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सोनिया को मिलने वाली है दलित चुनौती!

केंद्र में कांग्रेस से सीधी टक्कर लेने की बजाए मायावती ने सोनिया गांधी के गढ़ रायबरेली में मोर्चा खोला. सोनिया के खिलाफ बीएसपी के उम्मीदवार रामलखन पासी कड़ी टक्कर देने की तैयारी में.

अपडेटेड 2 दिसंबर , 2012

भले ही बीएसपी सुप्रीमो मायावती केंद्र में कांग्रेस सरकार से समर्थन वापसी के लिए 'सही समय' का इंतजार कर रही हों, लेकिन कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी को घेरने के लिए सियासी चाल चलने में उन्होंने तनिक  भी देर नहीं की. सोनिया के संसदीय क्षेत्र रायबरेली से एक दलित और पूर्व नौकरशाह 56 वर्षीय  रामलखन पासी को टिकट देकर मायावती ने अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं कि बीएसपी दलित कार्ड के जरिए अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष की राह मुश्किल करने की तैयारी में है. रामलखन ने भी चुनावी रण में कूद गए हैं.

मूलत: प्रतापगढ़ जिले के रहने वाले रामलखन पासी ने वर्ष 1974 में मार्केटिंग इंस्पेक्टर के रूप में सरकारी सेवा ज्वाइन की थी. पढ़ाई में मेधावी होने के कारण अगले 10 वर्ष के दौरान रामलखन ने एक के बाद एक छह नौकरियां छोड़ीं और दूसरी ज्वाइन की. वर्ष 1985 में उनका चयन डिप्टी रजिस्ट्रार (स्टांप एवं रजिस्ट्रेशन) के महत्वपूर्ण पद पर हुआ. सरकारी सेवा में बेहद ईमानदार छवि वाला अधिकारी होने के बावजूद रामलखन की ख्याति उनके सामाजिक कार्यों को लेकर है.

उन्होंने वर्ष 1994 में वीरांगना ऊदादेवी स्मारक संस्थान और पासी सेना का गठन किया. इस संस्थान के जरिए रामलखन बीते 18 साल से हर वर्ष 25 फरवरी को लखनऊ में 125 से लेकर 250 गरीब लड़कियों का सामूहिक विवाह का आयोजन करते हैं. इस आयोजन का पूरा खर्च वे स्वयं वहन करते हैं. रामलखन अब तक पूरे प्रदेश में 2,500 से ज्यादा गरीब लड़कियों का विवाह करवा चुके हैं.Sonia pasi

इसके अलावा उनकी अध्यक्षता में बनी 'पासी सेना' पासी समाज के पीडि़त लोगों को हर तरह  की कानूनी मदद मुहैया करा रही है. रामलखन भले ही अब सक्रिय राजनीति में कूदे हों, लेकिन बीएसपी के संस्थापक कांशीराम ने काफी पहले उन्हें राजनीति में आने का न्योता दिया था. वर्ष 1979 में बामसेफ के गठन के बाद जब लखनऊ के लालकुआं इलाके में इसकी कार्यकारिणी की पहली बैठक हुई तो इसमें रामलखन भी शामिल हुए.

इसी बैठक में कांशीराम ने उन्हें नौकरी छोड़ बामसेफ से जुडऩे का निर्देश दिया. मगर पारिवारिक विवशताओं का हवाला देकर उन्होंने इसे नामंजूर कर दिया. हालांकि उन्होंने कांशीराम के निकाले गए समाचार पत्र बहुजन संगठक के प्रचार और इसे आर्थिक रूप से मजबूत करने का जिम्मा जरूर संभाल लिया.

रामलखन, मायावती के संपर्क में पहली बार 1995 में आए. 5 जून, 1995 को जब मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं तो उस समय उनके प्रमुख सचिव राय सिंह रामलखन की पासी बिरादरी में पकड़ से वाकिफ थे. सिंह ने रामलखन को नौकरी छोड़कर बीएसपी में शामिल होने और उसकी एवज में सरकार में डिप्टी मिनिस्टर बनने का न्योता दिया. रामलखन ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया लेकिन उत्तर प्रदेश के सरकारी अधिकारियों में वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाली मायावती का अभिनंदन किया.

असल में प्रदेश में अनुसूचित जातियों की आबादी 21 प्रतिशत है. इसमें सबसे ज्यादा 56.3 प्रतिशत जाटव हैं तो इनके बाद पासी समुदाय (15.9 प्रतिशत) का नंबर आता है. सबसे ज्यादा 3.25 लाख पासी समुदाय के लोग सीतापुर में हैं और दूसरा नंबर रायबरेली का है.

यहां इनकी संख्या 2.50 लाख है. पासी समुदाय की बड़ी संख्या और उसका राजनैतिक प्रतिनिधित्व न होने के कारण प्रदेश के सभी राजनैतिक दलों के नेताओं ने रामलखन पासी को अपनी ओर खींचने का भरसक प्रयास किया लेकिन सफलता मायावती को ही मिली.

बीएसपी से रामलखन के संबंध बहुत अच्छे नहीं रहे थे. वर्ष 2007 में वे प्रदेश में सरकार बनाने वाली बीएसपी के निशाने पर आ गए थे. पार्टी के वरिष्ठï नेताओं का आरोप था कि रामलखन ने वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी के उम्मीदवारों का विरोध किया और इसी वजह से पासी बाहुल्य इलाके में पार्टी के कई प्रत्याशी चुनाव हार गए जिनमें वरिष्ठ नेता स्वामी प्रसाद मौर्य भी शामिल थे. इसके बाद वर्ष 2008 से 2010 के बीच दो दर्जन बार उनका अलग-अलग जिलों में तबादला हुआ. इसी दौरान रामलखन को तत्कालीन बीएसपी प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य का साथ मिला.

रायबरेली से विधानसभा चुनाव लडऩे के दौरान मौर्य को पासी समुदाय में रामलखन की पकड़ का अंदाजा हो गया था. जुलाई, 2011 में मौर्य के प्रयास से ही रामलखन  की मायावती से मुलाकात हुई. मायावती ने उन्हें नौकरी छोड़कर बीएसपी में शामिल होने और बदले में तत्कालीन बीएसपी सरकार में मंत्री पद का न्योता दिया. अब रामलखन राजनीति में कूदने का मन बना चुके थे, सो उन्होंने पांच साल पहले ही उपायुक्त (स्टांप एवं रजिस्ट्रार) के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली.

मायावती ने रामलखन को लखनऊ मंडल का जोनल को-आर्डिनेटर बनाया. वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी को हार का सामना करना पड़ा लेकिन पासी बाहुल्य सीटों पर पार्टी को कुछ फायदा हुआ. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए जब मायावती को रायबरेली में सोनिया गांधी के विरोध में मजबूत उम्मीदवार की जरूरत हुई तो उन्होंने रामलखन  पर ही भरोसा जताया.

वर्ष 2003 से 2006 के बीच रायबरेली में वे डिप्टी रजिस्ट्रार (स्टांप एवं रजिस्ट्रेशन) के पद पर तैनात थे और इस दौरान यहां पर उन्होंने बड़ी संख्या में दलितों की जमीन को भू-माफियाओं से मुक्त कराया था. रायबरेली के वरिष्ठï पत्रकार और राजनैतिक विश्लेषक शिव मनोहर पांडेय कहते हैं कि अभी तक इस संसदीय क्षेत्र में पासी समुदाय सोनिया गांधी को ही वोट देता आया है.

वे कहते हैं, ''पासी बाहुल्य इलाके में मायावती ने इनके बीच प्रसिद्घ एक व्यक्ति को उतार कर एक चतुर चाल चली है. अगर रामलखन पासी, जाटवों के साथ कुछ अगड़ी जातियों को अपने साथ लाने में कामयाब होते हैं तो कांग्रेस को यहां डैमेज कंट्रोल करने में खासी मशक्कत करनी पड़ेगी. '' हालांकि कांग्रेस विधायक और रायबरेली संसदीय क्षेत्र के मीडिया प्रभारी अखिलेश प्रताप सिंह इससे इत्तेफाक नहीं रखते. सिंह कहते हैं, ''रायबरेली की जनता का सोनिया गांधी के साथ वोटर और नेता का नहीं बल्कि परिवार का रिश्ता है. जाति की राजनीति करने वालों की यहां दाल नहीं गलने वाली. ''

रामलखन का एक साहित्यिक परिचय भी है. आम आदमी की आवाज को अपनी कलम की ताकत देने वाले जन कवि अदम गोंडवी के सहयोगी रह चुके रामलखन ने लखनऊ में एक अनोखे पुस्तकालय की स्थापना की है. उनका दावा है कि इस पुस्तकालय में 25,000 से अधिक पुस्तकें हैं जिनमें विश्व की हर भाषा का प्रचलित साहित्य मौजूद है. रामलखन को चुनाव लड़वाने के लिए उनके कवि साथियों की टोली नारे और कविताओं की रचना करने में मशगूल हो गई है. ऐसे ही एक

कवि यदुनाथ 'सुमन' की ताजा पंक्तियां हैं, ''शोषितों को जगाने, उठाने और फिर से शासक बनाने की सच्ची लगन. ठानकर देश में आज संघर्षरत. वह है पासीरत्न श्री रामलखन. '' रामलखन के संघर्ष का आगाज तो ठीक-ठाक है, अंजाम भविष्य बताएगा.

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