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ग्वालियर: विमान के लिए जमीन कहां

लंबे समय से सिविल एयरपोर्ट की बाट जोह रहे ग्वालियर शहर का यह सपना फिलहाल सच होता नहीं दिख रहा. एयरपोर्ट बनाने के लिए चुनी गई दो जमीनें एक के बाद एक विवाद में पड़ चुकी हैं.

अपडेटेड 4 दिसंबर , 2012

लंबे समय से सिविल एयरपोर्ट की बाट जोह रहे ग्वालियर शहर का यह सपना फिलहाल सच होता नहीं दिख रहा. एयरपोर्ट बनाने के लिए चुनी गई दो जमीनें एक के बाद एक विवाद में पड़ चुकी हैं. भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) प्रस्तावित एयरपोर्ट के लिए प्री-फिजिबिलटी रिपोर्ट दे चुका है लेकिन जब तक जमीन का मामला नहीं सुलझेगा तब तक सिविल एयरपोर्ट की योजना परवान नहीं चढ़ पाएगी.

दरअसल ग्वालियर का हवाई यातायात पूरी तरह वायुसेना स्टेशन के रनवे पर निर्भर है. वायुसेना अपनी शर्तों और सुविधा के हिसाब से ही सिविल विमानों को उतरने की अनुमति देती है. यही वजह है कि ग्वालियर से ज्यादा शहरों के लिए उड़ानें नहीं है. अंतरराष्ट्रीय स्तर के सिविल एयरपोर्ट की जरूरत को पूरा कररने के लिए विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (साडा) की काउंटर मैग्नेट सिटी को चुना गया. ग्वालियर में एयरपोर्ट निर्माण में एएआई को भी खासी दिलचस्पी थी क्योंकि वह दिल्ली में बढ़ते एयर ट्रैफिक को कम करने के लिए पहले से विकल्प की खोज में था. बड़ी जमीन की उपलब्धता, सड़क तथा रेलमार्ग से दिल्ली की कम दूरी ग्वालियर के पक्ष में रही.

इस साल सितंबर माह में एएआई के अधिकारियों ने एयरपोर्ट के लिए प्रस्तावित काउंटर मैग्नेट सिटी के दुगनावली इलाके की जमीन का सर्वे किया तो पता चला कि इस पर तो थल सेना दावा जता रही है. सेना का दावा है कि यह जमीन 1992 से उसके पास है. जबकि स्थानीय प्रशासन के मुताबिक 2000 में उसने यह जमीन साडा को काउंटर मैग्नेट सिटी बनाने के लिए दी थी. फिलहाल इस मामले में सेना ने कलेक्टर न्यायालय में रिव्यू पिटीशन दाखिल की है.

एएआई जमीन विवाद में नहीं पडऩा चाहता था इसलिए उसने दुगनावली की जगह काउंटर मैग्नेट सिटी की ही कुलैथ ग्र्राम की जमीन को चुना. एएआई के कार्यकारी निदेशक डी.पी.सिंह कहते हैं, ''कुलैथ की जमीन मौसम और हवा के लिहाज से एयरपोर्ट के लिए अनुकूल है. '';

एएआई को कुलैथ की जमीन और भी उपयुक्त इसलिए लगी क्योंकि यहां मौजूद 4000 मीटर लंबे और 600 मीटर चौड़े एक आयताकार हिस्से का रनवे के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन 300 हेक्टेयर में फैली इस जमीन के साथ दिक्कत यह है कि यहां 86 हेक्टेयर जमीन पर जंगल है और किसी भी तरह के निर्माण के लिए वन विभाग की अनुमति लेनी होगी.

साडा के अध्यक्ष जय सिंह कुशवाह आशा जताते हैं , ''वन विभाग जमीन देने के लिए राजी हो जाएगा अगर राज्य सरकार बदले में उसे दूसरी जमीन देने को तैयार हो. '' लेकिन यह इतना आसान नहीं है. इलाके के कई प्रोजेक्ट वन विभाग की अनुमति नहीं मिलने के कारण अटके हुए हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, गुना-इटावा रेल लाइन, जिसका निर्माण दो दशक पहले शुरू हुआ था और वन विभाग की दखल के चलते आज तक पूरा नहीं हो पाया.

जमीन मिलने के बाद की राह भी आसान नहीं होगी. एएआई को केंद्रीय उड्डयन मंत्रालय, गृह मंत्रालय, मौसम विभाग, डीजीसीए और वायुसेना से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना होगा. यह तय करने में भी वक्त लगेगा कि एयरपोर्ट पीपीपी मॉडल पर बनेगा या बीओटी मॉडल पर. बहरहाल, यह तो साफ है कि ग्वालियर का ''अपना एयरपोर्ट'' का सपना जल्द पूरा नहीं होगा.

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