scorecardresearch

बिहार में नीतीश से सवर्णों का मोहभंग

मुख्यमंत्री से बिहार की अगड़ी जातियों का मोहभंग हुआ और वे नए विकल्प की तलाश में जुटे. बिहार की राजनीति में फिर उबाल है.

नीतीश कुमार
नीतीश कुमार
अपडेटेड 5 नवंबर , 2012

जब बिहार के नवादा जिले में तथाकथित अगड़ी जाति के बुजुर्ग 69 वर्षीय राम रत्न प्रसाद रत्नाकर जुलाई, 2010 में जनता दल (यू) में शामिल होने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिले तो वे उनके बहुत बड़े प्रशंसक बन गए. यह बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव से बमुश्किल तीन महीने पहले की बात है. तब से वक्त बदल चुका है.

पटना से 125 किमी दूर स्थित अपने गांव माकनपुर से इंडिया टुडे  से रत्नाकर ने कहा, ''नीतीश जी विनम्रता की मूर्ति लग रहे थे. उन्होंने मुझे समय दिया, मिठाइयां पेश कीं और यहां तक कि दरवाजे तक छोडऩे भी आए. मुझे लगता कि ऐसे वरिष्ठ नेता में इस तरह की विनम्रता असामान्य बात है और मैं तो उनके व्यवहार से गद्गद् हो गया था.”

नीतीश से मिलने से पहले रत्नाकर इस बात को लेकर असमंजस में थे कि जेडी (यू) में शामिल होना सही फैसला है या नहीं. लेकिन जेडी (यू) नेताओं के बार-बार फोन आने लगे. जब फोन आ रहे थे, तब वे इलाहाबाद में अपने बेटे के घर पर ही थे. इसके बाद बेटे के प्रेरित करने की वजह से आखिर गांव के इस पूर्व मुखिया ने पार्टी में शामिल होने की बात मान ली. नीतीश से मुलाकात के बाद उन्हें यह भरोसा हो गया कि उन्होंने सही फैसला लिया है. उन्होंने 2010 में बिहार विधानसभा चुनाव में जेडी (यू)-बीजेपी गठबंधन को जिताने के लिए कड़ी मेहनत की.

नौ साल तक गांव के मुखिया रहे रत्नाकर को चुनाव के ऐन पहले जोडऩा जेडी (यू) के लिए फायदेमंद साबित हुआ. उनका वारसलीगंज विधानसभा क्षेत्र में काफी सम्मान था, जिसमें उनके भूमिहार समुदाय के अच्छे-खासे वोट हैं. नवादा में भूमिहार वोटर निर्णायक माने जाते हैं. भूमिहारों के समर्थन की बदौलत जेडी (यू)-बीजेपी गठबंधन को नवादा जिले की सभी पांचों विधानसभा सीटें मिल गईं. इसके बाद से रत्नाकर से पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता ने बात नहीं की है.

उन्होंने कहा, ''मुझे लगता है कि मैं इस्तेमाल किए जाने के लिए तैयार संसाधन था. एक बार मेरा इस्तेमाल कर लेने के बाद नीतीश कुमार की मुझ्में कोई रुचि नहीं रही.” उन्होंने कहा, ''अगड़ी जातियों (ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ जिनसे कुल मिलाकर बिहार के करीब 16 फीसदी वोटर हैं) का नीतीश कुमार से मोहभंग हो गया है, लेकिन असल में अभी उनके पास कोई सक्षम विकल्प नहीं है.”

अगड़ी जातियों का यह मोहभंग पूरे नवादा जिले में देखा जा सकता है. नवादा में 21 अक्तूबर को अधिकार यात्रा का एक भी बैनर नहीं दिख रहा था, जबकि पटना में 4 नवंबर की यात्रा के लिए पूरे शहर में हर जगह बैनर और नीतीश के स्वागत वाले द्वार नजर आ रहे थे.

अगड़ी जातियों की आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए नीतीश कुमार ने जनवरी 2011 में बÞत ही जोर-शोर से सवर्ण आयोग का गठन किया था लेकिन दो वर्ष के बाद भी सरकार ने इस वर्ग के उत्थान के लिए कुछ नहीं किया है. इसकी वजह से सरकार को अगड़ी जातियों से कोई तारीफ नहीं मिल पाई है जिसकी वह उम्मीद कर रही थी.

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि पंचायतों में अति पिछड़ी जातियों (ईबीसी) को 20 फीसदी का आरक्षण दे देने से जमीनी स्तर पर भी सवर्णों का परंपरागत रूप में बना रहा आधिपत्य खत्म होने लगा है. पिछड़ी जातियों, महादलितों (अनुसूचित जातियों में एकदम हाशिये पर) और पिछड़े मुस्लिमों को मिल रही प्राथमिकता से वे और चिढ़ गए हैं.

2001-06 तक माकनपुर गांव की मुखिया रही उर्मिला देवी कहती हैं, ''1990 के बाद से ही अगड़ी जातियों के नेताओं का विधानसभा और लोकसभा में प्रतिनिधित्व तेजी से घट गया था. हमारे पास शासन करने के लिए बस पंचायतें ही बची थीं. लेकिन पिछड़ों के सशक्तीकरण के नाम पर पंचायतों में अति पिछड़ों के आरक्षण से हम सत्ताविहीन हो गए हैं.” माकनपुर सीट के 2006 में अति पिछड़े वर्ग के लिए रिजर्व हो जाने की वजह से उर्मिला को यह सीट छोडऩी पड़ी थी.

वैसे तो नीतीश सरकार पंचायतों में आरक्षण की व्यवस्था 2006 में ही लेकर आई है, लेकिन अगड़ी जातियों में इसके खिलाफ लगातार असंतोष बढ़ रहा है. अगड़ी जातियों ने पहले इसे लालू प्रसाद यादव को हटाने का 'इनाम’ समझकर स्वीकार किया था. इसके बाद मुखिया लोगों की वित्तीय और राजनैतिक हालत और अच्छी होने से सवर्णों की यह नाराजगी अपने चरम पर पहुंच गई.

नवादा में रहने वाले रिटायर्ड प्रिंसिपल 72 वर्षीय श्रीनंदन शर्मा कहते हैं, ''देश में किसी शीर्ष पद के लिए कोई आरक्षण नहीं है, लेकिन बिहार में पंचायत के प्रमुख, मुखिया का पद आरक्षित है. हम यह सोचते थे कि नीतीश कुमार हमारे लिए अब तक के सबसे अच्छे नेता हैं, लेकिन अब हम दूसरे विकल्प खोज रहे हैं.”

जैसा कि रत्नाकर ने बताया कि उपयुक्त विकल्प के अभाव में नीतीश को फायदा हुआ है. बिहार स्टेट को-ऑपरेटिव मार्केर्टिंग यूनियन लि. (बीआइएससीओ-एमएयूएन) से छंटनी के बाद कर्मचारी 50 वर्षीय श्रीकांत शर्मा ने कहा कि लालू न रहें तो आरजेडी एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इस विचार के पक्ष में बहुत कम लोग हैं. आरजेडी को अब भी यादवों का समर्थन मिल रहा है, लेकिन लालू पिछले चुनाव की तरह अब मुस्लिम वोटों को पाने का भरोसा नहीं कर सकते. इसलिए आरजेडी के मुखिया अब अगड़ी जातियों के वोट हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं. लेकिन नीतीश पर पक्षपात करने का आरोप लगाने के बावजूद अगड़ी जातियों के ज्यादातर लोग, खासकर युवा, अब भी राज्य में कानून-व्यवस्था में सुधार करने को लेकर उनका समर्थन करते हैं. मेघीपुर के 22 वर्षीय विवेक सिंह इशारा करते हैं, ''विभिन्न समुदायों में प्रेमभाव नहीं बचा है. लेकिन कम-से-कम पहले की तरह हम एक-दूसरे की हत्या तो नहीं कर रहे. नीतीश राज में  जातीय नरसंहार अतीत की बात हो चुके हैं.’’

मुख्यमंत्री यह अच्छी तरह से जानते हैं कि यथास्थिति बनाए रखने के लिए बीजेपी का समर्थन बेहद जरूरी है. बीजेपी में हमेशा से ही नेतृत्व अगड़ों के हाथ में रहा है जबकि नीतीश की जेडी (यू) पिछड़ों के एक हिस्से, महादलितों और अल्पसंख्यकों के लिए आवाज उठाने वाली पार्टी रही है.

15 अक्तूबर को नीतीश ने इन अटकलों पर विराम लगाने की कोशिश की. उन्होंने बिहार में जेडी (यू) और बीजेपी के बीच मतभेद पनपने के कयासों को दफन करने के उद्देश्य से दोहराया कि दोनों पार्टियां अगला लोकसभा चुनाव साथ-साथ लड़ेंगी. कुछ इसी तरह की भावना को पेश करते हुए बिहार में बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि मार्च, 2000 में उनकी पार्टी ने नीतीश कुमार का समर्थन इस वजह से किया था ताकि उनकी मदद से धर्मनिरपेक्ष वोट हासिल किए जाएं और अपनी स्वीकार्यता के साथ-साथ अपना कद बढ़ाया जाए.

बीजेपी के एक सांसद कहते हैं, ''कांग्रेस के विपरीत बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व कमजोर है, इसलिए वे क्षेत्रीय क्षत्रपों पर निर्भर रहते हैं. बिहार के बीजेपी नेतृत्व को नीतीश से कोई दिक्कत नहीं है, इसलिए केंद्रीय नेताओं को भी कोई परेशानी नहीं है.” यह नीतीश के लिए अच्छी खबर है.

Advertisement
Advertisement