आप इसे भूल नहीं सकते. उत्तर गुजरात के आसपास के ग्रामीण इलाकों के बीच उभरता एक छोटा-सा शहर, 2,500 वर्ष पुरानी एक सभ्यता से निर्मित जो अब इसकी जमीन के नीचे दफन है. यहां तक कि व्हेनसांग (चीनी में श्वांगझंग) की नजरों में भी यह शहर आया था. वे अपने सातवीं शताब्दी के सफरनामे सि-यु-कि (पश्चिमी दुनिया का बौद्ध रिकॉर्ड) में इसे विद्वानों के रहने लायक और ‘‘1,000 भिक्षुओं और 10 स्तूपों’’ वाली जगह बताते हैं.
वाडनगर को अब इन सबसे भी ज्यादा नरेंद्र मोदी के जन्मस्थान के रूप में जाना जाता है. वह व्यक्ति जिसे एक और बार मुख्यमंत्री बनने के लिए सबसे ज्यादा पसंद किया गया है और जो साफ तौर से प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में पहुंचने की अपनी तैयारी कर रहा है. चाय की दुकान चलाने वाले दामोदर दास मोदी और उनकी पत्नी हीराबेन (अब 84 वर्ष की) के सात बच्चों में से नरेंद्र मोदी तीसरे हैं.
आज वाडनगर को शायद सटीक तौर पर ‘मोदीनगर’ का नया नाम दिया जा सकता है. अहमदाबाद से 112 किमी दूर स्थित इस शहर में सार्वजनिक कार्य से लेकर परियोजनाओं तक, जो कुछ हुआ है, वह मोदी सरकार की निगरानी में हुआ है. यहां सड़कों पर घूमने वाले दुबले-पतले आवारा बच्चों से लेकर मोटे दुकानदारों तक, कांग्रेस समर्थकों से लेकर बीजेपी के प्रशंसकों तक, सभी ‘‘मोदी मंत्र’’ का जाप करते हैं. किंवदंती है कि कभी वाडनगर गुजरात की राजधानी हुआ करता था. ऐसे में यहां मोदी का जन्म लेना उपयुक्त ही लग रहा है.
25,000 से थोड़े ज्यादा की जनसंख्या वाला यह नगर निगम मोदी की इच्छाशक्ति की झ्लक दिखाता है. पिछले पांच साल में तो यहां जादुई बदलाव आया है: कंक्रीट के फुटपाथ के साथ गड्ड्ढामुक्त सड़कें, सौर ऊर्जा वाली स्ट्रीट लाइट जो समय के मुताबिक अपने आप जलती और बुझती हैं, 8 किमी लंबा रिंग रोड जो सुविधाजनक तरीके से शहर के सभी हिस्सों को जोड़ता है.
वाडनगर में एक सरकारी अस्पताल है जो साधन और सफाई के मामले में ज्यादातर निजी अस्पतालों को टक्कर देता है. एक नया मेडिकल कॉलेज एवं 150 बेड वाला अस्पताल भी बन रहा है. कई स्थानीय झीलों का सौंदर्यीकरण किया गया है और उन्हें जीवंत मनोरंजन स्थल में बदल दिया गया है. यहां स्थित गुजरात राज्य पर्यटन विभाग के एयरकंडिशंड होटल में ठहरने से पैसा वसूल हो जाता है.
यहां हिमालय इंटरनेशनल द्वारा करीब 175 करोड़ रु. की लागत का फूड प्रोसेसिंग यूनिट चलाया जा रहा है जिसमें भारत की सबसे बड़ी मशरूम प्रोसेसिंग यूनिट है. इसमें करीब 1,500 मर्दों-औरतों को रोजगार मिला हुआ है जो शहर के योग्य श्रमिकों का करीब 15 फीसदी है.
सुधीर जोशी कहते हैं, ‘‘वाडनगर आज नरेंद्र मोदी की दृष्टि की झलक पेश करता है.’’ आयुर्वैदिक इलाज करने वाले (वैद्य) जोशी का नरेंद्र मोदी के प्रति भरोसा वाडनगर स्थित बी.एन. हाइस्कू ल की पहली कक्षा में दोस्त बनने के समय से ही अब तक बना हुआ है. जोशी और मोदी के एक और सहपाठी कांग्रेस नेता नागजीभाई देसाई अपने इस साथी और उनकी ‘‘शुरुआती दौर से ही काबिलियत’’ के बारे में कई प्रिय यादें रखते हैं.
जोशी याद करते हुए बताते हैं कि मोदी ने नौवीं कक्षा में कक्षा प्रतिनिधि का चुनाव कई दिग्गज माने जाने वाले छात्रों को हराकर जीता था. उन्होंने कहा, ‘‘मुझे’’ आशंका थी कि वे हार जाएंगे. लेकिन वे कई प्रतिद्वंद्वी गुटों से मुकाबला करते हुए जीते और उन्होंने सहपाठियों से जो भी वायदे किए थे उसे पूरा कर शिक्षकों को भी प्रभावित किया.’’ अब कांग्रेस में होने के बावजूद देसाई तत्काल निर्णय लेने और कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति के मामले में मोदी की क्षमता को स्वीकार करते हैं. वे बताते हैं, ‘‘एक हस्तरेखा विशेषज्ञ ने कभी भविष्यवाणी की थी कि मोदी या तो एक महान संत बनेंगे या बड़े नेता.’’ वे संत तो नहीं बन सके, लेकिन देसाई का कहना है कि वह भविष्यवाणी ‘‘पूरी तरह से सही’’ साबित हुई है.
अपने पूर्व छात्र की सफलता से उत्साहित बी.एन. हाइस्कूल के शिक्षक खुशी से स्कूल के वर्षों पुराने एक आयोजन की ब्लैक ऐंड व्हाइट तस्वीर दिखाते हैं जिसमें 14 वर्ष के नरेंद्र मोदी 19वीं शताब्दी के काठी सेनापति जोगीदास खुमन की भूमिका निभा रहे हैं. जोगीदास ने भावनगर के शासकों के खिलाफ एक सैद्धांतिक सैन्य संघर्ष का नेतृत्व किया था.
वर्ष 1989 में पिता की मृत्यु होने के बाद अब वाडनगर से नरेंद्र मोदी के जुड़ाव के एकमात्र स्रोत उनके बड़े भाई 68 वर्षीय सोमभाई ही रह गए हैं. सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके सोमभाई अब एक आश्रम में बुजुर्गों और बीमारों की देखभाल करते हैं. उनके अन्य सभी भाई-बहन यहां से दूसरी जगहों पर चले गए हैं.
65 वर्षीय अमृतभाई एक निजी कंपनी की नौकरी से रिटायर हुए हैं, 57 वर्ष की वसंतीबेन एक कारोबारी से ब्याही गई हैं, 55 वर्षीय हंसमुखभाई जीवन बीमा निगम अधिकारी हैं, 52 वर्षीय प्रह्लाद गुजरात किराना दुकानदार संघ के अध्यक्ष हैं और सबसे छोटे पंकजभाई गांधी नगर स्थित राज्य सूचना विभाग में असिस्टेंट डायरेक्टर हैं. मोदी की मां हीराबेन उनके साथ गांधीनगर स्थित आवास में रहती हैं. वैसे तो मुख्यमंत्री आज इस परिवार को जोडऩे की सबसे मजबूत साझी कड़ी हैं, लेकिन सभी भाई-बहनों ने शायद ही कभी खुद के आगे बढऩे के लिए इस संपर्क का इस्तेमाल किया है.
मोदी की तरक्की पर गहरी नजर रखने वाले सोमभाई कहते हैं कि वे अपने छोटे भाई में प्रसिद्ध सायजीराव गायकवाड़ की छवि देखते हैं. सोमभाई ने एक शाही रियासत के रूप में ‘‘वडोदरा के आखिरी वर्षों’’ पर अध्ययन किया है. सोमभाई याद करते हुए बताते हैं कि वे युवा मोदी की तलाश में दो जगह जाया करते थे, शर्मिष्ठा झील के स्विमिंग पूल वाले छोर या पुरानी सरकारी लाइब्रेरी में. वे कहते हैं, ‘‘युवा-अवस्था में वे सिर्फ दो चीजें पसंद करते थे-तैराकी और पढ़ाई. उन्हें विवेकानंद के बारे में पढऩा सबसे ज्यादा पसंद था.’’
वाडनगर की गलियों में मोदी की कथित शादी कोई शर्मिंदा करने वाली गोपनीय बात नहीं है. ज्यादातर पुराने लोग यह बात जानते हैं और कई लोग इस पर बात करने से नहीं हिचकते. ‘‘नरेंद्रभाई की शादी उनकी मर्जी के खिलाफ तब ही कर दी गई थी, जब वे सिर्फ 18 वर्ष के थे. लेकिन अपने आदर्शों को बनाए रखने के लिए वे आरएसएस में शामिल हो गए. उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने अपनी पत्नी से क्षमा मांगते हुए यह शादी तोड़ दी. उनकी पत्नी बनासकांठा जिले के एक गांव में शिक्षिका हैं और तब से वे अपनी शादी के बारे में बात करने से बचती हैं.’’ एक सांस में कही गई इस बात से उससे तो ज्यादा ही जानकारी मिलती है जो मोदी के राजनैतिक विरोधी हाल के दिनों में यू-ट्यूब के माध्यम से प्रसारित करना चाहते थे.
राज्य में कहीं और उनके आलोचक हो सकते हैं, लेकिन वाडनगर में उनका आलोचक ढूंढना कठिन है. उनके प्रशंसकों के समूह ने राजनैतिक विचारधारा को ताक पर धर दिया है. इसमें पूर्व कांग्रेसी और तालुका प्रमुख दीवानजी ठाकुर (जो वाडनगर के विकास की वजह से नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं) से लेकर आरएसएस के कार्यकर्ता भरत मोदी तक हैं. भरत गुजरात के मुख्यमंत्री को ऐसा व्यक्ति मानते हैं जो ‘‘दीनदयाल उपाध्याय के सपने को पूरा कर रहा है.’’
यह वह जगह है जहां लगता है कि मोदी ने गुजरात के मुसलमानों के साथ अपनी दूरी को भी पाट लिया है. वाडनगर के बाहर स्थित मुस्लिम बहुल गांव मोलिकपुर के सरपंच अबू बकर भक्का कहते हैं, ‘‘जो कोई भी यह कहता है कि मोदी हिंदू और मुसलमानों के बीच भेदभाव करते हैं, उन्हें यहां आकर देखना चाहिए.’’ यह गांव कभी पिछड़ा हुआ करता था लेकिन पिछले पांच साल में इस गांव ने जो तरक्की की है, उसके बारे में कुछ साल पहले सोचा भी नहीं जा सकता था. एक नई चमचमाती सड़क, जिससे शहर से गांव की दूरी 8 किमी से घटकर सिर्फ 3 किमी रह गई है और हर घर तक पानी पहुंचाने वाली वाटर सप्लाई योजना, इनमें प्रमुख है.
बीजेपी के भीतर और बाहर, दोनों में मोदी के विरोधी उनके द्वारा अक्सर दिखाई जाने वाली प्रधानमंत्री बनने की दृढ़ आकांक्षा से डर जाते हैं. लेकिन वाडनगर में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो यह न मानता हो कि नरेंद्र मोदी एक दिन दिल्ली तक पहुंचेंगे और यह जल्द होगा.

