साथ हुए अन्याय का पूरा दर्द बयान किया.
उन्होंने बताया कि जो कूप खोदा गया वह ढह गया. काम ही पूरा नहीं किया गया था. ढाई लाख के खर्च के एवज में केवल 19,000 रु. का भुगतान हुआ. ललितपुर के जखौरा में भी जिन किसानों के खेतों में कूप निर्माण का काम कराया गया वह साकार ही नहीं हो पाया है. यहां कई कुएं बनने के बाद धराशायी हो गए तो कइयों के भुगतान न होने से उन्हें खोदने वाले मजदूर भुगतान को लेकर दर दर भटक रहे हैं.
इन खामियों का पता लगाने का जिम्मा जैन ने खुद उठाया है या यह कांग्रेस पार्टी और राहुल के निर्देशों के तहत हो रहा है, इस सवाल पर जैन ने कहा, ''निश्चित तौर पर इसके पीछे राहुल गांधी का मार्गदर्शन है. '' जैन ने संकेत दिया कि बुंदेलखंड में एक बार फिर से राहुल की सक्रियता बढ़ सकती है. वैसे 7,400 करोड़ रु. का पैकेज उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की बड़ी तैयारी थी, लेकिन यह चुनावी नतीजों में कामयाब नहीं रहा. हालांकि प्रदेश के बाकी हिस्सों के उलट बुंदेलखंड में कांग्रेस को 19 में से 4 विधानसभा सीटें मिलीं जबकि सपा और बीएसपी को 6-6 सीटें मिलीं थीं. यानी कांग्रेस बहुत पीछे नहीं रही.
सूत्रों की मानें तो कांग्रेस ने बुंदेलखंड से आस नहीं छोड़ी है. जल्द ही पैकेज के तहत 2,000 करोड़ रु. की एक और किस्त बुंदेलखंड के लिए जारी की जा सकती है. पैकेज का क्रियान्वयन देख रही नेशनल रेनफेड एरिया अथॉर्टी (एनआरएए) ने इस आशय का प्रस्ताव योजना आयोग को भेज दिया है. लेकिन सवाल है कि क्या ये नर्ई रकम राहुल की रणनीति को कामयाब बना पाएगी?

