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बुजुर्गों के आत्मसम्मान का एक घर

जोधपुर शहर की एक संस्था आस्था ने बुजुर्गों के लिए सुविधाओं से युक्त जो फ्लैट बनाए हैं, वे वृद्घाश्रम नहीं बल्कि बुजुर्गों के स्वाभिमान का ठिकाना हैं.

अपडेटेड 15 दिसंबर , 2012

यहां दो कमरों के सर्वसुविधायुक्त फ्लैट की कीमत महज ढाई लाख रु. है. इतनी कम कीमत के फ्लैट जिसकी कल्पना करना भी आज मुश्किल है, उसे सच बनाया है जोधपुर की आस्था नाम की संस्था ने. लेकिन इन फ्लैटों को हर कोई नहीं खरीद सकता है. ये खास तौर से उन बुजुर्गों के लिए बनाए गए हैं जिन्हें किसी-न-किसी वजह से अपने परिवार से दूर रहना पड़ रहा है. यहां वे सम्मान से जीते हैं और बीती बातों को भुला देते हैं.

आस्था  संस्था के अलग-अलग श्रेणी के इन फ्लैटों की कीमत भी अलग-अलग है. बुजुर्ग जीवन भर यहां उच्च सुविधाओं का आनंद उठा सकते हैं, जबकि उनके बाद फ्लैट संस्था का हो जाता है. किसी आम वृद्घाश्रम से अलग यहां का माहौल वृद्घजनों पर कैसा असर डालता है, यह 82 साल के किशनलाल अग्रवाल से पता चलता है, जो पिछले छह साल से यहां रह रहे हैं. अग्रवाल कहते हैं, ‘‘यहां आने पर मेरी उम्र 10 साल बढ़ गई.’’ सेवानिवृत्ति के बाद किशनलाल ने तीनों बेटों के बीच अपनी संपत्ति का बंटवारा कर दिया था.

हालांकि इसके साथ ही यह डर भी उनके मन में घर कर गया कि अब कहीं बच्चे उन्हें ही घर से बेदखल न कर दें. ढलती आयु में अपने स्वाभिमान को बचाए रखने की खातिर उन्होंने तय किया कि अब वे और उनकी पत्नी भगवती आस्था में ही रहेंगे. किशनलाल कहते हैं, ‘‘मैं असहाय और किसी पर निर्भर होकर नहीं रहना चाहता था.’’ उन्होंने ढाई लाख रु. में जिंदगी भर के लिए फ्लैट ले लिया है. अब उनके स्वाभिमान से भरपूर घरौंदे का पता है फ्लैट नंबर तीन, आस्था, जोधपुर.old age home

ऐसा नहीं है कि यहां रह रहे सभी बुजुर्ग अपने बच्चों के सताए हुए हैं या किसी मजबूरी के कारण यहां आए हैं. आस्था में सूरजदेवी परिहार जैसे बुजुर्ग भी हैं जो उम्र के इस पड़ाव पर अपने हिसाब से जीना चाहते हैं. फ्लैट एफ-5 में रहने वाली 93 साल की सूरजदेवी यहां की सबसे बुजुर्ग सदस्य हैं. यहां का माहौल उन्हें इतना भाया कि उन्होंने न केवल हमेशा के लिए यहां बस जाने का निश्चय किया बल्कि संस्था को 21 लाख रु. का डोनेशन भी दिया.

वे कहती हैं, ‘‘मैं यहां बहुत खुश हूं. अपने हिसाब से रहती हूं. सभी कामों के लिए नौकरानी रखी है.’’ सूरज देवी पिछले पांच साल से यहां रह रही हैं. उनका परिवार दिल्ली और कनाडा में रहता है. उनका जब मन करता है तो परिजनों से मिलने चली जाती हैं लेकिन इस जगह को वे नहीं छोडऩा चाहतीं.

फ्लैट एफ-4 में रहने वाली 72 साल की सुशीला अरोड़ा चारों बेटियों की शादी कर चुकी थीं. जब पति गुजर गए तो उनसे बड़े घर का सन्नाटा सहन नहीं हुआ. वे मकान बेचकर यहां आ गईं. सुशीला बताती हैं, ‘‘मेरे इस कदम से बेटियां नाराज हुईं.’’ लेकिन अब बेटियों को भी तसल्ली हो चुकी है कि उनकी मां यहां खुश है.

मनचाहे तरीके से रहने की आजादी फलौदी के रहने वाले 76 साल के जीवणलाल राठी और उनकी पत्नी 73 साल की कांता देवी को बहुत अच्छी लगती है. मन हुआ तो खाना बना लिया नहीं तो आस्था में बना खाना तो इंतजार करता ही है. लेकिन राठी दंपती को परिवार की यादें अब भी रुला देती हैं. कांता देवी हंसते हुए बताती हैं, ‘‘बचपन में बेटा बड़ा शरारती था.’’ लेकिन अचानक उनकी आंखें भर आती हैं यह सोचकर कि उसी बेटे ने आखिर उन्हें रात के वक्त घर से क्यों निकाल दिया? उस घटना को पांच साल बीत गए. तब से राठी दंपती का ठिकाना यही है.

आस्था की शुरुआत 2007 में जोधपुर के व्यवसायी भगवान सिंह परिहार ने की थी, जो खुद यहां के फ्लैट-1 में रहते हैं. बुजुर्गों के लिए फ्लैट बनाने के पीछे अपनी सोच की वजह बताते हुए वे कहते हैं, ‘‘संयुक्त परिवार टूट रहे हैं. यही बदलाव इस विचार की नींव बना.’’ आस्था  में अमीर, मध्यम और गरीब वर्ग के लोगों के मुताबिक तीन श्रेणी के घर हैं. पहली श्रेणी के 18 फ्लैट हैं जो दो कमरे वाले हैं और इनमें अन्य फ्लैटों के मुकाबले ज्यादा सुविधाएं हैं. दूसरी श्रेणी के 28 फ्लैट हैं जिनमें एक कमरा है. तीसरी श्रेणी में आते हैं 27 डॉर्मिटरी बेड. यहां बगीचा है, फिजियोथेरपी सेंटर है, लाइब्रेरी है, चिकित्सक है और मनोरंजन केंद्र भी है. यहां के निवासियों के लिए गाडिय़ां भी उपलब्ध हैं.

संस्था यहां रहने वालों को साल में एक बार धार्मिक स्थल की यात्रा पर भी ले जाती है. लेकिन अकेले अपने दम पर इतनी सारी व्यवस्था आखिर कैसे हो पाती है. संस्थापक परिहार कहते हैं, ‘‘जोधपुर अच्छे लोगों का शहर है. यहां बिन मांगे ही पैसे और आवश्यक सामान मिल जाता है.’’ तभी तो आस्था ने हर बुजुर्ग के लिए अपने दरवाजे खोल रखे हैं.

64 साल की शांति के जीवन में सुकून आया जब वे यहां आ गईं. बहू ने उनका जीना दूभर कर दिया था. तभी उन्हें किसी परिचित से आस्था के बारे में पता चला. एक दिन वे सत्संग का बहाना बनाकर घर से निकलीं और यहां आ गईं. चार साल से वे डॉर्मिटरी में रह रही हैं जहां रहना-खाना नि:शुल्क है. यहां उन्हें किसी चीज की तकलीफ नहीं. हां, बस बेटे की याद मन से नहीं जाती. शांति बताती हैं, ‘‘बेटा 4 साल में एक दिन भी मिलने नहीं आया.’’ खैर, बीती हुई बातों को भुलाना आस्थावासियों ने सीख लिया है. आस्था के कारण इंसानियत में उनकी आस्था कायम है और जीवन में नई ऊर्जा भी भर गई है.

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