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झारखंड: फिर जागा गुरुजी का पुत्र प्रेम

जेएमएम प्रमुख ने बीजेपी को किया सत्ता से बाहर. क्या अब कांग्रेस उनके साथ आएगी? 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य में कुछ और सीटें अपनी झोली में डालने की खातिर कांग्रेस जेएमएम पर बाजी खेल सकती है.

अपडेटेड 21 जनवरी , 2013

आठ जनवरी, 2013 को जब झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) प्रमुख शिबू सोरेन ने अर्जुन मुंडा के नेतृत्व वाली 28 महीने पुरानी गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लिया तो वे बस अपने बेटे उप-मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सुझाव पर अमल कर रहे थे.

18 सदस्यीय जेएमएम ने हेमंत को झारखंड के नौवें मुख्यमंत्री बनाने के कांग्रेस के आश्वासन पर मुंडा से नाता तोड़ लिया. लेकिन हेमंत को कांग्रेस से ज्यादा शिबू की जरूरत है, क्योंकि जेएमएम के मुखिया की मौजूदगी की आभा ही उनके सारे जोड़-तोड़ पर पर्दा डालती है. 8 जनवरी को जब हेमंत ने मुंडा सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा की तो किसी ने तवज्जो नहीं दी, तब उन्होंने वही घोषणा दोबारा अपने पिता से करवाई. लेकिन वैकल्पिक सरकार बनाने में देर हुई तो राज्यपाल सैयद अहमद राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकते हैं.

शिबू ने अनौपचारिक तौर पर जो कमान हेमंत को सौंपी, वह उनके पुत्रमोह का प्रतीक है. जेएमएम के एक नेता कहते हैं, ‘‘हो सकता है शिबू दांवपेच में माहिर हों, लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी उनका बेटा है.’’ उन्हें हमेशा ही अपने बेटों से लगाव रहा है, लेकिन मई, 2009 में बड़े बेटे दुर्गा, जिसे वे अपने उत्तराधिकारी के रूप में तैयार कर रहे थे, को खोने के बाद हेमंत को लेकर उनकी कमजोरी कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है.

हेमंत किसी भी कीमत पर मुख्यमंत्री की कुर्सी पाना चाहते हैं. उन्हें उम्मीद है कि राज्य के शीर्ष कार्यालय की कुर्सी जेएमएम के कई नेताओं के बॉस बनने के उनके सपने को सच कर देगी. हालांकि इन नेताओं को उनकी सरपरस्ती मंजूर नहीं है. कांग्रेस को ऐसे युवा रास आते हैं जो सब कुछ पाने की जल्दबाजी में हों क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में उसे राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए गठबंधन साथी चाहिए. 2009 के विधानसभा चुनाव में इसके साथ रहे बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व वाली झारखंड विकास मोर्चा ने पहले ही इस पेशकश को ठुकरा दिया है. लिहाजा, 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य में कुछ और सीटें अपनी झोली में डालने की खातिर कांग्रेस जेएमएम पर बाजी खेल सकती है.

राज्य की 14 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस के पास बस रांची है जिसे सुबोधकांत सहाय ने संभाल रखा है. लेकिन सीट को बचाए रखने में सुबोधकांत की क्षमता पर कांग्रेस के लोगों को भरोसा नहीं है क्योंकि उनके छोटे भाई सुनील उनके लोकसभा क्षेत्र के ही हटिया विधानसभा के लिए जून, 2012 में हुए उप-चुनाव में अपनी जमानत जब्त करवा चुके हैं.

इस बिखरी हुई स्थिति में सरकार का गठन आसान नहीं. जेएमएम को 82 सदस्यीय हाउस में बहुमत के लिए 42 वोट चाहिए, लेकिन कांग्रेस और आरजेडी के वोट जोडऩे के बाद भी इसके पास छह वोटों की कमी होगी. हां, छह निर्दलीय विधायकों का वोट इसे मिल सकता है लेकिन कांग्रेस इनोस एक्का और हरिनारायण राय जैसे विधायकों से हाथ मिलाने के लिए तैयार नहीं जो आय से अधिक संपति मामलों में फंसे हैं. जेएमएम को गीता कोड़ा के वोट की भी जरूरत होगी जिनके पति पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा जेल में बंद हैं. इसलिए सारी निगाहें वापस एक ही शख्स पर लौट रही हैं-शिबू सोरेन.

झारखंड की राजनीति के इस कुशल खिलाड़ी को कांग्रेस का खुश करने के लिए सब करना होगा. निर्दलीय विधायकों पर लगाम कसने से लेकर बेटे को जेएमएम के दिग्गजों को नाराज न करने की  नसीहत तक, लेकिन कहना आसान होगा करना थोड़ा मुश्किल.

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