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अस्‍पताल में इनवर्टर नहीं, 2 मरीजों की मौत

अपने परिजनों को लोग अस्पताल इस उम्मीद में लाते हैं कि वहां वे चंगे हो जाएंगे, लेकिन जब खुद अस्पताल ही अव्यवस्था के गंभीर रोग से ग्रस्त हो तो? ग्वालियर मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेंटर की हालत कुछ ऐसी ही है, जहां 21 अक्तूबर को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में दो मरीजों ने दम तोड़ दिया.

अपडेटेड 5 नवंबर , 2012

अपने परिजनों को लोग अस्पताल इस उम्मीद में लाते हैं कि वहां वे चंगे हो जाएंगे, लेकिन जब खुद अस्पताल ही अव्यवस्था के गंभीर रोग से ग्रस्त हो तो? ग्वालियर मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेंटर की हालत कुछ ऐसी ही है, जहां 21 अक्तूबर को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में दो मरीजों ने दम तोड़ दिया.

हैरानी की बात है कि अस्पताल में जगह-जगह जनरेटर लगे हैं, बस ट्रॉमा सेंटर में नहीं है. बिजली गुल होने की स्थिति में जिसका खामियाजा उन दो गंभीर मरीजों को भुगतना पड़ा,  जिनकी वेंटिलेटर बंद होने से मौत हो गई. कुछ माह पहले एक मरीज की जान तब बच पाई थी जब उसके परिजन वेंटिलेटर को चालू रखने की खातिर इनवर्टर खरीद कर लाए थे.

ग्वालियर में नियमित बिजली कटौती होती है. 21 अक्तूबर को भी बिजली गुल थी, जब ट्रॉमा सेंटर में पांच मरीज जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे. बिजली आपूर्ति बंद होते ही ट्रॉमा सेंटर में वेंटिलेटरों ने काम करना बंद कर दिया. मरीजों को तड़पता देख अस्पताल के स्टाफ ने यूपीएस लगाया, लेकिन उसने भी आधे घंटे बाद काम करना बंद कर दिया. इस बीच अस्पताल में हड़कंप की स्थिति बन चुकी थी. बिजली विभाग को फोन कर सप्लाई जल्द से जल्द बहाल करवाई गई, लेकिन तब तक मुरैना निवासी चांद खां और हस्तिनापुर के सुग्रीव जाट की मौत हो चुकी थी. बाकी के तीन मरीजों की जान जैसे-तैसे बचाई जा सकी.

अब मेडिकल कालेज यह बताने में जुटा है कि जिन दो मरीजों की मौत हुई है, वे पहले से मरणासन्न हालत में थे. मौत की वजह जनरेटर का न होना नहीं है. यहां तक कि चिकित्सा शिक्षा मंत्री अनूप मिश्र भी कहते हैं, ''दोनों ही मरीज मरणासन्न स्थिति में थे. इसमें अस्पताल प्रबंधन कतई दोषी नहीं है. वैसे हम अव्यवस्था की शिकायत की समीक्षा कर रहे हैं. ट्रॉमा सेंटर में जनरेटर भी लगवाया जा रहा है. ''

यह कोई पहली घटना नहीं है, जब ट्रॉमा सेंटर में बिजली बैकअप नहीं होने से मरीजों की जान पर बन आई हो. इसी साल मई में घटी ऐसी ही घटना से अस्पताल प्रबंधन ने सबक लिया होता तो दो लोगों का जीवन बच सकता था. गत 19 मई को ट्रॉमा सेंटर में अनिल प्रजापति को गंभीर हालत में भर्ती किया गया था. तभी बिजली गुल हो गई और वेंटिलेटर ने काम करना बंद कर दिया.

डॉक्टरों ने प्रजापति के परिजनों से दो टूक कहा कि प्रजापति की जान बचानी है तो बिजली का इंतजाम करो. परिजन तुरंत बाजार जाकर इनवर्टर और दो बैटरी खरीद कर लाए. तब जाकर मरीज की जान बच पाई लेकिन हाल में जान गंवाने वाले मरीज इतने खुशनसीब नहीं थे.

सन 2010 में शुरू हुए ट्रॉमा सेंटर में तीन साल बाद भी जनरेटर नहीं होने की वजह? अस्पताल के सहायक अधीक्षक डॉ. कमल भदौरिया कहते हैं, ''ट्रॉमा सेंटर के बजट में जनरेटर लगाने का प्रावधान ही नहीं था. '' मृतक चांद खां के बेटे परवेज पूछते हैं, ''आश्चर्य की बात है कि इतने बड़े अस्पताल में जनरेटर तक नहीं है.''

मृतक सुग्रीव के भाई गिर्राज राणा अस्पताल प्रबंधन को दोषी बताते हुए कहते है, ''सुग्रीव की हालत में सुधार हो रहा था, लेकिन बिजली गायब होते ही सब कुछ खत्म हो गया. '' पर भदौरिया इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं, ''बिजली सप्लाई बंद होने से वेंटिलेटर बंद जरूर हुए थे लेकिन मौत का यह कारण नहीं है. दोनों मरीजों की हालत गंभीर थी. ''

इस मामले में फिलहाल किसी पर भी कार्रवाई नहीं की गई है. हां, दो लोगों की मौत के बाद ट्रॉमा सेंटर में एक छोटा सा जनरेटर जरूर रख दिया गया है.

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