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दुधवा टाइगर रिजर्व: मौत का सबब है ये ट्रैक

अंग्रेजों के समय वन संपदा के दोहन के लिए बिछाया गया रेलवे ट्रैक वन्य जीवों की मौत का कारण बन रहा है.

अपडेटेड 5 नवंबर , 2012

यह हमेशा से होता आ रहा है कि रेल विभाग रेल हादसों से लोगों को बचाने के लिए तमाम तरह के उपाय करता है. उसकी कोशिश रहती है कि रेल हादसों में कम-से-कम खून के छींटे उड़ें. लेकिन रेल विभाग के ही एक ट्रैक पर चलने वाली ट्रेनें सालों से मृत्युदूत बनी हुई हैं. लेकिन यहां एक छोटा-सा फर्क है. इस ट्रैक पर दौडऩे वाली ट्रेनों के शिकार इंसान नहीं, बल्कि जानवर हो रहे हैं.

यह जगह है उत्तर प्रदेश का एकमात्र संरक्षित बाघ क्षेत्र दुधवा टाइगर रिजर्व और उसके बीचोंबीच गुजरने वाली तकरीबन 100 किमी लंबी छोटी लाइन या मीटर गेज रेलवे ट्रैक.

दुधवा टाइगर रिजर्व उत्तर प्रदेश में पर्यटन का मुख्य केंद्र है. साथ ही यह वन क्षेत्र बाघों का आदर्श अनुकूलित आवास माना जाता है. इस टाइगर रिजर्व के 1,500 वर्ग किमी क्षेत्र में दुधवा वन के साथ दो सेंचुरी कतरनिया घाट और किशनपुर भी स्थित हैं. इस लंबे वन क्षेत्र में मृत्युदूत रेलवे लाइन बिछी है, जो नॉर्दर्न-ईस्टर्न रेलवे के गोंडा-मैलानी रेल प्रखंड का एक भाग है.

पिछले पांच साल में केवल दुधवा और कतरनिया घाट के ही इलाकों में 29 वन्य जीव, जिसमें बाघ भी शामिल हैं, ट्रेन की भेंट चढ़ चुके हैं. ट्रेन से मरने वाले पशुओं की विभागीय सूची में उन्हीं जानवरों की मौत दर्ज होती है, जिनके टुकड़े रेल पटरियों पर मिल जाते हैं. हाथी, बाघ, हिरन, जंगली सूअर जैसे बड़े जानवरों की मौत पर कार्रवाई में ट्रेन के ड्राइवर और गार्ड पर वन रेंज में केस दर्ज होता है. लेकिन रोजाना मरने वाले छोटे जानवरों जैसे मगर, कछुआ और बंदर का तो पता ही नहीं चलता. इनकी मौत रेलवे ट्रैक की सफाई के साथ साफ हो जाती है.

यहां एक खतरा यह भी है कि यदि ट्रेन हाथी जैसे बड़े जानवर से टकरा जाए तो उसकी मौत के साथ-साथ ट्रेन के भी दुर्घटनाग्रस्त होने की संभावना रहती है. इस वन क्षेत्र में पिछले कुछ सालों में 4 हाथी ट्रेन से टकराकर मर चुके हैं.

दुधवा में वन्य जीवों के प्रति जागरूकता अभियान चलाने वाले अनुराग कुमार कहते हैं, ''जहां देश में बाघ, हाथी, मगर जैसे जानवरों को बचाने के लिए अभियान चलते हैं, वहीं दूसरी ओर रेलवे ट्रैक से कटकर हर साल जानवर मर रहे हैं. सरकार को वन्य जीवों को बचाने के लिए इस ट्रैक को जंगल से दूर कर देना चाहिए. '' 

दुधवा टाइगर रिजर्व के उप निदेशक गणेश भट्ट बताते हैं, ''इन रेल दुर्घटनाओं का मुख्य कारण यहां से गुजरने वाली ट्रेनों की स्पीड है. इस पूरे क्षेत्र में खास तौर पर दुधवा के पूरे स्ट्रेच में होने वाली घटनाओं में लगभग 90 फीसदी यहां से गुजरने वाली एक एक्सप्रेस ट्रेन गोकुल द्वारा ही होती हैं. '' वन्य जीवों की दुर्घटनाओं पर रेलवे को वन विभाग से कई आधिकारिक पत्र लिखे जा चुके हैं.

प्राप्त जानकारी के मुताबिक वन विभाग के लगातार बढ़ते दबाव के बाद रेलवे ने पिछले साल के अंत में कुछ सुझवों पर अमल किया है, जिसमें ट्रैक के 30 किमी के एक हिस्से में स्पीड कम की गई है. अब यहां 30 से 35 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से ट्रेन चलाने का निर्देश है. लेकिन कतरनिया घाट और किशनपुर रेलवे ट्रैक पर स्पीड कम करने के लिए अभी भी निर्देश जारी नहीं हुए हैं.

इस पर रेलवे का पक्ष जानने के लिए संपर्क करने पर नॉर्दर्न-ईस्टर्न रेलवे मुख्यालय गोरखपुर के जन संपर्क अधिकारी एस.पी. मिश्र ने यह कहते हुए किनारा कर लिया, ''यह रेल लाइन तो ब्रिटिश काल से ही चल रही है और इसमें सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है. लेकिन इस संदर्भ में सही जानकारी डीआरएम एनई रेलवे, लखनऊ मंडल ही दे सकते हैं. '' लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी लखनऊ रेलवे मंडल के डीआरएम बी.के. यादव से संपर्क नहीं हो पाया.

यदि व्यावसायिक नजरिए से देखा जाए तो रेलवे के इस रूट पर न तो कोई बड़ा व्यापारिक केंद्र है और न ही कोई बड़ी आबादी है, जिसकी रेलवे पर निर्भरता हो. बावजूद इसके यह रूट लगातार सक्रिय है और वन्य जीवों के लिए खतरा बनता जा रहा है. ब्रिटिश काल में वन संपदा के दोहन और शिकार के लिए इस रेलवे ट्रैक को बिछाया गया था.

इसके पीछे अंग्रेजों के अपने हित थे, लेकिन यह समझना मुश्किल है कि इतना वक्त गुजर जाने के बाद भी इसके बारे में गंभीरता से क्यों नहीं सोचा गया.

 वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के डिप्टी डायरेक्टर अनिल सिंह कहते हैं, ''उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क में बिछी रेलवे लाइन भी इसी तरह थी, जहां पर ट्रेनों से टकराकर हाथियों की मौत हो जाती थी. वहां अब ट्रेनों की गति 30 किमी प्रति घंटा कर दिए जाने से दुर्घटनाओं में काफी कमी आई है. ''

वन्य जीव संस्था डब्ल्यूटीआइ ने देश में कई विभागों के साथ मिलकर ट्रेन द्वारा वन्य जीवों की मौत को रोकने के लिए साझ कार्यक्रम बनाया है. रेलवे लाइन पर सबसे ज्यादा दुर्घटना ट्रेन ड्राइवरों को ट्रैक दिखाई न देने के कारण होती है. इसी कारण कोहरे में ट्रैक के मोड़ पर और काफी जानवर मरते हैं.

अनिल  सिंह कहते हैं, ''दुधवा टाइगर रिजर्व में दुधवा के 2 और कतरनिया घाट के 3 ऐसे स्थान चिन्हित हैं, जहां ट्रैक पर मोड़ है. यहां सतर्कता और गति नियंत्रण चाहिए, लेकिन अब तक मात्र दुधवा की 2 जगहों पर ही सुरक्षा संभव हुई है. ट्रैक को साफ रखने और विजिबिलिटी बढ़ाने के लिए जागरूकता के प्रयास अच्छे परिणाम दे रहे हैं. ''

लखीमपुर जनपद की कांग्रेस नेता और सामाजिक कार्यकर्ता वैशाली अली कहती हैं, ''वन्य जीव बहुमूल्य हैं. इस रेलवे लाइन पर बड़ी आबादी की निर्भरता न होने से लोगों को भी कोई खास फायदा नहीं है. इसलिए रेलवे लाइन को जंगल से हटाकर आबादी वाले क्षेत्र में ले जाना चाहिए.''

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