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मध्य प्रदेश: जुनून से बदलने लगी सूरत

तकनीक और सेवाभाव के अनोखे मेल ने हरदा जिले के आदिवासी छात्रों की किस्मत ही बदल डाली है.

अपडेटेड 12 जनवरी , 2013

हरदा जिले के घने जंगलों के बीच बसे गांव राजाबरारी में लैंड लाइन फोन अभी तक नहीं पहुंचा है. मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट की सुविधा की तो बात ही दूर है. लेकिन इस इलाके का पिछड़ापन यहां के स्कूल-कॉलेजों की दहलीज के बाहर तक ही सीमित है. परिसर के भीतर का नजारा तो बिलकुल अलग है. आदिवासी समुदाय के वे छात्र जिन्होंने रेलगाड़ी तक नहीं देखी है, यहां एलईडी स्क्रीन के माध्यम से सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे शिक्षकों से रू-ब-रू होते हैं. उच्च गुणवत्ता की शिक्षा की बदौलत यहां से निकले करीब दो दर्जन से ज्यादा छात्र आज मल्टीनेशनल कंपनियों में उंचे पैकेज पर काम कर रहे हैं.

आदिवासियों की किस्मत को शिक्षा के माध्यम से बदलने का बीड़ा उठाया है राधास्वामी सत्संग सभा ने. आगरा में सत्संग सभा की दयालबाग एजुकेशन इंस्टीट्ïयूट (डीईआइ) नामक एक बड़ी शैक्षणिक संस्था है. इसी संस्था का परिसर राजाबरारी और टिमरनी में भी है जहां  आदिवासियों को हाइ-टेक एजुकेशन मुहैया करवाई जाती है. सत्संग सभा 1919 से आदिवासियों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के के लिए काम कर रही है और यहां 8 प्राथमिक शालाएं, हाइस्कूल और एक हायर सेकंडरी स्कूल चलाती है.  इसके अलावा रोजगारोन्मुखी व्यावसायिक प्रशिक्षण भी देती है.

लेकिन 2009 में उस वक्त बड़ा बदलाव आया जब राधास्वामी सत्संग सभा के आठवें और वर्तमान धर्मगुरु प्रो. प्रेमशरण सत्संगी ने यहां तकनीकी और हायर एजुकेशन की गुणवत्ता को वैश्विक स्तर पर ले जाने का निर्णय लिया. डीईआइ यूनिवर्सिटी  की एडवाइजरी कमेटी के चेयरमैन प्रो. सत्संगी ने छात्रों को हाइटेक एजुकेशन देने के लिए टिमरनी तक रिलायंस  की लीज्ड लाइन डलवाई और वायरलेस लिंक के जरिए राजाबरारी को भी इससे जोड़ा.

यहां इसरो के एजुसेट और पोलिकोन के टू-वे सिन्क्रोंस डिवाइस भी लगवाए गए जिनके जरिए आगरा में बैठे प्रोफेसर राजाबरारी के छात्रों से सीधे रू-ब-रू हैं. इनकी मदद से छात्र और प्रोफेसर एक दूसरे को देख-सुन सकते हैं. यही नहीं, प्रोफेसर छात्रों की कॉपियां भी जांच सकते हैं. कॉमर्स पढ़ाने वाले आगरा के प्रो. प्रमोद कुमार सक्सेना कहते हैं, ''मैं कभी राजाबरारी नहीं गया लेकिन यहां के हर छात्र को जानता हूं. ''

यह सत्संग सभा का ही प्रभाव है कि विभिन्न कंपनियों में आला पद पर बैठे और ऊंचा वेतन पा रहे ऐसे ढेरों लोग हैं जो आदिवासी युवाओं के भविष्य को संवारने के लिए सुविधासंपन्न जीवन छोड़कर राजाबरारी और टिमरनी में आ बसे हैं. डीईआइ यूनिवर्सिटी के डीन डॉ. सत्यप्रकाश कौशिक 2009 से टिमरनी और राजाबरारी में ही रह रहे हैं और यहीं से आगरा में मौजूद छात्रों को पढाते हैं. सत्संग सभा के टिमरनी स्थित शैक्षणिक संस्थान में टिन के शेड में वायरमेन की ट्रेनिंग देने वाले विजय कुमार अरोड़ा हीरो-होंडा में जीएम रह चुके हैं. कुछ ऐसा ही सेवाभाव 45 वर्षीय पुनीत चौधरी में दिखता है जो जनरल मोटर्स के जीएम का पद और शानोशौकत भरा जीवन छोड़कर राजाबरारी में रेजिडेंट मैनेजर हो गए. दिल्ली के नामी-गिरामी स्कूल में पढऩे वाला उनका बेटा अब आदिवासी छात्रों के साथ पढ़ता है.

आदिवासी छात्रों को कॉमर्स पढ़ाने के लिए अमेरिका से यहां आ बसे 29 वर्षीय डी. सुमेर अमेरिकन एक्सप्रेस कंपनी में 45 लाख रु. सालाना वेतन पाते थे. लेकिन यहां मात्र ढाई हजार रु. मासिक तनख्वाह पाकर भी संतुष्ट हैं. उनकी पत्नी रागिनी को भी आइबीएम का जॉब छोड़कर यहां डेढ़ कमरे के मकान में रहने में कोई दिक्कत नहीं है. सुमेर कहते हैं, ''आदिवासी बच्चे पढ़ाई करने के लिए सात-आठ किलोमीटर पैदल चलकर आते हैं, उनका जुनून देखकर मुझे अपने निर्णय पर कभी मलाल नहीं हुआ. ''

सत्संग सभा के प्रयासों के चलते राजाबरारी और टिमरनी के छात्र ही नहीं, किसानों को भी एक से बढ़कर एक विशेषज्ञ से मार्गदर्शन मिलता है. कोलकाता की एक नामी टी कंपनी में डायरेक्टर इंद्र्रजीत सिंह बल यहां के आदिवासियों को खेती के गुर सिखाते हैं जबकि यहां के लेागों की सेहत को दुरुस्त रखने का जिम्मा एक डॉक्टर दंपती ने उठा रखा है.

ये हैं उत्तर प्रदेश सरकार में संयुक्त निदेशक (स्वास्थ्य) का पद छोड़कर यहां आए डॉ. विजयशंकरलाल श्रीवास्तव और उनकी गाइनाकॉलोजिस्ट पत्नी डॉ. कुंदन श्रीवास्तव. कुंदन कहती हैं, ''आदिवासियों की सेवा से मिलने वाला सुख भौतिक सुख से कहीं ज्यादा बड़ा है. ''

इस सूची में सबसे नया नाम इंडियन रेलवेज सर्विसेस के विधु कश्यप का है. कश्यप बताते हैं कि इसी साल जून में उन्हें अतिरिक्त मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर नियुक्ति का प्रस्ताव मिला था लेकिन इसकी बजाए उन्होंने राजाबरारी में सेवाएं देने का निश्चय किया. वे आगे कहते हैं, ''पैसे और सुख-सुविधाओं की तुलना में गरीब आदिवासियों के चेहरों पर खिली मुस्कान अनमोल है. ''

सत्संग सभा की कोशिश रंग लाई है. तभी दो जून की रोटी के लिए तरसते आदिवासियों के बच्चे आज बड़े-बड़े ओहदों पर हैं और परिवार का नाम रौशन कर रहे हैं. ऐसा ही एक नाम है ज्योति नागले का, जो मारुति उद्योग में असिस्टेंट मैनेजर हैं और 50,000 रु. से ज्यादा का मासिक वेतन पा रहे हैं. यहीं से पढ़कर निकला एक और छात्र घनश्याम आज स्टर्लिंग ऐंड विल्सन कंपनी में बड़े पद की जिम्मेदारी बखूबी संभाल रहा है. उसकी तनख्वाह 65,000 रु. प्रतिमाह है.

राजाबरारी और टिमरनी के छात्रों को शिक्षा के और भी कई विकल्प दिलवाने की कोशिश हो रही है. डीईआइ के कौशिक कहते हैं, ''भविष्य में राजाबरारी में डीईआइ यूनिवर्सिटी के 82 प्रोफेशनल कोर्स शुरू किए जाऐंगे.'' वे आगे बताते हैं कि डीईआइ का आइआइटी दिल्ली, आइआइटी कानपुर, अमेरिका की मेरिलैंड और कनाडा की वाटरलू यूनिवर्सिटी के साथ समझैता भी हुआ है जिसके तहत निकट भविष्य में यहां के छात्रों को इन संस्थानों की फैकल्टी भी पढ़ा सकती हैं. तकनीक और सेवा का यह मेल पूरे समुदाय की सूरत बदलने का माद्दा रखता है.

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