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शेखावाटी हवेलियां: चित्र अजूबे पर हवेली बदहाल

सदियों पुराने भित्ति-चित्रों से सजी राजस्थान के शेखावाटी की हवेलियां देखने के लिए फ्रांसीसी पर्यटकों का जमावड़ा. हवेलियों की देखभाल के अभाव में इन चित्रों का भविष्य अंधकार में.

अपडेटेड 4 दिसंबर , 2012

मंडावा दिल्ली-बीकानेर मार्ग का मिड प्वाइंट है, लेकिन यहां के दर्जन भर से ज्यादा होटलों में विदेशी सैलानियों के एक रात बिताने की वजह कुछ और है. ये हैं शेखावाटी  की दो दर्जन से ज्यादा हवेलियां. जो भी सैलानी इन्हें देखते हैं, वे दूसरी बार आने की योजना यहीं से बनाने लगते हैं.

फ्रांस के मैकेनिकल इंजीनियर डेमियन और उसकी वकील प्रेमिका जेसी कैंडल डिनर के वक्त इस बात पर अफसोस जाहिर कर रहे हैं कि फ्रांस के लिए उड़ान भरने को अगले ही दिन उन्हें चले जाना है. ‘‘हमारे पास और छुट्टियां होतीं तो रेत के टीबों के बीच की इन हवेलियों में शानदार ढंग से समय बिताया जा सकता था.” डिनर से ध्यान हटाकर यह जोड़ा सबसे पहले शेखावाटी फ्रेस्को नाम की किताब को धन्यवाद देता है, जिसे पढ़कर वे यहां आए. आगे की बात जेसी बोलती हैं, ‘‘यहां की हवेलियां दूसरी हवेलियों से बिल्कुल अलग हैं, खासकर इस तरह की फ्रेस्को पेंटिंग तो पहले कभी नहीं देखी.”Tourism

एक ‘ओपन आर्ट गैलरी’ के नाम से देश-विदेश में पहचान बना चुका शेखावाटी आज यूरोपीय पर्यटकों खासकर फ्रांसीसियों की पहली पसंद बन गया है. यहां आने वाला हर तीसरा पर्यटक फ्रांसीसी होता है. यकीन न हो तो पर्यटन विभाग के आंकड़े देख लें. शेखावाटी के तीन जिलों (सीकर, चूरू, झंझुनूं) में से अकेले झंझुनूं में पिछले साल 36,000 से ज्यादा विदेशी सैलानी आए. इनमें से 14,000 से ज्यादा फ्रांसीसी थे. सवाल यह है कि शेखावाटी पर ही फ्रांसीसियों का दिल क्यों रीझ रहा है?

ये भित्ति चित्र 150 से 200 साल पुराने हैं. इन्हें दीवार पर चूने का प्लास्टर करते वक्त बनाया जाता था. पत्थर की पिसाई कर उन्हें पेड़-पौधों की पत्तियों और प्राकृतिक रंगों के साथ गीले प्लास्टर में मिलाकर तालमेल से पेंटिंग हवेली की दीवारों पर उकेरा जाता था. गीले प्लास्टर में ये रंग पूरी तरह समा जाते थे. इस तरह के रंग फैलने की बजाए अंदर तक जड़ पकड़ कर लेते थे. तभी तो 200 वर्ष पुरानी ये पेंटिंग आज भी नयनाभिराम हैं.

यहां के होटल व्यवसायी दिनेश धाभाई मानते हैं, ‘‘दुनिया में सबसे ज्यादा कला प्रेमी फ्रांसीसी लोग ही होते हैं. दूसरी ओर इस तरह की फ्रेस्को पूरी दुनिया में कहीं भी नहीं है, इसलिए ये लोग यहां आते हैं.’’ फ्रेस्को के अलावा यहां की बड़ी-बड़ी हवेलियां, बेमिसाल बनावट, उत्कृष्ट कारीगरी, भित्ति चित्रों में राधा-कृष्ण, रामायण, महाभारत के चित्र, ढोला-मारू के अमर प्रेम प्रसंग के अलावा यहां की लोक रीतियां वगैरह को फ्रेस्को में उकेरा गया है.

शेखावाटी की ये हवेलियां गोयनका, सिंघानिया, पोद्दार और मोरारका जैसे देश के बड़े उद्योगपति/करोड़पति घरानों की हैं जहां अरसा पहले वे रहते थे. अब व्यवसाय के चलते ये घराने बाहर चले गए हैं.

मंडावा में चोखानी, गोयनका, लढिय़ा, सनेहराम लढिय़ा, मुर्रमुरिया, नेवतिया और झुनझुनवाला की हवेलियां पर्यटकों की पहली पसंद हैं. इनमें से कइयों को देखने के लिए शुल्क तय है तो कई में प्रवेश निःशुल्क है. ये हवेलियां तकरीबन 150 वर्ष की उम्र पार कर चुकी हैं.

मंडावा के अलावा नवलगढ़, झंझुनूं, फतेहपुर, मंडेला, रामगढ़, महनसर, चिड़ावा, चूरू, पिलानी, मुकुंदगढ़, डूंडलोद और सीकर की हवेलियां आज प्रदेश की विरासत का हिस्सा बन चुकी हैं, जो विदेशी पर्यटकों को लुभा रही हैं. कई हवेलियां तो बिक चुकी हैं, जिन्हें खरीदारों ने मरम्मत करवाकर होटल की शक्ल दे दी है.

मंडावा में पर्यटकों का आना-जाना 1990 में शुरू हुआ. प्रदेश के नीमराणा किले के मालिक अमन ने ’80 के दशक में अपने एक फ्रांसीसी दोस्त वाजियां के साथ मिलकर शेखावाटी के फ्रेस्को चित्रों पर शेखावाटी फ्रेस्को नाम से एक किताब लिखी. यूरोप खासकर फ्रांस में यह किताब काफी लोकप्रिय हुई. इसी को पढ़कर बहुंत-से फ्रांसीसी मंडावा के लिए कूच करते हैं.

इन हवेलियों की बेजोड़ स्थापत्य कला और नयनाभिराम रंग-बिरंगी चित्रकारी के साथ एक दुखद पहलू भी जुड़ा है. मंडावा की लढिय़ा हवेली में एक फ्रांसीसी परिवार दीवारों पर नजरें गड़ाए चित्रों को निहार रहा था. यह घुमक्कड़ परिवार साल में दो महीने घूमने पर खर्च करता है. इसी परिवार की सीवी विंसेंट को फ्रेस्को का नीला रंग बहुत आकर्षित करता है. उनके पति सीवी मार्टिन बगल के दूसरे चित्र देखने में मसरूफ थे. चित्र कैसे लगे? इस सवाल का उन्होंने जो जवाब दिया, वह सचमुच सोचने को मजबूर करता था. ‘‘फ्रेस्को के बारे में सुना और परिवार को लेकर यहां देखने आ गया. लेकिन मुझे लगता नहीं कि मेरी आने वाली पीढिय़ां भी इसे देख पाएंगी. तब तक ये शायद बचेंगी ही नहीं.” इसके बाद वे हंसते हुए जोड़ते हैं, ‘‘अच्छा हुआ,  मैं अपने दोनों बच्चों को साथ लेता आया.”

मार्टिन की टिप्पणी एक बड़े सच को बयान करती है. मंडावा में दुनियाभर से आने वाले सैलानियों की संख्या में बेशक इजाफा हो रहा है लेकिन दूसरी ओर यह कहना मुश्किल है कि उन्हें आकर्षित करने वाली हवेलियां और उनकी दीवारों पर मोहित करने वाले भित्ति चित्र कब तक कायम रह सकेंगे?  क्योंकि इन हवेलियों को न तो उनके मालिकों की तरफ से कोई मदद मिल रही है और न ही किसी तरह की सरकारी सहायता.

मंडावा के ही होटल हेरिटेज के मालिक मधुसूदन खेमानी इन हालात को एक संदर्भ में रखने की कोशिश करते हैं, ‘‘सरकार को यहां पर्यटन के लिए अलग से कुछ करने की जरूरत ही नहीं. वह तो बस जो है उसी को बचा ले तो काफी है.” कनाडा से आए जोहान और चाल्र्स भी हवेलियों में घूमते हुए इनके भविष्य को लेकर अपनी आशंका जाहिर करते हैं, ‘‘ये हवेलियां सचमुच अनूठी और बेशकीमती हैं. इनकी देखभाल बहुत जरूरी है वरना देखने को यहां कुछ भी नहीं बचेगा.”

दरअसल इन हवेलियों पर सरकार का कोई अधिकार नहीं है. दूसरी ओर कुछेक हवेलियों को छोड़कर बाकी के मालिक इनकी खैर-खबर नहीं ले रहे हैं. हालांकि मालिकों ने चैकीदार के भरोसे इन्हें पयर्टकों के लिए जरूर खोल दिया.

पर्यटन महकमे की उप-निदेशक डॉ. पुनीता सिंह बताती हैं, ‘‘मंडावा की छतरियों पर काम करवाया गया है.” और हवेलियां? ‘‘इसके लिए जरूरी है कि हवेलियों के मालिक उनके संरक्षण/विकास का प्रस्ताव लेकर आएं. हमारा महकमा इसके लिए पूरी तरह से तैयार है.” दरअसल, इन हवेलियों के मालिक इस अंदेशे के शिकार हैं कि कल को सरकार हवेलियों पर मालिकाना हक न जताने लगे. ऐसे में दोनों पक्षों को बैठकर इस दिशा में कोई बीच का रास्ता निकालना होगा, वरना कुछ साल बाद यही कहने को बचेगा कि मंडावा कभी अपने भित्ति चित्रों के लिए दुनिया भर में मशहूर था.

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