scorecardresearch

2जी घोटाला: आंकड़ों के फेर में उलझने की कोशिश

देश की बेशकीमती संपदा लगभग मुफ्त में देने के बाद अब सरकार सीएजी के एक पूर्व अधिकारी के बयानों से राहत महसूस कर रही है. सीबीआइ का 31,000 करोड़ रु. के घाटे का अनुमान सच के करीब है.

अपडेटेड 10 दिसंबर , 2012

यह बात देश जानना चाहता है कि किस तरह 2,645 करोड़ रु. का घाटा 1.76 लाख करोड़ रु. के अनुमानित घाटे में तब्दील हो गया.” चंडीगढ़ में 24 नवंबर को संवाददाता सम्मेलन में सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी कुछ इस तरह गरजे. इससे ठीक एक दिन पहले नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) कार्यालय से सेवानिवृत महानिदेशक आर.पी. सिंह ने अपने पुराने दावे को दोहराया था कि उनकी जांच के तरीके में 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में अनुमानित घाटा सिर्फ 2,645 करोड़ रु. का था, जिसे सीएजी विनोद राय ने खारिज कर दिया था.

सिंह ने अपनी बातों में ऐसा भी इशारा किया कि लोक लेखा समिति (पीएसी) के अध्यक्ष और बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी ने सीएजी के आकलन को प्रभावित किया है. हालांकि जोशी ने इन आरोपों से इनकार किया है.

सिंह के आरोप ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी 2जी घोटाले पर अपनी अब तक की पहली टिप्पणी करने के लिए उत्साहित कर दिया. उन्होंने कहा कि सिंह की बातों से बीजेपी की कलई खुल गई है. सिंह ने बाद में अपने सांकेतिक आरोपों को यह कहते हुए वापस ले लिया कि मीडिया ने उनकी बातों को 'गलत ढंग से पेश’ किया. लेकिन इससे कांग्रेस पर कोई असर नहीं पड़ा और वह कपिल सिब्बल की कुख्यात ''जीरो लॉस थ्योरी” को दोहराने में जुट गई, जो दो साल पहले बुरी तरह पिट गई थी.

ऐसा करके पार्टी ने अपनी ही कलई खोल दी. तिवारी और सिंह के दावों के विपरीत सीएजी ने कभी यह कहा ही नहीं कि घोटाले में नुकसान की रकम 1.76 लाख करोड़ रु. ही थी. यह आंकड़ा तो सीएजी की रिपोर्ट में दिए गए चार अनुमानों से एक था (देखें बॉक्स: सीएजी ने क्या कहा). इस रिपोर्ट के पृष्ठ 54 को सावधानी से पढ़ें तो स्पष्ट होता है कि सीएजी ने अपने इन चार अनुमानों में से किसी एक अनुमान के एकदम सही होने पर कोई जोर नहीं दिया.

रिपोर्ट में कहा गया है, ''ऑडिट में यह फिर दोहराया जाता है कि 2जी स्पेक्ट्रम की सही कीमत सिर्फ बाजार आधारित प्रभावी प्रक्रिया से तय हो सकती थी, जिसके अभाव में ये (चार अनुमान) ऐसे संकेतक हैं, जो इशारा करते हैं कि सरकार को संभवत: कितना नुकसान हुआ होगा.”

सीएजी अपने उद्देश्यों को लेकर एकदम पारदर्शी था. रिपोर्ट के पृष्ठ 56 पर कहा गया है, ''ऑडिट की कोशिश सिर्फ यही उजागर करना है कि खुले बाजार की प्रक्रिया से स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने पर कहीं ज्यादा कीमत मिलती और उससे सरकार की आमदनी ज्यादा होती.”

अगर तिवारी ने रिपोर्ट का चैप्टर 6 पढ़ा होता तो उन्होंने यह भी देखा होता कि सीएजी ने एक ओर जहां घाटा होने की बात बिल्कुल साफ शब्दों में कही, वहीं घाटे के अनुमान पर उन्होंने खुली बहस का स्वागत किया. रिपोर्ट में कहा गया, ''2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में सरकारी खजाने को नुकसान होने की बात नकारी नहीं जा सकती. पर नुकसान की रकम कितनी थी, इस पर बहस संभव है.”

ऑडिटर ने अंतिम रूप से जो चार अनुमान सामने रखे थे, उनके बारे में सिंह का दावा है कि उन्होंने मई, 2010 में सीएजी को लिखित रूप से इन्हें खारिज करने के लिए कहा था. सिंह के मुताबिक उन्होंने एसटेल के खुले प्रस्ताव के आधार पर किए गए आकलन को इसलिए नकारा क्योंकि यह प्रस्ताव हाइकोर्ट में वापस ले लिया गया था.

उन्होंने 1.76 लाख करोड़ रु. के मूल आंकड़े को भी नकार दिया. अगर सिर्फ 122 लाइसेंसों के लिए देखें तो वह आंकड़ा दरअसल 1.02 लाख करोड़ रु. का था जबकि 2007 में दिए गए 35 दोहरी तकनीक वाले लाइसेंसों और 6.2 मेगाहर्ट्ज की तय सीमा से अधिक स्पेक्ट्रम आवंटन से होने वाले घाटे का अनुमान 74,000 करोड़ रु. था. उनका तर्क यह था कि 2जी स्पेक्ट्रम की कीमत की तुलना 3जी स्पेक्ट्रम से नहीं की जा सकती. सुप्रीम कोर्ट ने 122 जीएसएम लाइसेंसों को रद्द करते हुए फरवरी, 2012 में इस तर्क को नकार दिया.

सिंह ने सीएजी की चार पद्धतियों में दो सबसे तार्किक पद्धतियों को भी खारिज किया. सीएजी के ये दो आकलन यूनिटेक और स्वान की इक्विटी बेचे जाने की कीमत पर आधारित थे. दोनों ने लाइसेंस पाने के 12 महीनों में ही विदेशी निवेशकों को हिस्सेदारी बेची थी. सिंह का तर्क है कि ये दोनों मामले वैध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) के थे, जिन्हें वित्त मंत्रालय से स्वीकृति भी मिली थी और इनमें निजी कंपनियों को न तो कोई फायदा हुआ न ही सरकार को कोई घाटा हुआ. सिंह का यह तर्क भी बेदम है.

दोनों कंपनियों के पास स्पेक्ट्रम के अलावा कोई और संपत्ति नहीं थी, न ही टेलीकॉम क्षेत्र के बारे में कोई विशेषज्ञता थी. टेलीनॉर और एतिसलात ने अक्तूबर और दिसंबर, 2008 में किए गए इक्विटी सौदों में 1,658 करोड़ रु. (तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा ने जो शुल्क लगाया था) से काफी ऊंची कीमत पर इक्विटी हिस्सेदारी खरीदी.

साफ है कि 2008 में राजा ने स्पेक्ट्रम की जो कीमत लगाई, उसके मुकाबले बाजार ने उस स्पेक्ट्रम की काफी ऊंची कीमत दी. सीएजी ने यूनिटेक की हिस्सेदारी बेचे जाने की कीमत के आधार पर 57,000 करोड़ रु. का और स्वान की हिस्सेदारी के आधार पर 69,000 करोड़ रु. के नुकसान का आकलन रखा था.

सीएजी ने कुल घाटा जोड़ते समय 2007 में 2001 की कीमत पर दिए गए दोहरी तकनीक वाले 35 लाइसेंसों और 6.2 मेगाहर्ट्ज की तय सीमा से ज्यादा मिले स्पेक्ट्रम की कीमत को भी लिया था. हम कुल घाटे में से इन्हें हटा भी दें तो सुप्रीम कोर्ट ने जिन 122 लाइसेंसों को रद्द किया, उनसे होने वाला नुकसान यूनिटेक की 67.25 फीसदी हिस्सेदारी टेलीनॉर को बेचे जाने की कीमत के आधार पर 40,000 करोड़ रु. और स्वान की 50 फीसदी हिस्सेदारी एतिसलात को बेचने के आधार पर 33,000 करोड़ रु. होती है. ये दोनों आंकड़े सीबीआइ के 31,000 करोड़ रु. के अनुमानित नुकसान के करीब हैं. शून्य नुकसान का सिद्धांत आज भी उतना ही खोटा है, जितना दो साल पहले था.

Advertisement
Advertisement