उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद से मायावती राज का एक के बाद एक घोटाला सामने आ रहा है. ताजा मामले में गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) की महत्वाकांक्षी मधुबन बापूधाम आवासीय परियोजना में 157.90 करोड़ रु. के गैरजरूरी बिजली उपकरण खरीदने की बात सामने आई है.
मामले की आंतरिक जांच के बाद प्रमुख सचिव आवास को लिखे गए जीडीए उपाध्यक्ष के विभागीय पत्र में तत्कालीन जीडीए उपाध्यक्ष नरेंद्र कुमार, सचिव नरेंद्र कुमार चौधरी और मुख्य अभियंता अनिल गर्ग सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों को गंभीर वित्तीय धांधली और पद के दुरुपयोग का दोषी पाया गया है. 2,000 से अधिक फ्लैटों वाली मधुबन-बापूधाम परियोजना में धांधली का खुलासा ऐसे समय पर हो रहा है, जब पिछले महीने नवंबर में ही परियोजना में मकान आवंटन के फार्म भरे गए हैं.
जीडीए के उपाध्यक्ष संतोष कुमार यादव ने 11 अक्तूबर, 2012 को प्रदेश के प्रमुख सचिव (आवास और शहरी नियोजन अनुभाग) को पत्र लिखकर दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है. पत्र में उन्होंने लिखा, ‘‘आगणन समिति/निविदा समिति की अनुशंसा
पर तत्कालीन उपाध्यक्ष द्वारा दिनांक 24-07-2009 को पूरी डीपीआर में वर्णित समस्त कार्यों की निविदा आमंत्रित करने की स्वीकृति दी गई, जबकि उस समय तक मात्र 55-57 प्रतिशत भू-भाग पर ही प्राधिकरण का कब्जा था. तत्कालीन अधिकारियों, मुख्य अभियंता, वित्त नियंत्रक सचिव आदि के इस कृत्य से अनावश्यक रूप से प्राधिकरण को आवश्यकता न होने पर भी विद्युत सामग्री का क्रय करना पड़ा था. यह सामग्री वर्तमान में मुख्यतः खुले स्थान पर लगभग 2 वर्षों से पड़ी है तथा वर्षा आदि के प्रभाव से लगातार खराब हो रही है.
तत्कालीन अधिकारियों यथा मुख्य अभियंता, वित्त नियंत्रक, सचिव के इस अदूरदर्शी कृत्य से प्राधिकरण को अनावश्यक रूप से करोड़ों रुपए का नुकसान होने की प्रबल संभावना है.” पत्र के अंत में यादव ने सिफारिश की, ‘‘इस प्रकरण में उपरोक्त सभी अधिकारियों ने जानबूझकर अपने कर्तव्यों के निर्वहन में घोर लापरवाही की है. जिससे प्राधिकरण को करोड़ों रु. की वित्तीय क्षति पहुंची है तथा प्राधिकरण की छवि धूमिल हुई है. प्रथम दृष्टया प्राधिकरण को वित्तीय क्षति पहुंचाने के आरोप उपरोक्त अधिकारियों पर सिद्ध होते हैं. अतः अनुशंसा की जाती है कि इन अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए.”
पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें तो अफसरों की हड़बड़ी साफ नजर आती है. 23 जुलाई, 2009 को जूनियर इंजीनियर ने मुख्य अभियंता को निविदा आमंत्रण का प्रस्ताव भेजा. मुख्य अभियंता ने उसी दिन इस प्रस्ताव को अपने तकनीकी निजी सहायक (पीए टेक्निकल) को भेज दिया, जिसने एक दिन के भीतर ही सारी जांच भी कर ली और 24 जुलाई, 2009 को प्रस्ताव वापस मुख्य अभियंता को भेज दिया. इसी दिन निविदा आमंत्रण समिति ने प्रस्ताव का परीक्षण भी कर लिया और उपाध्यक्ष ने इसी तारीख में अपनी अनुमति भी दे दी.
तीन दिन बाद 27 जुलाई को निविदाएं मंगा ली गईं. यानी महज चार दिन में जीडीए ने इतनी बड़ी खरीद के प्रस्ताव की सारी जांच कर ली और निविदाएं मंगा लीं. चूंकि निविदाएं मंगाने के लिए एक तय समय देना जरूरी है, इसलिए एक महीने इंतजार किया गया. उसके बाद 24 अगस्त, 2009 को प्रि क्वालीफिकेशन बिड खोली गई.
31 अगस्त को प्राइज बिड खुला और बोली लगाने वाली कंपनियों की बोली रिजर्व प्राइज से 29 से 40 फीसदी तक अधिक पाई गई. इसी दिन मुख्य अभियंता ने बोलियों में मोलभाव करने के निर्देश दिए. अगले दिन 1 सितंबर को इस आशय का पत्र भेज दिया गया और उसी दिन कंपनियों ने पत्र का उत्तर भेजकर रिजर्व प्राइज से 5 से 28 फीसदी ऊपर की कीमत पर काम करने पर रजामंदी का पत्र भी जीडीए को सौंप दिया. इसी दिन मुख्य अभियंता के पीए टेक्निकल ने कंपनियों की पेशकश को उचित मान लिया और करार करने की सिफारिश कर दी. 3 सितंबर को प्रस्ताव टेंडर कमेटी के पास पहुंचा और उसने सिफारिश कर दी.
इसी दिन जीडीए उपाध्यक्ष ने इसे मंजूरी दे दी. इसी तारीख में सभी 10 टेंडर दे दिए गए. यानी चार दिन के अंदर वह सारा काम और जांच-पड़ताल निबटा ली गई, जिसे करने में कम से कम एक महीना लगता. इन 10 में से नौ टेंडर गाजियाबाद की कंपनी मेसर्स अनिल कुमार ऐंड कंपनी के खाते में गए. एक टेंडर विभोर वैभव इन्फ्रा प्रा. लि. को मिला. इन दो कंपनियों के अलावा एक और कंपनी मेसर्स एनकेजी इन्फ्रा लिमिटेड ने भी बोली लगाई थी.
खास बात यह रही कि सामान की खरीद शुरू होने के बाद तत्कालीन सहायक निदेशक स्थानीय निधि लेखा परीक्षा विभाग, प्रीति कृष्ण ने जीडीए के वित्त नियंत्रक को 12 जुलाई, 2010 के पत्र में लिखा कि वर्ष 2009-10 में 64,94,65,627 रु. मधुबन बापूधाम और कोयल एन्क्लेव परियोजनाओं में विद्युत सामग्री की खरीद पर निरर्थक खर्च किए गए. लेकिन इस पत्र को नजरअंदाज कर दिया गया.
19 अगस्त, 2010 को परियोजना से जुड़े कई सहायक अभियंताओं और अधीक्षण अभियंताओं ने अपनी फाइल नोटिंग में आपत्ति उठाई मगर उसे भी अनसुना कर दिया गया. उलटे, पत्र लिखने वाले तीन सहायक अभियंताओं राजकुमार, राजवीर सिंह और भूपेंद्र कुमार को इस काम से हटा दिया गया. सारे मानकों को ताक पर रखते हुए फर्मों को 95 फीसदी रकम का भुगतान भी कर दिया गया.
इस घोटाले के बारे में जीडीए उपाध्यक्ष संतोष यादव ने बताया, ‘मुझे जो कहना था मैंने प्रमुख सचिव को लिखे पत्र में कह दिया है. यह विभागीय मामला है. मैं अलग से इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा.’ वहीं प्रमुख सचिव आवास प्रवीर कुमार ने इंडिया टुडे से कहा, ‘‘मैं अभी इस विभाग में नया आया हूं. पूरे मामले की जानकारी लेने के बाद ही कोई टिप्पणी की जा सकती है.”
चूंकि आवास विभाग मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास है, ऐसे में अफसरों की चुप्पी को समझ जा सकता है. लेकिन उन लाखों लोगों के भरोसे का क्या होगा जिन्होंने जीडीए की साख पर भरोसा कर चंद रोज पहले ही इस परियोजना में मकान पाने के लिए फार्म भरे हैं. क्या विवादित परियोजना में मकान हासिल होने के बाद वे आश्वस्त हो पाएंगे कि भविष्य में कोई नर्ई आफत उनके सामने नहीं आएगी?

