भारत के सबसे बड़े मेले के लिए तंबू-कनात का एक भरा पूरा शहर संगम तट पर सज रहा है. यह मेला कितना बड़ा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ मौनी अमावस्या के दिन संगम पर तीन करोड़ लोग डुबकी लगाएंगे जो इलाहाबाद शहर की कुल आबादी के छह गुना से ज्यादा है. राज्य का सबसे बड़ा आयोजन होने की वजह से पूरी सरकार ही यहां डटी है. मेला 14 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन शुरू होगा और 10 मार्च तक चलेगा. इस दौरान लगभग 10 करोड़ लोगों के यहां आने का अनुमान है. संख्या की दृष्टि से देखें तो यह संख्या दुनिया के 12वें सबसे बड़े देश फिलीपींस की आबादी से भी ज्यादा है.
इस बार के महाकुंभ में नई पहल के तौर पर पॉलीथीन का प्रयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित है. दुकानदारों से इस बारे में लिखित अंडरटेकिंग ली गई है. पहली बार कुंभ में मेला क्षेत्र के मानचित्र और इलेक्ट्रॉनिक साइन बोर्ड जगह-जगह लगाए जाएंगे और भूले-भटके लोगों के शिविर चलाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा. संगम में एक समय में 10 लाख लोग ही स्नान कर सकते हैं. भीड़ नियंत्रण के लिए ट्रिपल आइटी एक सॉफ्टवेयर विकसित कर रहा है जिससे प्रशासन को भीड़ के बारे में जानकारी मिलती रहेगी. मेले को 14 सेक्टर में बांटा गया है और हर सेक्टर में थाना, फायर ब्रिगेड, चिकित्सालय और मार्केट होंगे.
महाकुंभ मेले के परेड क्षेत्र में सभी प्रमुख विभागों के कार्यालय बनाए गए हैं मसलन, स्वास्थ्य, आयुर्वेद, पुलिस लाइन, पर्यटन विभाग आदि. यहां स्वास्थ्य विभाग द्वारा कराई जाने वाली फोगिंग भी अभी तक नहीं हो पाई है. मेला क्षेत्र में पीली लाइट लगाई गई है ताकि कोहरे में भी यह काम कर सके. महाकुंभ मेला 2012-13 में विद्युत आपूर्ति को सुचारू रूप से बनाए रखने के लिए 70 किमी. की हाइटेंशन और 700 किमी की लो टेंशन लाइन लगाई गई है. 20,000 स्ट्रीट लाइट फिटिंग और 1 लाख कैंप कनेक्शन दिए गए हैं. विभाग के नोडल अधिकारी अनिल वर्मा कहते हैं, ''भारी क्षमता के 48 जनरेटर लगाए गए हैं और आकस्मिक स्थिति में स्ट्रीट लाइट की आपूर्ति के लिए भी जनरेटर का बैकअप रखा गया है. '' बिजली की बचत को ध्यान में रखते हुए कैंप के अंदर सीएफएल की व्यवस्था की गर्ई है.
मेला क्षेत्र में अभी भी कई जगहों पर चाकर्ड प्लेट नहीं बिछाई गई हैं, हालांकि पानटून पुल लगभग तैयार हो गई हैं और कुछ ही काम शेष रह गया है. यहां पर बता दें कि गंगा में भी बाढ़ समाप्त होने के बाद ही समतलीकरण का कार्य शुरू हो पाता है और उसके बाद तब चाकर्ड प्लेट बिछाकर सड़कें बनाई जाती हैं.
मेला परिसर 4,783 एकड़ क्षेत्र में फैला है. 2007 के अर्द्ध कुंभ के मुकाबले इस बार मेले क्षेत्र में 19.9 फीसदी का विस्तार हुआ है. मेला के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आर.के.एस. राठौर और पुलिस अधीक्षक यातायात कवींद्र प्रताप सिंह के अतिरिक्त शासन से उपजिलाधिकारी स्तर के 17 मजिस्ट्रेटों की तैनाती की गई है.

मेले में भूमि आवंटन को लेकर भी विवाद थमने का नाम नहीं ले रहे. मेला प्रशासन के दफ्तर में फरियादियों की लंबी लाइन लगी है. जिसे जमीन नहीं मिली, वह जिलाधिकारी मेला से जमीन आवंटित कराना चाहता है. जिसे मिल चुकी है, वह प्रशासन से मिलने वाली सुविधाओं को बढ़वाना चाहता है. तपस्या के लिए बने संगम की रेती पर भूमि और सुविधा के लिए कलह मची है. डीएम मेला, मणि प्रसाद मिश्र कहते हैं, ''हम सभी की सुविधाओं और जरूरतों को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं. किसी को शिकायत का मौका नहीं मिलेगा. '' द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के प्रतिनिधि अविमुक्तेश्वरानंद का मेला प्रशासन से विवाद गहराता जा रहा है. स्वामी जी का कहना था कि ''पहले यह तय था कि एक चौराहे के चारों कोनों पर चारों पीठ के शंकराचार्यों को बसाया जाए ताकि आम श्रद्घालुओं में यह संदेश जाए कि यही चार शंकराचार्य असली हैं. इस पर डीएम महाकुंभ सहमत थे और उन्होंने भूमि आवंटित कर दी थी. फिर जब हम लोगों ने यहां आकर अपने टेंट लगा दिए तो उन्होंने कहा कि आवंटन गलत हो गया है. आप कहीं और जमीन लीजिए. '' मणि प्रसाद मिश्र कहते हैं, ''जो भी मामला है, उसे सुलझ लिया जाएगा. '' अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि अगर वहीं पर जमीन नहीं दी गई तो हम चले जाएंगे.
पूर्व मंडलायुक्त इलाहाबाद, रविंद्रनाथ त्रिपाठी कहते हैं ''जिस तरह से लड़की की शादी में बारात के विदा होने तक कुछ-न-कुछ घटता रहता है, मेले का आयोजन भी कुछ वैसा ही है. ''
बहरहाल, इस मेले में सरकारी विभागों की कछुआ रफ्तार और सुविधा एवं जमीन के लिए कलह दूर होती नहीं दिखती.

