उज्जैन की 25 वर्षीया हेमलता मरमट ने डिप्टी कलेक्टर बनने के लिए कड़ी मेहनत की थी. लेकिन मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की राज्य सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2010 का अगस्त, 2011 में आया नतीजा उनके लिए निराशा लाया. उनका चयन मुख्य परीक्षा के लिए नहीं हुआ था. लेकिन हाल ही में आए एक फैसले ने उनकी उम्मीदों को फिर से पंख लगा दिए. परीक्षा परिणाम की समीक्षा करते हुए दोबारा जो सूची बनाई गई है उसमें हेमलता सहित 456 उम्मीदवारों को प्रारंभिक परीक्षा में उत्तीर्ण घोषित किया गया है. हेमलता कहती हैं, ''मुझे'' प्रारंभिक परीक्षा में सफल होने की पूरी उम्मीद थी. ''
आयोग की एक भूल से 456 प्रतिभावान युवा अनुत्तीर्ण हो गए थे. दरअसल प्रारंभिक परीक्षा में सामान्य अध्ययन और लोक प्रशासन विषय में पूछे गए कुछ वस्तुनिष्ठ प्रश्न गलत थे जबकि कुछ के सही उत्तर विकल्प में शामिल नहीं थे. लेकिन आयोग ने इसे नजरअंदाज कर नतीजे घोषित कर दिए और दिसंबर, 2011 में 4,924 परीक्षार्थियों की मुख्य परीक्षा आयोजित कर ली.
सूचना के अधिकार में अपने प्राप्तांक और आयोग से प्रारंभिक परीक्षा के कट ऑफ मार्क्स की जानकारी लेने पर अनेक उम्मीदवारों ने पाया कि प्रश्नपत्र में प्रश्न सही होते या उत्तर का सही विकल्प दिया गया होता तो वे भी उत्तीर्ण हो सकते थे. इस आधार पर 12 उम्मीदवारों ने म.प्र. हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
हाइकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने 7 दिसंबर को फैसला दिया कि याचिका दायर करने वाले उम्मीदवारों को अतिरिक्त अंक दिए जाएं और यदि वे इन्हें पाकर प्रारंभिक परीक्षा के कट ऑफ मार्क्स से ज्यादा अंक पाते हैं तो उनके लिए अलग से मुख्य परीक्षा आयोजित की जाए. इसके बाद राज्य लोक सेवा आयोग ने अदालत से न सिर्फ याचिका दायर करने वाले बल्कि सभी उम्मीदवारों को गलत प्रश्नों के अंक देते हुए नई सूची बनाने की अनुमति मांगी.
5 जनवरी को आई नई सूची में 456 उम्मीदवारों को उत्तीर्ण घोषित किया गया और उनके लिए विशेष मुख्य परीक्षा 3 फरवरी को कराने का निर्णय लिया. आयोग के सचिव डॉ. मधु खरे कहती हैं, ''हमने परीक्षार्थियों के हित में हाइकोर्ट के निर्देश का पालन किया है.''
लेकिन हाल ही में सफल घोषित किए गए परीक्षार्थी अब भी नुकसान में हैं. पहली सूची में उत्तीर्ण परीक्षार्थियों को मुख्य परीक्षा की तैयारी के लिए जहां 4 माह मिले, वहीं इन परीक्षार्थियों को एक माह भी नहीं मिल रहा है. नर्ई सूची में उत्तीर्ण घोषित अशोक परमार कहते हैं ''परीक्षा की तारीख आगे बढ़ाई जानी चाहिए. '' यह मांग वाजिब इसलिए है क्योंकि मुख्य परीक्षा दे चुके और विशेष मुख्य परीक्षा देने जा रहे परीक्षार्थियों की सम्मिलित मेरिट लिस्ट बनेगी, ऐसे में साफ है कि दोनों को समान अवसर नहीं दिए गए.
आयोग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान पहले भी लगते रहे हैं. रतलाम के विधायक पारस सकलेचा कहते हैं, '' 2010 के परिणामों में तो अदालत के निर्देश पर सुधार कर लिया गया लेकिन 2008 और 2009 में भी ऐसी ही गड़बडिय़ां हुईं, उनके प्रभावितों का क्या? ''
आयोग की विवादास्पद नियमावली के कारण अन्य परीक्षाओं में भी ज्यादा अंक लाने वाली महिलाओं की जगह कम अंक लाने वाले पुरुषों का चयन साक्षात्कार के लिए होता रहा है, इस मामले को इंडिया टुडे ने ही उठाया था. सकलेचा ने इस मामले में जनहित याचिका भी दायर की है जो विचाराधीन है.

