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डीएमके: स्टालिन को विरासत

डीएमके की कमान सबसे छोटे बेटे को सौंपने की करुणानिधि की तैयारी.

एम.के. स्टालिन
एम.के. स्टालिन
अपडेटेड 20 अक्टूबर , 2016

चलताऊ अंदाज में की गई एक टिप्पणी ने तमिलनाडु के सबसे शक्तिशाली राजनैतिक घराने में नेतृत्व संघर्ष की चिनगारी छोड़ दी है. 3 जनवरी को दलित नेताओं को संबोधित करते हुए डीएमके के बुजुर्ग मुखिया एम. करुणानिधि ने ऐलान किया कि उनके बाद ‘समाज के विकास का काम’ उनके छोटे बेटे एम.के. स्टालिन संभालेंगे.

करुणानिधि के सचिव का कहना है कि वे सिर्फ उनके सामाजिक काम के बारे में जिक्र कर रहे थे. उनके बड़े बेटे 62 वर्षीय अलागिरी ने उस बात को पकड़ लिया, जो पिता के बाद खुद बागडोर थामने का सपना पाले बैठे हैं. 4 जनवरी को अलागिरी ने जवाब दिया कि उनकी पार्टी “कोई धर्म संस्था नहीं है, जहां मुख्य पुजारी अपने उत्तराधिकारी को नामांकित करे.”

पार्टी के नियमों के अनुसार आम परिषद पार्टी प्रमुख का चुनाव करती है. अलागिरी उत्तराधिकारी चुनने के अपने पिता के अधिकार को चुनौती दे रहे हैं. 5 जनवरी को अपनी पुत्री कनिमोलि के 45वें जन्मदिन पर करुणानिधि ने चेन्नै में उनके घर पर एक घंटा बिताया. उसके बाद उनके सौतेले भाई स्टालिन उनके घर गए. अलागिरी वहां नहीं आए, बस फोन से शुभकामनाएं दीं. 6 जनवरी को करुणानिधि ने रिपोर्टरों को बताया, “अगर पार्टी अध्यक्ष का नाम प्रस्तावित करने का मौका मिला तो मैं इसे इस्तेमाल करते हुए स्टालिन का नाम लूंगा.”

59 वर्षीय स्टालिन ने राजनीति की शिक्षा अपने पिता की कुशल छत्रछाया में ली है. उन्हें मीसा (आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन अधिनियम) के तहत पकड़ा गया था और इमरजेंसी के दौरान जेल में काफी यातना झेलनी पड़ी थी, उन्होंने बी.ए. की परीक्षा जेल से ही दी थी. 1980 में उन्होंने डीएमके की युवा इकाई का गठन किया और दो साल बाद इसके अध्यक्ष बने और आज तक यह दायित्व संभाल रहे हैं. इसके बाद स्टालिन बड़ी तेजी से आगे बढऩे लगे थे. 2008 में वे पार्टी के कोषाध्यक्ष बने और 2009 में तमिलनाडु के उप-मुख्यमंत्री. मृदुभाषी और बातों से लोगों के मन को जीतने की कला में माहिर स्टालिन ने 2006-2011 के दौरान तमिलनाडु सरकार में डीएमके के राज्य गठजोड़ को संभाला था. उनका नाम कम्युनिस्ट नेता जोसेफ स्टालिन पर रखा गया है, जिनकी मौत संयोगवश उसी दिन हुई, जिस दिन स्टालिन का जन्म हुआ.

वे अलागिरी से बिल्कुल अलग हैं जिनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत महज 15 साल पहले हुई. पर स्टालिन की तरह वे न तो लोगों को मोहना जानते हैं, न छोटे भाई की तरह राजनीति की बारीकी समझते हैं. वे कितना भी शोर मचाएं, स्टालिन को परास्त करना उनके बस की बात नहीं है.

एक समर्थक ने कहा, “अलागिरी हल्ला-हुड़दंग मचा सकते हैं, पर स्टालिन के लिए खतरा नहीं हैं.” बदकिस्मती से यह घोषणा ऐसे समय पर हुई है जब अलागिरी अपने इकलौते बेटे दुरै दयानिधि को जेल से बाहर निकालने के लिए मशक्कत कर रहे हैं. दुरै मदुरै के ग्रेनाइट घोटाले में फंसे हुए हैं और महीनों पुलिस से भागते रहने के बाद आखिकार दिसंबर, 2012 को उन्हें अग्रिम जमानत मिली.

विरासत की इस जंग का तीसरा मोहरा राज्यसभा सांसद कनिमोलि हैं जो बहुत बड़ी प्रतिस्पर्धी नहीं हैं. पिता की घोषणा के बाद उन्होंने बस इतना कहा कि स्टालिन के लिए “बहन होने के नाते वे खुश हैं.”

कनिमोलि के सरोकार राष्ट्रीय हैं. वे अपने पिता की लाडली हैं. उन्हें दिल्ली के लिए तैयार किया गया है. इसके पहले करुणानिधि के भतीजे यह दायित्व संभाल रहे थे. दिल्ली की यूपीए सरकार और डीएमके सरकार के बीच का सिरा अब वही हैं. हाल के एफडीआइ संकट के दौरान उन्होंने ही बातचीत की कमान संभाली. कुल मिलाकर दक्षिण में टकराव की नई गाथा का आगाज हो चुका है.

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