नरेंद्र मोदी के बढ़ते राष्ट्रीय कद को लेकर यदि कोई शंका रही भी होगी तो उस चमकीली सुबह अहमदाबाद के बीचोबीच स्थित सरदार पटेल स्टेडियम में वह दूर हो गई. जब मोदी को 12 साल में चौथी बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई तो इस अवसर पर बीजेपी के भावी सहयोगी दलों के कई दिग्गज नेता उपस्थित थे. हालांकि साबरमती के तट से यमुना किनारे के मोदी के संभावित सफर में अभी थोड़ा वक्त लग सकता है, लेकिन ऐसी अटकलें अभी से लगाई जाने लगी हैं कि उनके दिल्ली प्रस्थान की दशा में उनका उत्तराधिकारी कौन होगा?
क्या मोदी और वरिष्ठ नेता नितिन भाई पटेल के बाद तीसरे स्थान पर शपथ लेने वाली उनकी सबसे तगड़ी वफादार आनंदीबेन पटेल इस जगह होंगी? पिछली सरकार में उनके पास दो महत्वपूर्ण विभाग थे: राजस्व तथा सड़क और भवन विभाग. कद्दावर पटेल नेता और मोदी के वफादार नितिन भाई पिछली बार सिंचाई एवं शहरी विकास मंत्री थे. तीसरे उम्मीदवार बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पुरुषोत्तम रूपाला भी पटेल हैं और वे हालिया विधानसभा चुनाव प्रचार में मोदी के भाषण संबंधी कामकाज देख रहे थे.
गौरतलब है कि अपनी छवि के अनुरूप मोदी ने तीन उम्रदराज मंत्रियों, अपने वफादार और पूर्व वित्त मंत्री वजुभाई वाला, नरोत्तम पटेल तथा मंगूभाई पटेल को इस बार मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी. बल्कि गणपत वासवा, नानू वनानी और अपनी ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध तथा संघ के आदमी माने जाने वाले गोविंद पटेल जैसे युवा विधायकों को शामिल किया. जैसा कि उन्होंने दो साल पहले पार्टी पदाधिकारियों को चुनते समय किया था, मोदी अपने 17 सदस्यीय मंत्रिमंडल की औसत आयु को 65 से 55 वर्ष पर ले आए.
पिछली बार उद्योग, बिजली तथा वित्त राज्य मंत्री रहे सौरभ पटेल को बेहतर प्रदर्शन के चलते तरक्की देकर कैबिनेट मंत्री बना दिया गया तो एक वरिष्ठ नेता, भूपेंद्र सिंह चूड़ासामा मंत्रिमंडल का राजपूत चेहरा बने. हालांकि वजुभाई वाला को मंत्रिमंडल में शामिल न करने पर कुछ त्योरियां जरूर चढीं क्योंकि उन्होंने 2001 में मोदी के लिए तब अपनी सीट छोड़ी थी, जब कोई और विधायक ऐसा करने के लिए तैयार नहीं था. लेकिन मोदी की भावी योजना को जानने वाले वजुभाई वाला के समर्थकों ने इसे सकारात्मक रूप से ही लिया.
सोहराबुद्दीन मामले के एक आरोपी और मोदी के प्रमुख रणनीतिकार पूर्व गृह राज्यमंत्री अमित शाह को बाहर रखे जाने ने भी कुछ अटकलों को जन्म दिया, लेकिन शाह के खिलाफ पुलिस मामले को देखते हुए इसे स्वाभाविक मानकर किसी ने चूं-चपड़ नहीं की.
गुजरात में अपनी नई पारी के लिए मोदी के पास एक निश्चित योजना है. उनका मानना है कि निवेश और विनिर्माण पर पर्याप्त ध्यान दिया जा चुका है और अब कुशल जनशक्ति के प्रशिक्षण, ज्ञान को साझा करने तथा कृषि में आधुनिक तकनीकों के समावेश पर ध्यान दिया जाना चाहिए. चुनाव परिणामों के बाद मोदी ने इंडिया टुडे को बताया, ‘‘अब हमारी प्राथमिकता वाले बिंदुओं में से एक होगा कुशल जनशक्ति का प्रशिक्षण.’’ उनकी योजना जल्द ही एक कृषि सम्मलेन आयोजित करने की है.
यह जानना दिलचस्प होगा कि सिंचाई की ड्रिप एवं सेकुलर पद्धतियों के प्रचार के लिए मोदी की 2003 में शुरू की गई गुजरात ग्रीन रेवोल्यूशन कंपनी ने एक दशक से भी कम समय में प्रदेश में लघु सिंचाई से सिंचित भूमि को 15,000 हेक्टेअर से बढ़ाकर 800,000 हेक्टेअर कर दिया है. मोदी इस रकबे को और बढ़ाना चाहते हैं.
हालांकि चुनावों में बीजेपी ने अपनी उम्मीद से एक दर्जन से भी अधिक सीटें कम जीती हैं. मोदी को लगभग अपने सभी ऐसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को धूल चटाने का संतोष हुआ होगा, जिन्होंने पिछले साल उनके खिलाफ लगातार अभियान छेड़ रखा था. उनमें केशुभाई पटेल भी शामिल हैं, जिनकी गुजरात परिवर्तन पार्टी मोदी को उखाड़ फेंकने के अपने मंसूबे में नाकाम रही. लेकिन वहीं दूसरी ओर कुछ नीतियों के चलते प्रदेश सरकार के कर्मचारियों द्वारा मोदी सरकार के विरोध के अलावा उम्मीदवारों के गलत चयन और पार्टी की अंदरूनी कलह ने बीजेपी को लगभग 15 सीटों का नुकसान भी कराया.
विवादास्पद छवि वाले बीजेपी नेता कामाभाई राठौड़ का पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चयन दरअसल साणंद से पार्टी की हार के रूप में सामने आया, जबकि यह सीट प्रसिद्ध नैनो परियोजना का क्षेत्र और विकास का प्रतीक थी. इसी तरह निकटवर्ती विरमगाम में प्रागजीभाई पटेल की खराब छवि के कारण पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ा. प्रदेश के असंतुष्ट सरकारी कर्मचारियों के मोदी विरोधी मतदान के चलते अनुमान है कि बीजेपी को आठ सीटों पर हार का स्वाद चखना पड़ा. इन आठ सीटों में गोधरा, लूनावाड़ा, सोजित्रा और सौराष्ट्र की तीन सीटें शामिल हैं. इस मामले में मोदी को अपने अडिय़ल रवैये के चलते नुकसान उठाना पड़ा.
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि भले ही मोदी ने खुद को विकास के एक प्रतीक के रूप में पुनर्स्थापित कर लिया हो, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मतदाताओं से तादात्म्य बनाने के लिए अगले छह महीनों में उन्हें ‘‘बिना भेदभाव के विकास’’ और ‘‘साउनो साथ, साउनो विकास (सबका समर्थन, सबका विकास)’’ जैसे नारों को बिलकुल नया मोड़ देना होगा. इसे मुमकिन करने के लिए उन्हें अपनी मुसलमान विरोधी छवि को बदलना भी महत्वपूर्ण होगा.
हालिया विधानसभा चुनावों में मोदी ने एक भी मुसलमान उम्मीदवार नहीं उतारा. इससे राष्ट्रीय विकास परिषद के उस ताजा आंकड़े के रूप में उनके विरोधियों के हाथ एक और अस्त्र लग गया, जिसमें बताया गया था कि उत्तर प्रदेश और बिहार के साथ गुजरात उन चार राज्यों में से एक है, जहां शहरी मुसलमान सबसे ज्यादा गरीब हैं. लेकिन मोदी को इस तथ्य से राहत मिल सकती है कि 22 ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में तकरीबन 25-60 फीसदी मुसलमानों ने बीजेपी को वोट दिया, जहां कुल मतदाताओं में इस समुदाय के 15 फीसदी से अधिक वोट हैं.
साबरमती से यमुना तक का मोदी का सफर कितना आसान होगा, यह सवाल 2014 में जवाब मिलने तक सबकी जुबां पर बरकरार रहेगा.

