प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी. नारायणसामी को 11 नवंबर को जब बहुसदस्यीय महालेखा परीक्षक और नियंत्रक (सीएजी) का नया विचार कौंधा, तो यह साफ तौर पर विनोद राय को लेकर यूपीए सरकार की बढ़ती हताशा की ताकीद कर रहा था. इससे सरकार का यह डर भी सामने आया कि अगले कुछ महीनों में शायद कुछ और धमाकेदार रिपोर्ट देखने को मिलें.
ये संभावित रिपोर्ट सरकार की सामाजिक परियोजनाओं, नीतियों और कार्यक्रमों से जुड़ी हैं, जिन्हें 2008 में राय के इस पद पर आने से पहले तक सीएजी के दायरे से बाहर रखा गया था. राय ने पद संभालते ही संस्थान के चार्टर में लिखे उसके न्यायाधिकार क्षेत्र का हवाला देते हुए चार्टर को दोबारा पुष्ट किया और इन्हें अपने दायरे में ले आए. राय इस बार भी सरकार को आड़े हाथों ले सकते हैं क्योंकि वे अगले साल मई में सेवानिवृत्त होने को लेकर आश्वस्त हैं जब वे 65 साल के हो जाएंगे. चूंकि सीएजी संवैधानिक संस्था है, लिहाजा उसके नियम-कायदे से कोई भी छेड़छाड़ करने के लिए संसद की मंजूरी जरूरी होगी और ऐसा कोई भी संशोधन सदन के दो-तिहाई बहुमत से ही पारित हो सकता है जब दोनों सदनों के कुल सदस्यों के कम-से-कम आधे मौजूद हों और मतदान करें. यूपीए के लिए यह बड़ा मुश्किल होगा.
जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीनीकरण योजना (जेएनएनयूआरएम) की सीएजी रिपोर्ट राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास पहले ही भेजी जा चुकी है और इसे संसद के शीतकालीन सत्र में सदन में रखा जाएगा. इसके अलावा तैयार रिपोर्टों में मनरेगा, 2008 की किसान कर्ज माफी योजना की समीक्षा और उर्वरक सब्सिडी की रिपोर्ट है.
सीएजी के एक आला अधिकारी ने बताया, ‘‘ये सब सरकार को मुश्किल में डाल देंगी. जेएनएनयूआरएम की रिपोर्ट तो सत्र की शुरुआत में ही रखी जाएगी जबकि बाकी तीन आखिरी दिनों में रखी जाएंगी और बहुत देर हुई तो अगले साल के बजट सत्र तक इन्हें पेश कर ही दिया जाएगा.’’
सूत्रों के मुताबिक, एक लाख करोड़ रु. की जेएनएनयूआरएम परियोजना के ऑडिट में केंद्र द्वारा अनुदान के आवंटन में गड़बडिय़ां पाई गई हैं. सीएजी ने पाया है कि केंद्र ने कुछ ऐसे राज्यों को फंड जारी किया जिनकी शहरी इकाइयां जरूरी दिशा-निर्देशों को पूरा नहीं करती थीं. यह पाया गया कि कई मामलों में कोई काम ही नहीं हुआ है जबकि केंद्र अपनी बजटीय आवंटन को खर्च करने में लगा रहा.
कुछ मामलों में सीएजी ने टेंडर संबंधी दिशा-निर्देशों के उल्लंघन के चलते नुकसान की बात भी कही है. यह अनुदान राज्यों में शहरी ढांचे में सुधार संबंधी परियोनाओं के लिए दिया गया था. सात साल का यह मिशन 2005-06 में शुरू हुआ और दिसंबर, 2012 में 11वीं पंचवर्षीय योजना के साथ ही खत्म हो रहा है. अपनी विस्तृत समीक्षा में सीएजी ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया है.
यूपीए की एक लाख करोड़ रु. की एक और योजना मनरेगा भी लडख़ड़ा रही है. सीएजी ने अनुदानों को जारी किए जाने में भारी भ्रष्टाचार और विभिन्न स्तरों पर गंभीर अनियमिताएं और पैसे के दुरुपयोग की बात पाई है जिनमें ग्राम पंचायतें भी शामिल हैं. यह विडंबना है कि तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने इस योजना की सीएजी द्वारा जांच करवाए जाने को अक्तूबर, 2011 में मंजूरी दे दी क्योंकि सरकार ने इससे पहले सीएजी के चार्टर का हवाला देते हुए इस पर रोक लगा दी थी.
सीएजी ने मनरेगा के क्रियान्वयन में अनियमितताएं, फर्जी श्रमिकों के नाम पर पैसे हड़पने, भुगतान में देरी, बिना पैसे दिए काम करवाने और रिकॉर्ड के अनियमित रखरखाव संबंधी गड़बडिय़ां पाई हैं. यह भी पाया गया है कि कई राज्यों में इसे लागू करवाने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों ने ही योजना को हड़प लिया है और करदाताओं के पैसे की खुली बंदरबांट हुई है. इस रिपोर्ट से सरकार की परेशानी बढ़ सकती है.
सीएजी ने 65,000 करोड़ रु. की किसान कर्ज माफी योजना में भी गंभीर गड़बड़ी पाई है, जिसे कथित तौर पर चार करोड़ किसानों के लाभ वाली योजना माना जा रहा था. एक मुआयना रिपोर्ट के मसौदे में सीएजी ने संकेत दिए हैं कि इसके लाभार्थियों को बिना किसी नियम के चुन लिया गया और वे कुछेक जगहों से ही चुन लिए गए, और जिन्हें वास्तव में राहत चाहिए थी वे छोड़ दिए गए.
भारत कृषक समाज के अध्यक्ष अजय वीर जाखड़ ने इस योजना को करीब से देखा है. उन्होंने इंडिया टुडे को बताया कि यह योजना पूरी तरह से गड़बड़ थी. दिए गए कर्ज की जांच में पाया गया कि आधे से ज्यादा लाभार्थी कारोबारी और दूसरे लोग थे, जिनके पास खेती की अपनी जमीन है. उनके मुताबिक, 2009-10 के दौरान अधिकतर लाभार्थी दिल्ली और चंडीगढ़ से थे न कि छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब या बिहार से. उन्होंने यह भी बताया कि सरकारें सहकारी बैंकों को प्रोत्साहन देने की बजाए कर्ज देने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को प्रेरित कर रही थी.
यह पहली ऑडिट है जब सीएजी ने इस मामले से जुड़े बैंकों का बही-खाता भी जांचा है. सूत्रों के मुताबिक, मसौदा रिपोर्ट में लाभार्थियों की पहचान से जुड़ी गड़बडिय़ों की बात कही गई है. मसौदा रिपोर्ट कहती है कि ‘‘अयोग्य किसानों’’ ने ‘छोटे और सीमांत’ श्रेणी के योग्य किसानों की कीमत पर भारी लाभ अपनी जेब में कर लिए हैं. सीएजी ने पाया कि जिन किसानों ने समय पर लोन चुका दिया उन्हें कोई लाभ नहीं मिला जबकि जिनके कर्ज लंबे समय से डूब रहे थे उन्हें कर्ज माफी का लाभ मिल गया.
उर्वरकों की सब्सिडी पर भी सीएजी की रिपोर्ट यूपीए सरकार को शर्मिंदा कर सकती है. मसौदा रिपोर्ट कहती है कि 2007-08 और 2009-10 के बीच उर्वरक विभाग ने सब्सिडी के तौर पर 50,000 करोड़ रु. से ज्यादा दे दिए, जिसमें फर्मों द्वारा किए गए फर्जी दावों की सत्यता जांच प्रक्रिया को नहीं अपनाया गया.
जाखड़ कहते हैं कि यह नीति ही गलत है. उनके मुताबिक, ‘‘सरकार को किसानों की मिट्टी जांचने पर ध्यान देना चाहिए और फिर उन्हें बताना चाहिए कि कैसी फसल उगानी है और किस उर्वरक का इस्तेमाल करना है. इसकी बजाए उर्वरकों का मनमर्जी से बिना किसी हिसाब के इस्तेमाल होता है.’’ पिछले कुछ संसद सत्रों में 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन और कोयला ब्लॉक आवंटन पर सीएजी की रिपोर्ट ने जिस कदर हंगामा बरपा किया है, उसी तर्ज पर शीतकालीन सत्र के और बजट सत्र भी हंगामाखेज रहने के आसार हैं.

