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रक्षा: फिजूलखर्ची का महकमा

लचर प्रक्रियाओं और पुराने तरीकों की वजह से रक्षा मंत्रालय सालाना 5,450 करोड़ रु. से ज्यादा के घाटे की मार झेल रहा.

अपडेटेड 12 जनवरी , 2013

रक्षा मंत्रालय की कुछ आंतरिक रिपोर्टों में उसके विभिन्न विभागों में 5,450 करोड़ रु. से ज्यादा की फिजूलखर्ची सामने आई है. 3,000 पन्नों की ये रिपोर्टें रक्षा मंत्रालय के रक्षा वित्त विभाग ने तैयार की हैं और इन्हें नवंबर, 2011 में रक्षा सचिव को सौंपा था. इनकी प्रति इंडिया टुडे के पास है. रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने पिछले साल मंत्रालय के विभागों को प्राप्त वित्तीय अधिकारों की सार्थकता को सुनिश्चित करने संबंधी निर्देश जारी किए थे.

देश में भारतीय रेल के बाद सबसे ज्यादा लोगों को रह्ना विभाग ही रोजगार देता है. रिपोर्टों में जानकारी दी गई है कि इस विशाल मंत्रालय में किस तरह राजस्व घाटा हो रहा है और चारों ओर लचर प्रबंधन जारी है. रक्षा मंत्रालय से 17 लाख लोग जुड़े हुए हैं और सालाना बजट का 2.2 लाख करोड़ रु. (40 अरब डॉलर) इस पर खर्च होता है.

रिपोर्ट के मुताबिक सेना की उत्तरी कमान ने अपने सैनिकों के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट, एक्सप्लोजिव डिटेक्टर्स, कॉम्बैट फ्री-फॉल पैराशूट और होलोग्राफिक वेपन साइट्स जैसे संवेदनशील सामान खरीदने के लिए विभाग में गैर-पंजीकृत एजेंटों का इस्तेमाल किया. ऐसा कर के उसने 2009 के रक्षा खरीद दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया है जिसके तहत मूल उपकरण निर्माता के अलावा किसी और से खरीदारी का सौदा करना वर्जित है.

रिपोर्ट के मुताबिक मंत्रालय का सबसे ज्यादा खर्च सेना परिवहन प्रणाली पर हो रहा है जो लगभग 3,500 करोड़ रु. है. सेना अपने वाहनों के बेड़े और उनके 40,000 ड्राइवरों पर 5,000 करोड़ रु. खर्च करती है. लेकिन 2009-10 के बीच सेना ने अपनी जरूरत को आउटसोर्स के जरिए पूरा किया जिस पर 763 करोड़ रु. का खर्च आया. जाहिर है, बाकी सारे काम पर उसके पास खर्च करने को 4,250 करोड़ रु. ही बचते हैं.defence

ऑडिट जांच में जो आंकड़े सामने आए हैं वह तो बहुत मामूली हैं. डिफेंस ऑडिटर तो संसाधनों की बरबादी, अक्षमता और पुरानी पड़ चुकी युद्धक क्षमता से जुड़ी अलग ही तस्वीर पेश करते हैं. उनके मुताबिक रक्षा मंत्रालय के कई बड़े सौदे अनियमितता का शिकार हैं, जिससे रक्षा बजट में सर्वश्रेष्ठ उपकरणों की खरीद नहीं हो पाती.

चीन के हाथों शर्मनाक हार के पचास साल बाद आज भी भारतीय सेना टेढ़े-मेढ़े पर्वतीय सीमा क्षेत्रों में अपनी टुकडिय़ों और उपकरणों को तैनात करने में अक्षम है क्योंकि उत्तर और उत्तर-पूर्व में 13,000 किमी लंबी रणनीतिक दृष्टि से अहम 277 सड़कों का निर्माण कार्य समयसीमा से तीन साल पीछे चल रहा है. इसकी बड़ी वजह यह है कि बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) की विशिष्ट इंजीनियर कोर का 75 फीसदी फील्ड में नहीं बल्कि प्रशासनिक कामों में लगा है.

सेना की कई वर्कशॉप में सेना के 900 टी-72 टैंक या सेना के 3,500 टैंकों के बेड़े की क्षमता का एक-तिहाई दुरुस्त होने के इंतजार में है क्योंकि सेना में इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियरों की कोर अपना ज्यादातर समय वाणिज्यिक वाहनों यानी बसों और ट्रकों की मरम्मत में गुजार देती है. ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी ऑर्डनेंस फैक्टरी बोर्ड (ओएफबी) बीएमपी बख्तरबंद वाहन बनाने का मंत्रालय से दोगुना पैसा लेता है. ओएफबी को इसकी निर्माण लागत डेढ़ करोड़ रु. आती है लेकिन सेना से वह तीन करोड़ रु. लेता है. इन्हें दुरुस्त करने पर सामान्य खर्च जो 20 लाख रु. पड़ता है, उसके बदले बोर्ड मंत्रालय से 1.4 करोड़ रु. लेता है.

सेना ने ऑडिट के निष्कर्षों को सिरे से नकार दिया है. सेना के मुताबिक कमांडरों को मिले विशिष्ट वित्तीय अधिकारों के तहत हर खरीद से पहले उन इंटिग्रेटेड फाइनेंशियल एडवाइजरों से सलाह ली जाती है, जो हर सेना कमान में नियुक्त होते हैं. सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘‘वित्तीय सलाहकार प्रस्तावों को ठुकरा भी सकते हैं.’’ अपनी बात को पुष्ट करने के लिए सेना रक्षा खरीद मैनुअल की धारा और 2 नवंबर, 2011 को लिखे मंत्रालय के एक पत्र का हवाला देती है जिसमें गैर-पंजीकृत विक्रेताओं को उपकरण आपूर्ति में बोली लगाने की मनाही है.

हालांकि मंत्रालय भी इस ऑडिट से खुश नहीं है. मंत्रालय के एक आला अधिकारी ने मंत्रालय के ही ऑडिटर पर आरोप लगाया है कि उन्होंने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया है. मंत्रालय के गुस्से को समझ पाना मुश्किल नहीं है. वैसे भी रक्षा मंत्रालय में सुधार की बात तभी उठती है जब कभी आंतरिक ऑडिट रिपोर्टें सामने आती हैं.

इससे पहले कभी सुधार की बात आई है, तो वह भी बाहर से या फिर गोपनीय तरीके से, जिन्हें जल्द ही भुला दिया गया. इस बारे में 1989 में पूर्व रक्षा राज्यमंत्री अरुण सिंह की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी थी जिसने सिफारिश की थी कि अक्षम कारखाने बंद हों और फौज की वर्दी सिलने जैसे कम महत्वपूर्ण कार्यों को निजी क्षेत्र को सौंपा जाए. फिर 2009 में रक्षा खर्च समीक्षा समिति की रिपोर्ट में ‘‘रक्षा खर्च में सक्षमता’’ का आह्वान किया गया था. दोनों ही रिपोर्टों को गोपनीय बनाकर अब तक दबाकर रखा गया है.

विश्लेषकों का कहना है कि बदलाव का दबाव नहीं होने से पूरा महकमा ही अतीत में अटका हुआ है. अमेरिका की पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी स्थित सेंटर फॉर द एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया में मिलिट्री रिसर्चर अनित मुखर्जी कहते हैं, ‘‘भारत में सैन्य सुधार का मामला मंत्रालय खुद सेनाओं पर छोड़ता रहा है. यह हास्यास्पद है-कोई भी खुद को नहीं सुधार सकता.’’ उदाहरण के लिए, सेना अब भी अपनी पुरातनपंथी पद्धति पर कायम है. मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) सुरजीत सिंह कहते हैं, ‘‘दूसरे विश्व युद्ध के दौर के सात पुराने आयुध डिपो को बेच देने से ही दो रक्षा बजट का खर्च निकल आएगा (80 अरब डॉलर से ज्यादा).’’

विश्लेषकों का मानना है कि मंत्रालय को ऑडिट के निष्कर्षों पर विचार करना चाहिए. मंत्रालय के पूर्व वित्तीय सलाहकार अमित कौशिश कहते हैं, ‘‘इन मुद्दों पर रक्षा मंत्रालय की कार्रवाई सार्वजनिक की जानी चाहिए.’’ सितंबर 2012 में मंत्रालय ने ना-नुकर करते हुए रक्षा मंत्रालय की ऑडिट में की गई कुछ सिफारिशों पर कार्रवाई की थी. इसने रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के प्रमुख विजय कुमार सारस्वत के वित्तीय अधिकारों पर कैंची चलाते हुए कहा था कि उन्हें अपने सारे वित्तीय फैसलों में रक्षा मंत्रालय से सलाह लेनी होगी. मंत्रालय हालांकि दूसरी सिफारिशों पर कदम उठाने से कतरा रहा है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘‘हमने रिपोर्ट की प्रति सारे विभागों को भेज दी है और उनसे प्रतिक्रिया मांगी है.’’

जाहिर है, उपर्युक्त बयान वास्तविक कार्रवाई न करने का एक अफसरी बहाना है जिसमें मुद्दों को परामर्श के दुश्चक्र में उलझा दिया जाता है. इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि पैसे खर्च करने के बाद भी भारत को सर्वश्रेष्ठ रक्षा प्रणाली हासिल नहीं होने वाली.

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