राजधानी दिल्ली में कड़ाके की ठंड वाली एक सुबह को टाटा पावर के स्ट्रेटेजिक इलेक्ट्रॉनिक्स डिवीजन के सीइओ 48 वर्षीय राहुल चौधरी अपने फर्म के नवीनतम उत्पाद को गर्व से देखते हैं. उनके सामने पांच साल के विकास का चरम बिंदु खड़ा है: आठ पहियों वाले टाटा ट्रक पर फिट किया गया 155 एमएम का बोफोर्स जैसा तोप.
माउंटेड गन सिस्टम (एमजीएस) कहलाने वाली यह तोप तीन मिनट से कम समय में ही 40 किमी. की दूरी पर स्थित किसी निशाने पर छह राउंड तक गोलों की बौछार कर सकती है. यह भारत की पहली स्वदेशी तौर पर डिजाइन की गई तोप है. चौधरी कहते हैं, ‘‘हमने सरकार से इस प्रोजेक्ट को फंड करने के लिए नहीं कहा. हमने इसमें अपने शेयरधारकों का धन लगाया है.’’
1999 में करगिल की लड़ाई ने यह दिखा दिया कि भारतीय सेना को ऐसे फायर पावर की जरूरत क्यों है. इस युद्ध में स्वीडन में बनी बोफोर्स तोपों ने पाकिस्तानी सेना द्वारा कब्जा की गई चोटियों पर गोलाबारी की थी. वर्ष 1999 में सेना ने 27,000 करोड़ रु. से ज्यादा लागत की 2,200 बोफोर्स जैसी आर्टिलरी (तोप) गन आयात करने को हरी झंडी दिखाई. वजह यह थी कि कोई भी भारतीय फर्म ऐसी तोपें नहीं बनाती.
सेना की तोप खरीद के आकार (दुनिया में सबसे बड़े) को देखते हुए भारतीय उद्योग भी तोप निर्माण में निवेश के लिए प्रेरित हुआ है. करीब 100 अरब डॉलर (5,00,000 करोड़ रु.) का टाटा समूह तोप के कारोबार में कदम रखने वाला इकलौता नहीं है. सरकारी कंपनी ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) ने इस साल 6 दिसंबर को एक हफ्ते तक चले परीक्षण की समाप्ति पर अपने जबलपुर कारखाने में बनी पहली तोपों से फायरिंग की. ये गन सेना को मिलने वाली ऐसी 200 तोपों की पहली खेप में से हैं.
निजी क्षेत्र के फर्म भारत फोर्ज ने 155 एमएम की तोपों का एक टोड वर्जन (खींच कर ले जाने वाले) तैयार करने के लिए 2015 तक की समय सीमा निर्धारित की है. कंपनी के पुणे स्थित कारखाने में इसका निर्माण किया जा रहा है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) को उम्मीद है कि वर्ष 2014 तक उसकी डिजाइन की गई 155 एमएम की तोपें तैनात हो जाएंगी.
बोफोर्स तोपें खरीदने के बाद सेना पिछले 25 साल में कोई नई तोप नहीं खरीद पाई. वर्ष 1987 में बोफोर्स स्कैंडल की शुरुआत के बाद तोप खरीद सौदों में लगातार भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आने की वजह से नई खरीद ठप्प पड़ गई. रक्षा कर्मियों को घूस देने के आरोप में रक्षा मंत्रालय ने चार अंतरराष्ट्रीय तोप कंपनियों सोलतम, डेनेल, सिंगापुर टेक्नोलॉजीज काइनेटिक्स और रेइनमेटल को ब्लैकलिस्ट में डाल दिया.
बोफोर्स का स्वामित्व अब ब्रिटेन की कंपनी बीएई सिस्टम्स के पास है. पहले यह स्वीडेन की कंपनी थी. बोफोर्स इस बार भारतीय बाजार की प्रतिस्पर्धा से बाहर है क्योंकि उसे सबसे सस्ता विकल्प देने का भरोसा नहीं है.
पिछले पांच वर्ष में सेना ने लगातार अपने तोपखाने की घटती संख्या को लेकर चेतावनी दी है. आखिरकार पिछले साल डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने तेजी से हथियार हासिल करने के लिए देश के भीतर ही विकल्प देखने का निर्णय लिया. उसने ओएफबी से तोपों के निर्माण का काम शुरू करने को कहा. रक्षा मंत्री ए.के. एंटोनी ने ओएफबी के एक शताब्दी पुराने जबलपुर के गन कैरिज फैक्ट्री में 22 सितंबर को एक गन मैन्युफैक्चरिंग कारखाने का उद्घाटन किया.
सेना ने अब इस क्षेत्र में कई स्वदेशी खिलाडिय़ों के उतरने का स्वागत किया है. हालांकि उसे भारत निर्मित तोप हासिल करने में अब भी कम-से-कम पांच साल लग जाएंगे. निजी क्षेत्र ने विदेशों से तकनीक खरीद कर विकास में लगने वाले समय को घटाने की कोशिश की है. उदाहरण के लिए भारत फोर्ज ने अपनी स्वदेशी तोप के लिए ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड की तोप निर्माता कंपनियों से गन टेक्नोलॉजी खरीदी है. टाटा पावर ने सामरिक क्षेत्र के अपने दो प्रोजेक्ट्स से मिले अनुभवों का इस्तेमाल किया है.
वर्ष 2006 में उसे सेना के लिए 20 पिनाका मल्टी बैरल्ड रॉकेट लॉन्चर का करीब 172 करोड़ रु. का ऑर्डर हासिल हुआ था. दूसरा प्रोजेक्ट ट्रक पर रखे जाने वाली 105 एमएम तोपों से जुड़ा था. उसने गन और फायरिंग प्रणाली विदेश से आयात की है, लेकिन सटीक गोलाबारी के लिए फायर कंट्रोल सिस्टम और बैलिस्टिक्स जैसी तकनीक में खुद महारत हासिल की है.
रक्षा मंत्रालय के राजस्थान स्थित तोप परीक्षण रेंज को अपनी तोपों के फायरिंग परीक्षण के लिए सरकारी मंजूरी का इंतजार है. यदि ये तोपें सफल रहती हैं तो उन्हें सेना के लिए 814 ऐसी तोपों के करीब 8,500 करोड़ रु. के टेंडर में बोली लगाने का मौका मिल सकता है. कंपनी ने अपनी माउंटेड गन (तोपों) के स्वदेशी स्तर पर उत्पादन के लिए सरकार के सामने विस्तृत खाका पेश किया है. यह बोफोर्स की मनहूसियत से बाहर निकलने का रास्ता हो सकता है.

