जब बेटे को नौकरी मिलती है तो सबसे ज्यादा खुशी उसकी मां को होती है. लेकिन छत्तीसगढ़ में ऐसी अनेक मां हैं, जो अपने बच्चों को नौकरी पर जाते देख मन-ही-मन दुखी हो जाती हैं और ऐसा इसलिए क्योंकि जब उनके बच्चे नौकरी पर जाते हैं, तब उनके साथ के दूसरे बच्चे या तो स्कूल में पढ़ रहे होते हैं या फिर मैदान में खेल-कूद रहे होते हैं.
छत्तीसगढ़ पुलिस के इन सभी 375 नन्हे-मुन्ने सिपाहियों में से हर किसी के सिर से प्रदेश पुलिस में ही कार्यरत पिता का साया उठा चुका है, जिसके बदले पुलिस महकमे में इन्हें अनुकंपा नियुक्ति दी गई है.
बिलासपुर के आठ साल के अनिमेष भारद्वाज को पता तक नहीं है कि जाने-अनजाने इतनी छोटी-सी उम्र में उसने अपने परिवार की जिम्मेदारी कंधों पर उठा ली है. जिस तरह दूसरे बच्चों की मम्मियों को बच्चों को रोजाना स्कूल भेजने के लिए तरह-तरह के लालच देने पड़ते हैं, उसी तरह अनिमेष की मां को उसे ऑफिस भेजने की खातिर मनाने के लिए ढेरों पापड़ बेलने पड़ते हैं. प्रदेश के इस सबसे नन्हे पुलिसकर्मी की मां सरोजनी बताती हैं, ''सितंबर 2009 में एक हादसे में अनिमेष के पिता गुजर गए थे. पेंशन के बल पर घर चलाना संभव नहीं था इसलिए बाल पुलिस योजना के तहत उसे बाल आरक्षक बनाना पड़ा.''
छत्तीसगढ़ सरकार की बाल पुलिस योजना का उद्देश्य पुलिस सेवा में रहे और असमय मौत का शिकार हो गए लोगों के परिवारों को आर्थिक संबल देना है. अनुकंपा नियुक्ति के तहत बाल आरक्षक वही बनते हैं, जिनके घर में कोई बालिग वारिस न हो. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इससे परिवार को तात्कालिक राहत मिल जाती है और भविष्य में अनुकंपा नियुक्ति मिल पाएगी या नहीं, यह संशय भी उनके मन में नहीं रहता है.
बिलासपुर रेडियो पुलिस की एसपी राजश्री मिश्र कहती हैं, ''बाल आरक्षकों के ऑफिस आने की बाध्यता नहीं रखी गई है. वे हफ्ते-पंद्रह दिन में एक बार आकर हाजिरी रजिस्टर में हस्ताक्षर कर जाते हैं. उन्हें थाने की बजाए पुलिस अधीक्षक कार्यालयों में नियुक्त किया जाता है जहां उनसे केवल कार्यालय के काम ही लिए जाते हैं. ''
रायपुर के एसएसपी ऑफिस में पदस्थ 14 वर्षीय दीपक ठाकुर के पिता की मौत इसी साल मई में हार्ट अटैक के कारण हो गई थी. परिवार की गाड़ी चलाने के लिए दीपक को पुलिस की वर्दी पहननी पड़ी. उसकी मां सोना बताती हैं, ''दीपक को नौकरी पर भेजने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था. मामूली पेंशन से गुजारा नहीं होता. शुरुआत में दीपक दफ्तर जाने के लिए तैयार ही नहीं होता था लेकिन जब उसे घर की परिस्थितियों का हवाला देकर समझाया, तो वह झट से तैयार हो गया. ''
दरअसल इन बाल आरक्षकों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब वे पुलिस की वर्दी पहनकर बाहर निकलते हैं तो उनके हम उम्र बच्चे उनका मजाक उड़ाने लगते हैं. इसी संकोच की वजह से दीपक ने अपने सहपाठियों को अभी तक यह नहीं बताया है कि वह नौकरी करता है. दूसरी समस्या दफ्तर तक पहुंचने की होती है. दफ्तर और घर के बीच दूरी ज्यादा हो तो समस्या भी और बढ़ जाती है.
हालांकि अनिमेष को अपने घर की बगल में पुलिस दूरसंचार कार्यालय में पोस्टिंग मिल गई, इसीलिए उसे इस समस्या से नहीं जूझना पड़ा. लेकिन मुंगेली जिले के जमकोर गांव के सौरभ नागवंशी को हाजिरी लगाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. सौरभ को जब अनुकंपा नियुक्ति मिली थी, तब उसकी उम्र महज पांच साल थी. उसके पिता रामकुमार रेलवे पुलिस में थे. उनकी मौत के बाद सौरभ को रायपुर स्थित रेलवे एसपी कार्यालय में नियुक्ति मिली. अब उसे हाजिरी लगाने के लिए बिलासपुर से 110 किलोमीटर दूर रायपुर आना पड़ता है.
हालांकि नियमित रूप से दफ्तर आने की अनिवार्यता नहीं है. फिर भी इतनी छोटी उम्र में नौकरी करने के बोझ का असर इन बच्चों की पढ़ाई पर साफ तौर से देखा जा सकता है. बिलासपुर एसपी कार्यालय में पदस्थ 13 साल के हरीश कौशिक के पिता की 2010 में मृत्यु हो गई थी. इसीलिए उसे बाल आरक्षक बनना पड़ा.
नौकरी शुरू करने से पहले तक हरीश को हर क्लास में बढिय़ा अंक मिलते थे. लेकिन अब वह सेकेंड डिवीजन भी बमुश्किल ला पाता है. नौकरी और पढ़ाई के बीच पिस रहा हरीश क्रिकेट खेलने के अपने शौक को भी पूरा नहीं कर पाता. यह पूछने पर कि जब लोग उसे पुलिसवाला कहते हैं तो कैसा लगता है, वह कहता है, ''अच्छा तो लगता है लेकिन कई बार लगता है कि लोग चिढ़ा रहे हैं. ''
अपने परिवार को आर्थिक संबल दे रहे इन नन्हे-मुन्नों के भविष्य को सुरक्षित बनाने का पुलिस महकमे ने पूरा इंतजाम कर रखा है. छत्तीसगढ़ के आइजी प्रशासन पवनदेव बताते हैं, ''पुलिस महकमे का मकसद दिवंगत पुलिसकर्मी के परिजनों की मदद करना है. बाल आरक्षकों को हर माह वेतन के रूप में 6,000 रु. मिलते हैं, जब वे 18 साल के हो जाते हैं तो उन्हें पूर्णकालिक आरक्षक बना दिया जाता है. ''
बाल आरक्षक बन चुके इन नन्हों की आंखों में भविष्य के सपने तैर रहे हैं. अच्छे करियर का महत्व समझ चुके ये बच्चे बड़े होकर बेहतर भविष्य बनाना चाहते हैं. रायपुर की कंचन निमाड़े पढ़-लिखकर आइपीएस अधिकारी बनना चाहती थी. लेकिन वक्त ने ऐसी पलटी खाई कि उसे छोटी सी उम्र में ही पुलिस सेवा में आना पड़ा. बस्तर के सुकमा में तैनात उसके कांस्टेबल पिता सुजीत निमाड़े की मार्च 2010 में मौत हो गई थी.
सुजीत की चार बेटियों में से दो की शादी हो चुकी थी इसीलिए परिवार की गाड़ी चलाने के लिए तीसरे नंबर की बेटी कंचन को बाल आरक्षक बनना पड़ा. लेकिन उसे अपना सपना बखूबी याद है. वह कहती है, ''हफ्ते में दो दिन एसएसपी कार्यालय जाती हूं. काम का कोई दबाव नहीं होता. मन में तय कर रखा है कि बड़ी होकर आइपीएस अधिकारी ही बनूंगी. ''
रायपुर जिला पुलिस के कांस्टेबल शंकरलाल भुआरे अपने इकलौते बेटे यशवंत को इंजीनियर बनता देखना चाहते थे. लेकिन पिछले साल अगस्त माह में बीमारी के चलते उनका निधन हो गया. तब यशवंत 12 साल का था और सातवीं में पढ़ता था. परिवार की जिम्मेदारी तो उठानी ही थी इसीलिए वह बाल आरक्षक बन गया. यशवंत ने अपने पिता के सपने को पूरा करने का लक्ष्य बना लिया है. वह कहता है, ''बड़ा होकर तो इंजीनियर ही बनूंगा, मुझे पिता की इच्छा पूरी करनी है. पुलिस की नौकरी के साथ-साथ इंजीनियरिंग की भी पढ़ाई करूंगा. '' उसकी मां अनकलहिन कहती हैं, ''सरकार की इस योजना की वजह से परिवार को सहारा मिल गया, वरना बेटियों की शादी करना तो बहुत ही मुश्किल हो जाता.''

