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छठ में जानलेवा साबित हुई लापरवाही

बिहार में छठ के मौके पर हुआ हादसा प्रशासन की घोर लापरवाही का नतीजा है. ऐसे हादसे पहले भी हुए हैं लेकिन उनसे कोई सबक नहीं लिया गया.

अपडेटेड 4 दिसंबर , 2012

शाम के करीब पौने पांच बजे थे जब बंगाली टोला के रोशन साह परिवार सहित छठ पूजा कर महेंद्रू घाट से लौट रहे थे. लेकिन साह सहित सभी लोगों को अदालत घाट के पीपा पुल की ओर मोड़ दिया गया क्योंकि महेंद्रू घाट का चचरी पुल धंसने लगा था. लोग पुल की संकरी निकास गली से निकल रहे थे तभी कुछ लोगों को करंट लगने की खबर फैली और अफरा-तफरी मच गई. इसी समय बिजली गुल हो गई. इस भगदड़ में कई लोगों की मौत हो गई.

परिवार से बिछड़ गए रोशन पत्नी और पांच बच्चों को ढूंढने लगे. तीन बच्चे सोनाली, सोनम और अर्जुन तो मिल गए, लेकिन पत्नी मंजू और दो बच्चे करण, नंदिनी वहां नहीं मिले बल्कि पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पीएमसीएच) में लाशों के ढ़ेर में पड़े मिले. घटना के अगले दिन उन्हें मुआवजे के रूप में सरकार की ओर से दो-दो लाख रु. के तीन चेक मिल गए. रोशन चेक हाथ में लिए कहते हैं, ''इसे ले लो और मेरे परिवार को लौटा दो. ''Chhath

19 नवंबर को छठ के मौके पर हुई इस घटना की वजह आपदा कुप्रबंधन और प्रशासनिक लापरवाही है जिसका नतीजा आम लोगों को चुकाना पड़ा. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस हादसे में 17 लोगों की मौत हुई है. मृतकों की संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है.

इसे विडंबना ही कहेंगे कि घटना के एक दिन पहले ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घाटों का जायजा लिया था. उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, नगर विकास मंत्री डॉ.प्रेम कुमार और खाद्य और आपूर्ति मंत्री श्याम रजक भी तैयारियों का जायजा लेकर संतुष्ट हो चुके थे.

पटना में हर साल करीब चार लाख श्रद्घालु छठ पूजा में शामिल होते हैं. श्रद्घालुओं की संख्या के लिहाज से घाट कम हैं. साल 2011 में पटना के जिला प्रशासन ने कुल 70 घाटों में से 21 को और 2012 में 31 घाटों को असुरक्षित घोषित किया था. खस्ताहाल घाट और लचर आपदा प्रबंधन ने हादसे को न्यौता दिया. महेंद्रू घाट के चचरी पुल पर खासतौर से छठ के लिए एक लाख 36 हजार रु. खर्च किए गए थे, लेकिन वह भी इसे धंसने से नहीं बचा पाए.

कमियों से सबक लेने के बजाए अब सरकार उन पर परदा डालने में जुट गई है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं, ''हादसा की वजह चचरी पुल का टूटना या करंट फैलना नहीं है. बल्कि यह हादसा भगदड़ मचने से हुआ है. '' जबकि प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो आपदा प्रबंधन दुरूस्त होता तो मृतकों की संख्या कम होती. हादसे में बाल-बाल बचे बाकरगंज निवासी चंद्रभूषण बताते हैं, ''भगदड़ में कुचल गए महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को बचाने वाला कोई नहीं था. स्थानीय लोगों ने घरों के दरवाजे खोल दिए, जिससे कई लोग बच गए.''

छठ के मौके पर प्रशासन ने पुख्ता सुरक्षा इंतजाम के दावे किए थे. मसलन, घाटों पर एंबुलेंस, मेडिकल टीम और अग्निशामक मौजूद रहेंगे, नदी में 32 मोटरबोट लगातार गश्त करेंगी. लेकिन आपदा के वक्त ये इंतजाम बेकार साबित हुए. अब तो प्रदेश के स्वास्थ्य संघ के महासचिव डॉ. अजय कुमार भी मान रहे हैं कि इमरजेंसी सुविधा के नाम पर बिहार काफी पिछड़ा हुआ है.

घाट पर भारी अव्यवस्था के बाद पीडि़त लोगों को राज्य के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच में चरमराई व्यवस्था से दो-चार होना पड़ा. कहने को तो यहां पर इमरजेंसी सेवा में 20 डॉक्टरों को ड्यूटी पर लगाया गया था लेकिन घायलों की देखरेख के लिए वे कहीं नजर नहीं आ रहे थे. हथुआ मार्केट के निवासी डेढ़ साल के ऋतिक के परिजनों को विश्वास ही नहीं होता कि उनका नन्हा अब कभी आंखे नहीं खोलेगा. ऋतिक के घरवालों का आरोप है कि उसे समय पर इलाज नहीं मिला नहीं तो आज वह जिंदा होता. अव्यवस्था से नाराज मृतकों के परिजनों ने अस्पताल के इमरजेंसी वॉर्ड में हंगामा मचाना और तोडफ़ोड़ करनी शुरू कर दी. जिसके बाद बिहार के पुलिस महानिदेशक अभयानंद को अस्पताल आकर स्थिति संभालनी पड़ी.

स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव व्यासजी  हंगामे के बावजूद अस्पताल के चिकित्सकों का बचाव करने में जुटे रहे. उन्होंने कहा, ''अस्पताल के चिकित्सक हंगामे और मारपीट के डर से मौके से हट गए थे. उन्हें समझा-बुझाकर इमरजेंसी सेवा जल्द ही बहाल करवा दी गई थी. ''

पुलिस महानिदेशक भी पुलिस बल के समर्थन में उतर आए. अभयानंद ने कहा, ''पुलिस ने हादसा होते ही बचाव और राहत कार्य शुरू कर दिया था. '' व्यास ने भी दावा किया कि छठ घाटों पर आपदा प्रबंधन की टीमें तैनात थीं, जिन्होंने जिम्मेदारी बखूबी निभाई.

हालांकि हादसे के पीड़ितों के घावों पर मरहम लगाने में मुख्यमंत्री ने जरा भी देर नहीं की. उन्होंने मृतकों के परिजनों को आपदा प्रबंधन कोष से डेढ़-डेढ़ लाख रु. और मुख्यमंत्री राहत कोष से पचास-पचास हजार रु. देने की घोषणा की और अगले ही दिन पीडि़त परिवारों को राशि उपलब्ध भी करवा दी गई. लेकिन फिर भी वे विरोधियों को बोलने से नहीं रोक पाए. एलजेपी प्रमुख रामविलास पासवान ने कहा, ''घाट पर कड़ी चौकसी होती तो यह घटना नहीं घटती. ''  तो आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने मुख्यमंत्री से पूछा, ''मुख्यमंत्री बताएं कि भगदड़ के लिए कौन जिम्मेदार है और दोषी लोगों पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाए. '' यादव ने आगे कहा कि, ''इससे बड़ी प्रशासनिक विफलता क्या होगी कि पीएमसीएच में कई जीवित लोगों को मृत घोषित कर दिया गया. ''

वैसे नीतीश कुमार से कड़े सवाल कर रहे लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान भी छठ के मौके पर बिहार में ऐसा हादसा हो चुका है. 1995 में इस पर्व के दौरान दानापुर के नारियल घाट पर नाव दुर्घटना में 62 लोगों की मौत हो गई थी, जिसमें एक ही परिवार के 17 लोग शामिल थे. तब बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद थे. इसके बाद, पिछले साल 27 अक्तूबर को भी छठ के मौके पर पटना के मनेर के शेरपुर घाट के समीप पांच लोगों की डूबने से मौत हो गई थी. इन घटनाओं से किसी भी तरह का सबक नहीं लिया गया. न तो घाटों की मरम्मत हुई न ही आपदा प्रबंधन दुरूस्त हुआ.

बहरहाल यह तो जांच के बाद ही साफ हो पाएगा कि लापरवाही किस स्तर पर हुई है. फिलहाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घटना की जांच गृह विभाग के प्रधान सचिव आमिर सुबहानी को सौंपी है.

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