ऊपर से देखने पर तो यही लगेगा कि यह ग्रामीण बच्चों के लिए अच्छे और योग्य शिक्षक पर्याप्त संख्या में मुहैया कराने की योजना है. दूसरे राज्यों की तरह राजस्थान सरकार ने भी शहरी शिक्षकों को गांवों में जाकर पढ़ाने के लिए भेजने का फैसला किया. इसके लिए अशोक गहलोत सरकार ने 2011 में सरकारी सहयोग प्राप्त शहरी स्कूलों और कॉलेजों से 40 फीसदी शिक्षकों को ग्रामीण इलाकों में जाना अनिवार्य कर दिया. इसके तहत जुलाई, 2011 में सरकारी सहयोग प्राप्त 71 निजी कॉलेजों और 1,122 निजी स्कूलों के 8,000 अनुभवी शिक्षकों और कर्मचारियों को गांवों में भेज दिया गया.
15 महीने बीत जाने के बाद तो यही लग रहा है कि इसका बड़ा घातक असर हुआ है. हालत यह है कि सरकारी सहायता प्राप्त निजी स्कूलों के करीब पांच लाख छात्र-छात्राएं शिक्षकों की अचानक आई भारी कमी से जूझने को मजबूर हैं, वहीं जिन शिक्षकों को गांवों में भेजा गया था उनका भी कोई खास उपयोग नहीं हो सका है क्योंकि इस फैसले के पीछे कोई स्पष्ट नीति नहीं थी.
जुलाई, 2011 में 740 शिक्षकों को 12 ग्रामीण कॉलेजों में भेजा गया, जहां कुल रिक्त पद सिर्फ 74 थे. नतीजा यह हुआ कि तब से 666 शिक्षक और कर्मचारी काम के अभाव में निठल्ले बैठे रहे और सरकार ने उनकी तनख्वाह पर 55 करोड़ रु. खर्च कर डाले. छह महीने तक इनके पास कोई काम नहीं रहा जबकि सरकारी अनुदान प्राप्त शहरी निजी स्कूलों/कॉलेजों के छात्र शिक्षकों के लिए तरसते रहे.
प्रभावित शिक्षकों और स्टाफ की ओर से मुकदमा लडऩे वाले वरिष्ठ वकील राज दीपक कहते हैं, ''यह तुगलकी फरमान था जिसमें नतीजों के बारे में सोचा ही नहीं गया. '' इस साल जनवरी में जाकर सरकार को गलती का अहसास हुआ. उसके बाद उसने शिक्षकों की तैनाती के नियमों में संशोधन कर के नगरीय निकाय इलाकों और जिला मुख्यालयों को जोड़ दिया. इससे ग्रामीण क्षेत्र के लिए बनाई गई विशिष्ट सेवा का मकसद ही खत्म हो गया.
1 नवंबर को सरकार ने ग्रामीण सेवा क्षेत्र के एक लेक्चरर को नोखा कस्बे से बीकानेर डिवीजनल मुख्यालय पर लगा दिया. यह संशोधन सरकार के लिए बहुत महंगा पड़ा है. सरकारी अनुदान में पहले 100 करोड़ रु. खर्च होते थे, अब सालाना खर्च 350 करोड़ रु. हो गया है. वजह? सरकारी वेतनमान में 75 फीसदी का इजाफा कर दिया गया है. इसके अलावा शिक्षकों की पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य लाभों की जिम्मेदारी भी सरकार के सिर पड़ गई है जबकि शिक्षकों की यह समूची फौज अगले 12 वर्षों में रिटायर होने जा रही है.
उच्च शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव राजीव स्वरूप ने इंडिया टुडे से कहा, ''हां, यह महंगा तो है लेकिन सरकारी अनुदान प्राप्त संस्थानों से मुक्ïत होने के लिए सरकार का यह नीतिगत फैसला था. ''
सुखाडिय़ा विवि (उदयपुर) के एक पूर्व प्रोफेसर बीसी मेहता का मानना है कि गांवों में शहरी शिक्षकों को भेजने के फैसले से सरकार ने अनुदान प्राप्त स्कूलों/कॉलेजों में पढ़ाई के निजी-सरकारी सहभागिता वाले पुराने आजमाए मॉडल को नष्ट कर दिया और मुनाफा कमाने वाले कॉरपोरेट मॉडल के लिए रास्ता खोल दिया है. उनके शब्दों में, ''यह वैसे ही है जैसे सरकार ने दशकों तक सरकारी विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति को रोके रखकर महंगे और निजी विश्वविद्यालयों का प्रचार-प्रसार किया था. ''
जयपुर के अनुदानित लाल बहादुर शास्त्री (एलबीएस) कॉलेज के 1973 से 2000 तक प्रिंसिपल रहे 74 वर्षीय ललित शंकर तिवारी कहते हैं, ''गहलोत सरकार ने अनुदान प्राप्त स्थापित कॉलेजों को बहुत बड़ा झटका दिया है और शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट के मामले में इसके प्रभाव अगले तीन से चार साल में देखने को मिलेंगे. '' वे कॉलेजों के निजी प्रबंधन का हवाला देते हैं जो प्रिंसिपल की नियुक्ति बगैर पर्याप्त योग्यता के करता है.
इसी कॉलेज की छात्र यूनियन के पूर्व अध्यक्ष नीरज अग्रवाल कहते हैं, ''अनुभवी शिक्षकों की कमी के कारण छात्रों को भुगतना पड़ रहा है. '' अब पूरी तरह निजी हो चुके इन कॉलेजों के प्रबंधक अनुदान बंद होने से काफी प्रसन्न हैं क्योंकि इससे उन्हें सरकारी नियंत्रण से मुक्ति मिल गई है. एलबीएस कॉलेज के प्रिंसिपल राजीव श्रीवास्तव कहते हैं, ''हमारे ऊपर वित्तीय बोझ् कम हुआ है क्योंकि अब हम कम वेतन पर स्टाफ को रख पाते हैं. '' हालत यह है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मानकों की अनदेखी करते हुए ये कॉलेज लेक्चरर के पद पर 12,000 रु. मासिक पर अनुभवहीन युवाओं को अपने यहां जगह दे रहे हैं.
उदयपुर के राजस्थान महिला गेलाड़ा सीनियर सेकेंडरी स्कूल में भौतिकी के लेक्चरर शशि कुमार शर्मा का कहना है कि शिक्षकों के वेतन बढ़ाने के लिए छात्रों की फीस में मामूली इजाफा किया गया है, जिसके चलते अनुसूचित जाति/ जनजाति के छात्र पढ़ाई छोडऩे को मजबूर हो रहे हैं.
उच्च शिक्षा राज्यमंत्री दयाराम परमार ने इस योजना का अपने आदिवासी विधानसभा क्षेत्र खेरवाड़ा में पूरा राजनैतिक लाभ लिया है. उदयपुर के खेरवाड़ा कॉलेज में उन्होंने अनुदान प्राप्त कॉलेजों के 51 शिक्षकों की नियुक्ति करवाई है जबकि बाकी सरकारी कॉलेजों में शिक्षकों की संख्या काफी कम है. उनके इस कदम से पहले इस कॉलेज में मात्र 12 शिक्षक थे. फिलहाल जिन शिक्षकों के पास करने को कोई काम नहीं, उनके लिए वे बीएड का नया पाठ्यक्रम शुरू करने की योजना बना रहे हैं.
सरकार के इस फैसले ने समूचे शिक्षक समुदाय पर असर डाला है. कुछ ऐसे शिक्षक जिनके पास अपने गृह जिले के आसपास नियुक्ति के लिए संपर्क-साधन थे, वे तो खुश हैं. इनमें सबसे खुशकिस्मत 102 शिक्षक/ कर्मचारी रहे जिन्हें जयपुर से 30 किमी दूर चिमनपुरा सरकारी कॉलेज में जुलाई, 2011 में भेजा गया था. इससे कॉलेज में शिक्षकों की संख्या 50 फीसदी बढ़ गई. अब उन्हें पूर्व के 60,000 रु. महीने की जगह एक छठे वेतन आयोग के चलते लाख रु. वेतन मिल रहा है. काम के नाम पर उनके पास दिनभर में सिर्फ एक क्लास है. निजी स्कूलों में वे चार क्लास लिया करते थे.
नाम न छापने की शर्त पर एक शिक्षिका ने कहा, ''काम तो बहुत कम होता है, इसी बहाने घूमना-फिरना हो जाता है. '' आठ ऐसे शिक्षक हैं जिन्हें बीएड कॉलेजों से लाया गया है. उन्हें बैठे-बिठाए वेतन मिल रहा है क्योंकि यहां यह पाठ्यक्रम है ही नहीं. प्रिंसिपल बी.एस. मीणा कहते हैं, ''सरकार भविष्य में यह पाठ्यक्रम शुरू कर सकती है. ''
बीएड के अलावा गारमेंट डिज़ाइनिंग, ललित कला, संगीत, वाणिज्य और अर्थशास्त्र ऐसे विषय हैं जिनके शिक्षकों को उन कॉलेजों में तैनात किया गया है जहां ये विषय हैं ही नहीं. इन शिक्षकों ने जुलाई, 2011 से एक भी क्लास नहीं ली है. ऐसे सैकड़ों शिक्षक हैं. सरकार अगले साल से इनके लिए नए पाठ्यक्रम शुरू करने की योजना बना रही है. इसके बावजूद तबलावादकों समेत 181 ऐसे शिक्षाकर्मी होंगे जिन पर सरकार छह करोड़ रु. खर्च कर चुकी है और इनके पास काम नहीं आने वाला.
कई मामले बड़े दिलचस्प हैं. मसलन, वाणिज्य के एक शिक्षक की किस्मत खराब थी कि उसे जयपुर से 300 किमी दूर बारां के एक कॉलेज में नियुक्ति मिली. राहत की बात इतनी है कि उसे पढ़ाना नहीं होता. वहां वाणिज्य विषय है ही नहीं.
एलबीएस कॉलेज में अर्थशास्त्र के शिक्षक के.के. गौर को जुलाई, 2011 में चिमनपुरा भेजा गया. छह महीने तक वे रिटायर हो गए. उन्हीं के शब्दों में, ''मुझे लगा कि मैंने जिंदगी भर जो सीखा है, उसे खाली बैठकर बरबाद कर रहा हूं जबकि उधर मेरे पुराने छात्रों को पढ़ाने वाला कोई नहीं. '' सरकार ने उन्हें पूरा वेतन नहीं दिया है और पुराने कॉलेज से भी उन्हें ग्रेच्युटी आंशिक ही मिली है.
जिन शिक्षकों ने गांवों में जाने से इनकार किया, वे बेरोजग़ार हो गए. अनुदानी संस्थान कर्मचारी संघ के अध्यक्ष ओम स्वामी कहते हैं, ''गहलोत संवेदनशील और पारदर्शी होने का दावा करते हैं पर वे हैं नहीं. विजय माल्या ने किंगफिशर के कर्मचारियों के साथ जो किया, गहलोत ने तो हमारी जिंदगी उससे भी बदतर बना दी है. ''
शोभा रस्तोगी बनाम राजस्थान सरकार के मुकदमे में मई, 2011 में öदेश के महाधिवक्ता जी.एस. बापना ने राजस्थान हाइकोर्ट को वचन दिया था कि जो शिक्षक गांवों में नहीं जाएंगे उनके लिए अनुदान बंद नहीं किया जाएगा, इसके बावजूद सरकार ने फरवरी, 2012 में अनुदान रोक दिया. नतीजा? कई संस्थानों ने अनुदान प्राप्त शिक्षकों को निकाल दिया या फिर वेतन कटौती को बाध्य करने के लिए उनके वेतन रोक दिए.
जयपुर के एलबीएस कॉलेज में 26 साल से अंग्रेजी पढ़ा रहीं 49 वर्षीया मधुलिका नैथानी और 21 साल से प्राणीविज्ञान पढ़ा रहीं 50 वर्षीया आरती माथुर को पिछले मार्च में नौकरी से निकाल दिया गया था. राजस्थान महिला गेलाड़ा सीनियर सेकेंडरी स्कूल में 1987 से पढ़ा रहे शशि शर्मा को फरवरी से वेतन (40,000 रु. महीना) नहीं मिला है. वे कहते हैं, ''दो बेटों की दो लाख इंजीनियरिंग की फीस और मकान कर्जे की 72,000 रु. सालाना की किस्त कैसे चुकाऊंगा? '' ऐसे सैकड़ों लोग हैं जिन्हें पिछले वेतन के 20 फीसदी पर काम करने को बाध्य किया गया है.जो शिक्षक सरकारी आदेश का पालन करते हुए गांवों में चले गए, फिर जल्द रिटायर भी हो गए, उनकी अपनी समस्याएं हैं. उनके पुराने नियोक्ता उन्हें ग्रेच्युटी देने से इनकार कर चुके हैं. सरकार ने उनका वेतन अब तक नहीं दिया है.
जयपुर के उच्च प्राथमिक आदर्श विद्या मंदिर में पढ़ाने वाले रामसेवक गंगवार को शहर से 40 किमी दूर कालाडेरा के सरकारी स्कूल में भेज दिया गया था. जुलाई, 2011 में उन्होंने वहां सिर्फ 22 दिन काम किया और रिटायर हो गए. उनके सहकर्मी भगवान स्वरूप शर्मा ने अगस्त, 2012 में रिटायर होने से पहले 14 माह तक काम किया. दोनों को ही न तो सरकार से, न ही अपने पिछले कॉलेज से कोई पैसा मिला है.

