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यूएफओ: अनजान अनसुलझी गुत्थियां

हिमालय क्षेत्र में भारत और चीन की सीमा पर आकाश में उड़ती चमकदार अजनबी वस्तुओं का स्रोत क्या है, इसे लेकर सेना, खगोलविज्ञानी और डीआरडीओ हर कोई हैरत में.

अपडेटेड 5 नवंबर , 2012

भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आइटीबीपी) की यूनिटों ने जम्मू और कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में उडऩे वाली अनजान वस्तुओं (यूएफओ) के देखे जाने की खबर दी है.

पैंगांग झील के करीब थाकुंग में तैनात आइटीबीपी की यूनिट ने इस साल 1 अगस्त से 15 अक्तूबर के बीच कम-से-कम 100 बार प्रकाशमान वस्तुओं के देखे जाने की रिपोर्ट भेजी है. सितंबर में दिल्ली मुख्यालय और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को भेजी अपनी रिपोर्ट में उन्होंने दिन और रात में वहां यूएफओ के देखे जाने की बात कही है. पीले से दिखने वाले ये प्रकाशीय पिंड चीन की ओर क्षितिज से उठते हैं और तीन से पांच घंटे तक आकाश में उडऩे के बाद कहीं गायब हो जाते हैं.

आइटीबीपी की धुंधली तस्वीरों के अध्ययन के बाद भारतीय सैन्य अधिकारियों का मानना है कि ये गोले न तो मानवरहित हवाई उपकरण (यूएवी) हैं और न ही ड्रोन या कोई छोटे उपग्रह हैं. ड्रोन पहचान में आ जाता है और इनका अलग रिकॉर्ड रखा जाता है. सेना ने इस साल जनवरी से अगस्त के बीच 99 चीनी ड्रोन देखे जाने की रिपोर्ट दी है: इनमें 62 पूर्वी सेक्टर के लद्दाख में देखे गए थे और 37 पूर्वी सेक्टर के अरुणाचल प्रदेश में. इनमें से तीन ड्रोन लद्दाख में चीन से लगी 365 किमी लंबी भारतीय सीमा में प्रवेश कर गए थे जहां आइटीबीपी की तैनाती है.

पहले भी लद्दाख में ऐसे प्रकाश पुंज देखे गए हैं. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और चीन अधिकृत अक्साइ चिन के बीच 86,000 वर्ग किमी में फैले लद्दाख में सेना की भारी तैनाती है. इस साल लगातार आइटीबीपी के ऐसे प्रकाश पुंज देखे जाने की खबर से सेना की लेह स्थित 14वीं कोर में हलचल मच गई थी. हालांकि आइटीबीपी ने इंडिया टुडे  के इस संबंध में भेजे गए सवालों का कोई जवाब नहीं दिया है.

इस साल सितंबर में सेना ने जमीन आधारित एक मोबाइल रडार यूनिट को रिबन के आकार की भारत और चीन के बीच में पडऩे वाली 160 किमी लंबी पैंगांग झील के करीब पहाड़ की चोटी पर स्थापित किया था. यह रडार किसी भी वस्तु द्वारा छोड़ी जाने वाली फ्रीक्वेंसी को पकडऩे के काम आता है.

जो प्रकाश पुंज आंखों से देखे जा सकते थे, वे रडार की जद में नहीं आ सके. इससे यह साबित हुआ कि इन पुंजों में धातु नहीं है. स्पेक्ट्रम एनलाइजर भी इससे निकलने वाली किसी तरंग को नहीं पकड़ सका. इस उड़ती हुई वस्तु की दिशा में सेना ने एक ड्रोन भी छोड़ा, लेकिन उससे भी कोई फायदा नहीं हुआ. इसे पहचानने में कोई मदद नहीं मिली. ड्रोन अपनी अधिकतम ऊंचाई तक तो पहुंच गया लेकिन उड़ते हुए प्रकाश पुंज का पता नहीं लगा सका.

इसी साल सितंबर के अंत में झील से 150 किमी दक्षिण स्थित हेनले में भारतीय खगोलीय केंद्र के वैज्ञानिकों ने तीन दिन तक इस हवाई घटना की जांच की. सैन्य अधिकारियों के मुताबिक, टीम ने प्रकाश पुंजों को पहचान तो लिया, लेकिन यह नहीं बता सकी कि वे क्या हैं. हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि ये पुंज ‘‘आकाशीय्य्य नहीं हैं और इनका किसी ग्रह या तारे से कोई लेना-देना नहीं है.

हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि कश्मीर घाटी को लद्दाख से अलग करने वाली विशाल हिमालय शृंखला वाले इस इलाके की भौगोलिक जटिलता और कम आबादी के कारण ऐसी चीजें दिखना आम हैं. धर्मशाला स्थित सरकारी पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में भूगर्भशास्त्री सुनील धर कहते हैं, ‘‘यह जगह सर्दियों में बर्फ से ढंकी रहती है, यहां सड़कें कम हैं और यह भारत की कटी हुई कुछेक जगहों में आती है.’’ धर इस इलाके में 15 साल तक ग्लेशियरों का अध्ययन कर चुके हैं.

तकनीकी इंटेलीजेंस के लिए जिम्मेदार नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (एनटीआरओ) और डिफेंस रिसर्च डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिक भी इन वस्तुओं की पहचान नहीं कर पाए हैं. इससे भय की जगह अब मामला सरकार के लिए शर्मिंदगी की वजह बनता जा रहा है. दिल्ली में एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी कहते हैं, ‘‘अगर हमारे तमाम वैज्ञानिक संसाधनों से इसकी पहचान नहीं हो पा रही, तो कुछ गड़बड़ जरूर है.’’

इंटेलीजेंस अफसरों का मानना है कि हो सकता है कि चीन की ओर से यह कोई मनोवैज्ञानिक चाल हो या फिर उच्च तकनीकी उपकरण जो लद्दाख में भारत की सामरिक स्थिति को जांचने के लिए लगाया गया हो.

भारतीय वायु सेना के पूर्व प्रमुख एयर चीफ मार्शल (सेवानिवृत्त) पी.वी. नाइक कहते हैं, ‘‘हम इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते. हमें पता लगाना होगा कि उन्होंने कौन-सी नई तकनीक अपनाई है.’’

भारतीय वायु सेना ने 2010 में सेना के ऐसी वस्तुओं के देखे जाने के बाद जांच में इन्हें ‘‘चीनी लालटेन’’ करार दिया था. पिछले एक दशक के दौरान लद्दाख में यूएफओ का दिखना बढ़ा है. 2003 के अंत में 14वीं कोर ने इस बारे में सेना मुख्यालय को विस्तृत रिपोर्ट भेजी थी. सियाचिन पर तैनात सैन्य टुकडिय़ों ने भी चीन की तरफ तैरते हुए प्रकाश पुंज देखे हैं, लेकिन ऐसी चीजों के बारे में रिपोर्ट करने पर हंसी उडऩे का खतरा रहता है. लेह में जब उत्तरी कमान की एक प्रस्तुति के दौरान यह बात कही गई, तो तत्कालीन सैन्य प्रमुख जनरल एन.सी. विज ने नाराज होकर इसे मनोवैज्ञानिक समस्या करार दिया था.

वैज्ञानिकों का कहना है कि जरूरी नहीं कि ये प्रकाश पुंज बाहरी अंतरिक्ष की वस्तु हों. पुणे में रहने वाले प्रसिद्ध खगोलशास्त्री जयंत नर्लीकर कहते हैं, ‘‘यूएफओ के किसी और ग्रह से आने का कोई साक्ष्य नहीं है. इनके किसी और ग्रह की वस्तु होने की बात कोरी कल्पना है और इसमें कोई सच्चाई नहीं है.’’

हालांकि अभी तक इस बात के लिए सफाई नहीं दी गई है कि किस चीज को स्पष्ट रूप से ‘यूएफओ’ का देखा जाना माना जाएगा. लद्दाख से मात्र 100 किमी की दूरी पर हिमाचल के लाहौल-स्पीति क्षेत्र में 2004 में सबसे करीब से एक यूएफओ को देखा गया था. आज तक उसके बारे में कुछ पता नहीं चल सका है.

अहमदाबाद स्थित इसरो के स्पेस एप्लिकेशन सेंटर से डॉ.अनिल कुलकर्णी के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की पांच सदस्यीय टीम निर्जन समुद्र टापू घाटी में इसका पता लगाने गई थी. उन्होंने रोबोट जैसी दिखने वाली चार फुट ऊंची एक आकृति की फिल्म भी बनाई जो उनसे 50 मीटर की दूरी पर घाटी में टहलती दिखी थी. इसके बाद यह आकृति अचानक हवा में गायब हो गई. उन्होंने इसे 40 मिनट तक देखा था. इसे छह वैज्ञानिकों समेत कुल 14 लोगों ने देखा था.

इसके बाद कुलकर्णी ने टीम के हरेक सदस्य का निजी साक्षात्कार यह जानने के लिए लिया कि उन्होंने क्या देखा था. उनकी विस्तृत रिपोर्ट की प्रतियां पीएमओ, इसरो, सेना और कई इंटेलीजेंस एजेंसियों को भी भेजी गई. कुलकर्णी ने यह निष्कर्ष निकाला कि उनकी टीम इस घटना की गवाह थी, वह प्राकृतिक नहीं थी. हालांकि इस मामले को वहीं दफन कर दिया गया.

2004 में उस अन्वेषण टीम का हिस्सा रहे सुनील धर बताते हैं कि वह अनुभव कभी न भूलने वाला है. वे कहते हैं कि स्थानीय लोग कई साल से ऐसी रहस्यमय चीजें देखने की बात करते रहे हैं. उन्होंने बताया, ‘‘ये अनसुलझी गुत्थियां हैं जिनका और अध्ययन किया जाना होगा.’’ बहरहाल, एक सवाल अभी भी बाकी है जिसका  जवाब ढूंढऩा हमारी सुरक्षा एजेंसियों के साथ-साथ सरकार के लिए भी चुनौती है और लद्दाख अब भी इस तथ्य और गल्प के बीच झूल रहा है.

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